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Tuesday, 25 April 2023

मेरा काम तो है पुकार

तो क्या हुआ 
जो तुम न मिल सके!
मिला तो वह ईश्वर भी नहीं मुझे!
फिर भी मैने रत्ती भर नही छोड़ी है
मेरी चाहतें, प्रार्थनाएँ, अर्चनाएँ
मेरा तो काम है बस 
पुकार! असदास!! और बन्दगी!!!

रामनारायण सोनी
२५.०४.२३

Monday, 10 April 2023

अर्चना पञ्च तत्वों की

अर्चना पञ्च तत्वों की

तुम ही तो आधार हो
व्यष्टि के, समष्टि के, जीव के, जगत के

हे पवन !
ठहरी सी क्यों हो मलय की वीथियों में
चन्दन की सुगन्ध बाट जोह रही है तुम्हारी
इन्हें जन जन तक पहुँचा दो
प्राणवह, गन्धवह, वेगवाहिनी,
विश्व व्यापिनी, अमित बलवान हो तुम !
प्राणदा हो तुम!

हे जल!
तुम्हारी कल कल करती धाराओं को कहो !
प्रपातों से गिर कर धुआँ-धुआँ हो कर देखो !
इस निसर्ग को सौंदर्य से भर क्यों नहीं देती ?
भर दो नद -नदियों को अपने पावन जल से
इस दग्ध जीवन की प्यास मिटाने की सामर्थ्य है
केवल तुम में ही
कह दो इन्हे जगजीवन ले कर बहो ! .

हे दीप्त अग्नि!
ऋत्विज वेदियों को समिधाओं से
सज्जित कर प्रतिक्षा कर रहे हैं तुम्हारी ही
ऋचाएँ सर्वदिक् अनुनादित हो रही हैं
अपनी उत्तप्त जिव्हाओं में भर कर
पहुँचा दो आहुतियाँ देवों को
हे नचिकेत! हमारे भोज्य को
सुपाच्य और आरोग्यप्रद बनाओ!

हे मातृभूमि!
तुम पालक, धरित्री हो!
और जीवन दायिनी हो !
हम पर प्रसन्न हो कर हम पर अनुग्रह करो!
कृतार्थ करो हम पुत्रों को

हे असीम अम्बर!
इधर यहाँ भी, वहाँ भी हो तुम...
दिवस के प्रकाश में छोटे हो जाते हो
अँधेरे का उदय होते ही
तुम में उगती है अकाशगंगाएँ
और यहाँ...
इधर मेरे घर के कक्ष में
यह रात कहती है
हे दीपक! आओ
और मेरी एक कोने में
अपनी रोशनी लेकर बैठ जाओ
यहाँ किसी के मिलन की घड़ी आ रही है
साक्षी बनो उस महापर्व के

रामनारायण सोनी
१५/११/२२

महायोग:- मूलाधार से विशुद्धि तक

श्रीमद्भगवद्गीता
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।7/4।।
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्।।7/5।।

Friday, 17 March 2023

जिन्दगी सँवार लो

जिन्दगी सँवार लो

झरने की झझराती वो आवाज,
सूखे पत्तों की ये सरसराहट,
बादलों की वो गरज,
बूँदों की टिप-टिप
मिमियाते मेमने,
लगती होगी तुम्हें महज आवाजें
पर मुझे तो लगता है
जैसे प्रकृति इनके माध्यम से बोलती है।
अपने कान नहीं,
अपना ध्यान लगा कर सुनो जरा!
ये देवदार की ध्वजाएँ,
रोमावली हैं अल्पनाएँ
नदियाँ हैं शिराएँ,
अलकें हैं लताएँ
श्रृंग शिखर हैं परिपुष्ट भुजाएँ
धरा के धाम पर गगन का वितान है
जैस जगती के मण्डप में
साकार हो रहा सृष्टि का विधान है
प्रदर्श नहीं महादर्श है
प्रकृति का मनोरम आधान है
खुले नयनों से निहार लो जरा!
जीवन छोटा सा है
सँवार लो जरा

रामनारायण सोनी
१८.०३.२३

Thursday, 16 March 2023

महाविनाश की ओर

भूल जाते हैं कि हम ने प्राण खींचा है पवन से
तृप्ति ले कर चल रही हर बूँद धरती से गगन से
जान लो इक ग्रास भर का अन्न महिनों में उपजता
कई वर्षों तक है तपता तब कहीं यह वन सरसता

यह धरा है माँ हमारी, पालती है चर अचर को
खाद कृत्रिम डाल कर विष से भरा इसके उदर को
मौन धरती कँपकँपाती इस तरह इस क्रूर नर से
जो विकासों की कहानी गढ रहा विध्वंस ही से

जब न था विकसित जगत तब लोग सब ही स्वस्थ थे
स्वच्छ थे तब तत्व पाँचों, सदा नीरा सरित नद थे
स्वानुशासन में मनुज थे, प्रकृति लावण्यमय थी
बस्तियाँ, बन-बाग घर घर, हर गली वे मोदमय थी

बस अर्चना में अरु हवन में हम वरुण को पूजते हैं
वृक्ष के तन काट कर ही हम पुरन्दर पूजते हैं
विष उगलती चिमनियों से हम पवन को रौंदते हैं
प्यास का नगदीकरण जल बोतलें भर बेचते हैं

रोज बढ़ते ताप से तप यह हिमालय गल रहा है
विश्व बढ़ते तापक्रम की भट्टियों में जल रहा है
सूखती इन जल शिराओं में बची है बाढ़ केवल 
हो रहा विकसित जगत बस यह कथानक चल रहा है

सागरों से उठ चले घन हरितिमा को ढूँढ़ते हैं
वन कहाँ सब गुम हुए है प्रान्तरों से पूछते हैं
हम कहाँ बरसें कहाँ ठहरें कहाँ बैठें बता दो
पर्वतों के पत्थरों से पीट माथा खीजते हैं

अब न होगी गोधूली ही भूमि गोचर नहीं बची है
नोट छापू बाग उपवन, यह महा माया रची है
पंछियों के नीड़ बिखरे, अब गोरैया कुछ बची है
वनचरों के वंशजों पर तीर तलवारें खिंची है

रामनारायण सोनी


 






Wednesday, 15 March 2023

आत्मा का आह्लाद

आत्मा का आह्लाद

गूँगा जो बोलता है,
बहरा जो सुनता है,
बिना आँख के भी जो देखता है
वह भाषा है, बोली है, जुबान है
वह केवल 'मौन' है
वह सन्नाटा है, वह निस्पन्द है।
फुसफुसाहट, शोर, दहाड़, गर्जन
बहुत सुने होंगे, पर
सुनो इस मौन को
यह 'अनहद नाद' है
शरीर का नहीं, मन का नहीं
आत्मा का आह्लाद है

रामनारायण सोनी
13.03.23

Wednesday, 1 March 2023

तुम्हारी मौजूदगी

तुम्हारी मौजूदगी

तुम्हारी मौजूदगी
मेरे जीवन में
बसन्त की सुहानी सुबह में 
एक खिला हुआ गुलाब है
ग्रीष्म की चिलचिलाती धूप में
गुलमोहर का फूल है
वर्षा में झिरमिराती फुहार है
शरद ऋतु में कमलदल पर
ठहरी हुई शबनम है
हेमन्त में गुनगुनाती धूप है
शिशिर में रुई के फाहों जैसा
बरसता हिम है

तुम्हारी मौजूदगी
अस्ताचल को जाते सूर्य की
सुनहरी किरण है
अँधेरी रात में
टिमटिमाता तारा है
बरखा की बूँदों पर
चित्रलिखा इन्द्रधनुष है
और ठिठुरती शरद में
तृणों का नोक पर आसन्न
रजतमयी ओस कण है

तुम्हारी मौजूदगी
जलतरंग से उठती हुई
मधुमय रागिनी है
और इन से भी परे
तुम्हारी उपस्थिति
मेरे जीवन का गीत-संगीत है

रामनारायण सोनी
२.३.२३

नूतन नव विहान


नूतन नव-विहान

कल फिर एक नया दिवस होगा! 
उसी पुरातन सूर्य के साथ!
होगी वही सुरम्या मैदिनी
पर कुछ बीज नये होंगे। 
वह नवआशाओं के इन्द्रधनुष से! 
आप्लावित होगा फिर वही आकाश, 
दामिनियों के संग मेघों के तृप्त उदर में 
खारे समुद्र का मृदु आसुत जल होगा। 
धरती की वही प्यास होगी 
पर तृप्तियाँ चल कर स्वयं मूर्त होंगी। 
रात भर सुस्ताई हवाओं की 
सूक्ष्मतम कणिकाओं के गर्भ में 
प्रातः के कुसुमित पुष्पों की 
मधुसौरभ समाहित होगी। 
उज्ज्वल रश्मियों से द्रुमदलों के अणु-अणु में 
पमात्मा का सौंदर्य प्रतिबिम्बित होगा। 
दर्शन कर सकेंगे जन-जन इनका।

फिर एक नया दिन होगा! 
रजकणों में गोखुरों के आघात से 
उत्पन्न उर्मियाँ होंगी 
और वे रोलियाँ की स्वर्णाभा ले कर 
पश्चिम दिशा को आवृत्त कर डालेंगी। 
अपने अपने गृहों से निर्गमित हो कर 
पञ्चाग्नियाँ दिव्य हविष्य ले कर 
ऊर्ध्वाकाश में देवों को परितुष्ट करेंगी। 
ऐसे में प्राची के आलोकित अरुणाभ 
दिगन्त को निहारने पर विहंग-वरूथ 
कलरव किये बिना कैसे रह सकेंगे?

एक नया दिन फिर होगा! 
जरा व्याधियाँ सब विखंडित होंगी, 
अपने स्कन्धों में फिर पौरुष दौड़ेगा। 
उत्साह के अश्वों की हिनाहिनाहट से 
उपत्यकाएँ गूँज उठेंगी। 
प्रखर प्रज्ञा की स्रोतस्विनियाँ 
मनस्वियों के हृदयों से उत्सर्जित होंगी, 
जो अर्चियों के प्रकम्प से 
ब्रह्मनाद का उद्घोष करेंगी।

फिर से एक दिन नया होगा!
उदय होगा भास्कर भुवन में 
नूतन नवविहान ले कर 
उपासना जन्य सिद्धियों 
और कर्मजा समृद्धियों का 
दिशा दिशा में प्रतिवर्षण होगा। 
पुरुषार्थ की अग्नि शलाकाएँ प्रतिरोधों को
विदीर्ण कर देने वाली शक्तियाँ स्फूर्त होंगी।

फिर उस दिवस की नीरव निशा 
नीहारिकाओं अथवा धवल ज्योत्सना को 
ले कर उपस्थित होंगी 
जिसमें यह धरा फिर सद्यस्नात होगी।
फिर अहोरात्र में शिखर-शिखर 
उज्ज्वल कीर्ति पताकाएँ 
स्वच्छन्द आकाश को चूमेंगी। 
दिग दिगन्त सामगान के 
प्रगीतों से आह्लादित होंगे।
ऐसा ही है 
"मेरे खुले नयनों के स्वप्नों का संसार"

रामनारायण सोनी
१.३.२३

Tuesday, 21 February 2023

छोड़ दिया लिखना मैंने

छोड़ दिया लिखना मैंने

मैंने लिखना छोड़ दिया है
क्योंकि मैं...
किताबों में लिखे चेहरे
और चेहरे पर लिखी किताब
पढ़ना चाहता हूँ
इसलिये मैंने लिखना छोड़ दिया है

मैंने कहना छोड़ दिया है
क्योंकि मैं..
तुम्हारी पीड़ा, सुख-दुःख
तुम्हारी अनुभूतियाँ, 
जिन्दगी के कड़वे, खट्टे-मीठे 
सच सुनना चाहता हूँ
इसलिये मैंने कहना छोड़ दिया है

मैंने देखना छोड़ दिया है
अब मुझे महलों दुमहलों की 
खिड़कियाँ, मेहराबें और कंगूरे में
दम्भ ही दम्भ नजर आता है।
मुझे एक गहरी खाई दिखाई पड़ती है..
बड़ी मंजिलों वाले घरों और
पसीने से लथपथ इन मजूरों की
बरसाती से ढँकी वे झुग्गियों में  
इन निचली बस्तियाँ, बस्तियों में से
दौड़ता, हाँफता, बिलखता, आदमी!
जहाँ टप्परो से टपकते हैं संत्रास,
उनमें चारों ओर फैली
मच्छरों, मक्खियों की भिनभिनाहट
मुझे चैन से रहने नहीं देती

मैंने देखना - दिखाना छोड़ दिया है
जबकि वहाँ...
हमारे - तुम्हारे, इनके-उनके
फेंके गए कबाड़, उतरे- पुतरे
बीनते - बटोरते, टालते - टटोलते
वे छोटे बड़े अधमरे जिस्म
मेरे जेहन में, चेतना के संसार में
तैरते रहते हैं
मैं देखता हूँ ठगा - ठिठका
मेरी इन छलछलाई ऑंखों से
नहीं देख पाता हूँ
वे गगनचुम्बी अट्टालिकाएँ 
सभ्यता के शिखरों की चौंधियाती चमक
और उनके कदमों में पड़ी वे
अधमरे जिस्मों से भरी झुग्गियाँ

हाँ! इसलिये छोड़ दिया है मैंने..
लिखना, कहना और देखना

रामनारायण सोनी

दीप मेरे

दीप मेरे!
तुम हृदय में सजे क्या
स्वप्न जागे, रात जागी
फिर तिमिर की प्यास भागी
आत्मबोधी प्रखर प्रज्ञा
क्षणिक जग यह स्मरण है
प्राण की संचेतना का
चिन्मयी यह विस्तरण है
आ चलें हम!
रश्मियों का प्राश कर लें!


Sunday, 19 February 2023

तुम शाश्वत सत्य सनातन हो

तुम शाश्वत सत्य सनातन हो

तुम अद्भुत हो, हे वंदनीय! तुम असीम सुख दाता हो
तुम तो मेरे जीवन-धन हो तुम मेरे भाग्य विधाता हो
तुम चिदानन्द आनन्द विभो! और दुःखों के त्राता हो 
तुम ही कर्ता हर्ता सब के और जगत के धाता हो
तुम शाश्वत सत्य सनातन हो, प्रतिबिम्बित कण कण में

तुम असीम हो तुम अनन्त तुम हो व्यापक सचराचर में 
तुम परमज्योति बन कर रहते हो रवि में और सुधाकर में 
तुम ज्ञानमयी- विज्ञानमयी विद्या के परम प्रदाता हो
तुममें सब है सब में तुम हो बाहर भी तुम, तुम ही उर में
तुम शाश्वत सत्य सनातन हो, प्रतिबिम्बित कण कण में

तुमसे ही मिलता सुख-वैभव नवनिधि प्रवर प्रदाता हो
तुम पावन परमेश्वर ऐसे गुण जिनके जग गाता हो
निर्बल मन और चित्त हमारा, तुम सब कष्टों के त्राता हो
तुम उदार, उज्ज्वल, वरेण्य तुम जन जन के मन ज्ञाता हो
तुम शाश्वत सत्य सनातन हो, प्रतिबिम्बित कण कण में

तुम शाश्वत सत्य सनातन हो प्रतिबिम्बित कण कण में
तुम हो जल में थल में नभ में पावक और समीरण में
तुम ही हो वह कठिन कुलिश, तुम ही कोमल कुसुम प्रभो
तुम त्रिकाल तुम महाकाल तुम लय में और क्षरण में
तुम शाश्वत सत्य सनातन हो, प्रतिबिम्बित कण कण में

रामनारायण सोनी
१७.०२.२३

हे नाथ तुम्हें ना भूल सकूँ!

हे नाथ तुम्हें ना भूल सकूँ!

मरुथल में हो ढूँढ रहा प्यासा मृग जैसे बूँद बूँद
दिग दिगन्त में फैली है जग की तृष्णा की घनी धुन्ध
इन्द्रिय के घोड़े थके थके, काँधे आगे को झुके झुके
इस लोभ मोह के चक्कर में, आशा के टूटे सभी बन्ध
  अब तेरी याद सताती है
  आँखें भींग भींग जाती है

इस मन में मैल भरा इतना सागर में खार भरा जितना
इस पाप पुण्य की गठरी में है माल भरा मैंने कितना
पर सुमर नहीं पाया मैं तीनों पन बीत गये रीते
इस कलुष भरे जीवन को ही मैं रहा पालता इतना
  अब तेरी याद सताती है
  आँखें भींग भींग जाती है

इस हाड़ मांस के पिंजर को सारी ही उम्र सजाया हूँ
रहा बीनता कंकर पत्थर हीरा जनम गवाँया हूँ
द्वार द्वार और नगर नगर में भटक रहा था मैं अब तक
तुमने उपकार किये इतने मैं समझ अभी पाया हूँ
  अब तेरी याद सताती है
  आँखें भींग भींग जाती है

मन की अन्धी गलियों में तुम रोशन हो कर छा जाओ
अपनी करुणा से हे प्रभु! तुम मेरी झोली भर जाओ
तम के काले घन ने घेरा है दुःख दर्दों ने डाला डेरा
हे नाथ! तुम्हें ना भूल सकूँ अन्तर में ऐसे रम जाओ
  अब तेरी याद सताती है
  आँखें भींग भींग जाती है

हे प्राण कण्ठ में रुके हुए वाणी अवरुद्ध हुई जाती
कानों तक आई आवाजें फिर वापस लौट कहीं जाती
पर सिर्फ तेरी पदचाप सुनूँ यही मेरीअभिलाषा है
हे प्रणतपाल! हे दीनबन्धु! मैं हूँ बस तेरा आराती
  अब तेरी याद सताती है
  आँखें भींग भींग जाती है

रामनारायण सोनी
१६.०२.२३

Sunday, 12 February 2023

जो मिल गया सम्हाल ले

जो मिल गया सम्हाल ले

तू कौन है? विचार कर, खुदी में खुद तलाश कर
आज दिन नया मिला, इसी का तू सिंगार कर।
चुनौतियाँ हजार हों भले, तू मोर्चा संभाल ले
चला गया वो भूल जा, जो मिल गया सम्हाल ले।।

जोखिमों का काफिला है जिन्दगी में जान ले
हर कदम पे खेल है, हर खेल को पहचान ले।
खत्म खेल भूल कर तू, फिर नया तू हाथ ले
चला गया वो भूल जा, जो मिल गया सम्हाल ले।।

रोज क्यों तू मर रहा है, खुद को आज मार ले
बिछड़ गया जो आज में, कल से भी निकाल दे।
जो मिल गया, सहेज ले, बिखर गया बिसार  दे
चला गया वो भूल जा, जो मिल गया सम्हाल ले।।

आया है सो जायगा ये, मृत्यु सत्य जान कर
इस धरा पे जो धरा, धरा रहेगा ध्यान कर।
जो अरूप रूह है वो, अमर रहेगी मान ले
चला गया वो भूल जा, जो मिल गया सम्हाल ले।।

रामनारायण सोनी
१२.०२.२३

Monday, 6 February 2023

क्या देखते हो?


    🌓क्या देखते हो?🌖

रुपये के हैं दो पहलू 
एक पर उसकी कीमत है
दूसरे पर है अशोक स्तम्भ 
है जो सत्य और शौर्य का प्रतीक
पहले पर है खुद की ताकत
दूसरे पर है शासक की
फर्क ये है कि तुमने किसे देखा
फर्क है नजरिये का
फर्क है मान्यता का
फर्क है उपयोगिता का
फर्क है आपकी अन्तर्भावना का

देखता भीतर से है कोई
नागफनी और गुलाब के शूलों को
उन काटों की चुभन को
या सृजन के सौंदर्य को
उन पर महकती खबसूरत
खिलती कलियों और फूलों को
या तो देखता है वंशी के छिद्रों को
या सुनता है झरती रागिनी को

देखते तुम नहीं हो
देखता वो है जो भीतर बसता है 
अपनी कीमत पर मत अटको
सत्य और अपनी शक्ति को जानो
कौआ मान सरोवर में भी
केवल जल ही पीता है
पर हंस भी वहाँ है
जो केवल मोती ही चुगता है।

रामनारायण सोनी

Saturday, 4 February 2023

चीटियाँ हैं ये

चीटियाँ ये चीटियाँ
न दो इन्हें चुनौतियाँ

धर्म की देवियाँ हैं वे, 
साहस का प्रतिमान है वे, 
कर्म का विधान हैं वे, 
श्रम का संधान हैं वे। 
चलते चलते थकती नहीं है कभी, 
छाँव देख कर भी रुकती नहीं है कभी, 
पहाड़ के सामने भी झुकती नहीं है कभी।
चीटियाँ ये चीटियाँ
न दो इन्हें चुनौतियाँ

विश्वकर्मा ही हैं बसा इनमें 
देख लो बमीलों के वास्तु शिल्प को, 
विश्वधर्मा ही हैं ये 
देख लो उनके प्रशान्त कर्मक्षेत्र को, 
विश्वबन्धु हैं ये 
देख लो इनके सहअस्तित्व को, 
विश्वविमोहिनी हैं ये 
देख लो इनके रूप को स्वरूप को।
चीटियाँ ये चीटियाँ
न दो इन्हें चुनौतियाँ

संगठन की शक्ति ले , 
स्वामिनी की भक्ति ले , 
जीवनी की संतृप्ति ले, 
दायित्वों में अनुरक्ति ले 
अजेय हैं, प्रमेय है, विधेय है 
चीटियाँ ये चीटियाँ
न दो इन्हें चुनौतियाँ

मौसमों की मार हो, 
छुरों की तीखी धार हो, 
सिन्धु का सा क्षार हो, 
जीत हो या हार हो, 
मुँह में चाहे भार हो, 
शत्रु के प्रहार हों, 
कब डरी है चीटियाँ। 
चीटियाँ ये चीटियाँ
न दो इन्हें चुनौतियाँ

भित्तियों को लाँघ कर, 
तृणों के सेतु बाँध कर, 
दिशाएँ देख भाल कर, 
स्वप्न मन में ढाल कर, 
कदम कदम संभाल कर,
सभी जगह खंगाल कर,
बढ़ रही है चीटियाँ। 
चीटियाँ ये चीटियाँ
न दो इन्हें चुनौतियाँ

न इनका कोई जोड़ है
न जिन्दगी में मोड़ है
बसा है एक नगर यहाँ
जुड़ा है एक सफर यहाँ
रानी ही का राज्य है
परिवार अविभाज्य है
असत्य यहाँ त्याज्य है
तभी यहाँ सुराज्य है।
चीटियाँ ये चीटियाँ
न दो इन्हें चुनौतियाँ

अरे मनुज सुनो जरा
प्रबन्ध देख लो जरा
श्रेणियों के भेद है
कर्म के प्रभेद है
श्रमिक लगे हैं कार्य में
सैनिकों के फौज है
प्रचुर यहाँ आहार है
मौज का विहार है।
चीटियाँ ये चीटियाँ
न दो इन्हें चुनौतियाँ

रामनारायण सोनी
04.02.23




Monday, 16 January 2023

अपनी धरती, अपना घर

*अपनी धरती, अपना घर*

धरती पर देखने वालों ने
कल आसमान देखा
उड़ते चढ़ते कई रंग देखे
पेंच देखे, खेंच देखी
जमे देखे, उचके देखे
उम्मीदों की डोर पर
अरमान भी देखे, निश्वास भी देखे
कुछ ने बस देखा ही देखा
काटता कोई हो, कटता कोई हो
पर कई थे व्यर्थ की लूट में
इधर से उधर दौड़ते लोग।
उन माँजों का क्या
जो काटने आये गला
हिमालय के उस पार से
नीले गीले आसमान से
वे तैरती रंगीन परियाँ
एक दिन के सफर से
फिर लौट आईं अपने घर
याने फिर अपनी धरती पर

रामनारायण सोनी
१६.०१.२३

Monday, 9 January 2023

संग सदा तू रहता है

संग सदा तू रहता है

मैं प्रणाम करता हूँ इन हिम आच्छादित शिखरों को
वन्दन करता हूँ सूरज की अरुणिम इन किरणों को।
धरता अपना शीश मही पर इसका अर्चन करने को
अभिनन्दन पहुँचे मेरा उन कल कल करते झरनों को।।

कण कण इस भूतल का मेरे प्रभु का यह मन्दिर है
नभ में मण्डित चाँद सितारे मन्दिर के ये शिखर हैं।
तड़ित मजीरा मेघ गर्जना घनन घनन करता घन है
मन मयूर का नर्तन मेरा यह घर आँगन सुन्दर है।।

रोम रोम में बसी चेतना मुझमें तू ही नित रमता है
सूखे पत्तों के परदे में भीषण दावानल छिपता है।
जनम मरण के बीच हमारा जीवन कैसे चलता है
नहीं दीखता फिर भी तो तू संग सदा ही रहता है।।

रामनारायण सोनी
१०.०१.२३

Monday, 26 December 2022

जागा अरुणिम भोर प्रिये

जागा अरुणिम भोर

अम्बर मेरे मन का आँगन जागा अरुणिम भोर प्रिये!

मानो ऊषा की चूनर ने जगती, पर रोली बिखराई
नव प्रभात में जैसे तुम बन, कमलकली हो मुसकाई
नयन मिले फिर हृदय जुड़े, जग की सब सुध बुध विसराई
रजनी जैसे अलस रही आँखों में भर भर अरुणाई
पल पल प्रमुदित अहसासों से भरे भरे हैं अहा हिये!
अम्बर मेरे मन का आँगन जागा अरुणिम भोर प्रिये!

मेरे स्वप्नों को पंख लगे अलि प्रसून मुख चूम रहा
लतिका के अवगुंठन में यह आँछ गाँछ है झूम रहा
अहसासों के अनुबन्धों में बन्धन का ना जिक्र रहा
मौन मुखर और मुँदे अधर ने संवेदी संवाद कहा
इस पल की छाया में हमने कितने कितने कल्प जिये!
अम्बर मेरे मन का आँगन जागा अरुणिम भोर प्रिये!

नयन बोलते नयनों से अहसास गुँथे से रह जाते हैं
नेह भरे मन के निर्झर ये झर झर कर झर जाते हैं
बिन पल्लव के रूखे टेसू नव प्रसून से भर जाते हैं
पद्मपत्र पर ठहरे जल कण पद्मराग हो जाते हैं
मत्थर बहती मदिर पवन ने कितने मादक गान किये!
अम्बर मेरे मन का आँगन जागा अरुणिम भोर प्रिये!

रामनारायण सोनी
२७.१२.२२

Thursday, 22 December 2022

शब्द ब्रह्म

शब्द ब्रह्म

मैं शब्द हूँ
मैं उस अनन्त अक्षर से मण्डित हूँ
मैं अमर हूँ, मैं समर हूँ
मैं सुधा हूँ, मैं गरल हूँ
गूँज हूँ, अनुगूँज हूँ, स्पन्द हूँ
मैं वज्र भी हूँ, पुष्पों सा कोमल भी हूँ

नेपथ्य में बोये गए कुछ शब्द बीज
उगते, विकसते हैं जगत के रंगमंच पर
अपने अर्थ, भाव, संदेश और कथ्य ले कर
मेरी बिखरन होती है सतरंगी
रक्त सी लाल, सत्य सी श्वेत
निस्सीम व्योम सी नील,
पाण्डु सी पीत, राम-कृष्ण सी श्याम
वसन्त सी अभिराम,
लता सी हरित ललाम

जब जब मैं उतरता हूँ कोरे कागज पर
किसी के अन्तस से निकल कर
बाहर बिखरता हूँ साकार हो कर
बनाता हूँ चित्र, धँसता हूँ तुम्हारे भीतर
बैठ जाता हूँ शूल लेकर मन की कोंख में
चुभता हूँ, सालता हूँ कभी जीवन भर
लेप हूँ, मरहम हूँ, तसल्ली भी मैं ही तो हूँ।

मैं ओज का उद्घोष हूँ
शान्ति का दूत हूँ, स्मृतियों का महाकोष हूँ
प्रणय का गीत हूँ, प्रिय का मन मीत हूँ
पावन ऋचा हूँ, जीवन का उद्गीत हूँ
मैं नाद हूँ, मैं गीत हूँ, मैं प्रगीत हूँ
मैं माँ की ममता हूँ, पिता की गोद हूँ
आर्त की पुकार और वीरों में क्रोध हूँ
तुम्हारे मन में हूँ, आकाश में भी हूँ
चलता हूँ विद्युत की तरंगों पर
कभी हवा के परों पर बैठ कर

वहाँ सें यहाँ, यहाँ से वहाँ, जाने कहाँ कहाँ

मैं बीज हूँ
सृजन भी मैं, जीवन भी मैं, ध्वंस भी हूँ मैं
मैं ब्रह्म हूँ। शब्द ब्रह्म।।

रामनारायण सोनी
२०.१२.२२

Wednesday, 21 December 2022

प्राण की वंशी

तुम न आए! प्राण की वंशी अभी निष्प्राण है

साँझ सोई इस अलसती रात की मृदु गोद में
तारिकाएँ श्वेत गंगा की पलक से झाँकती है
नील सर के नील शतदल पत्र पर हैं राह तकते
मन्द बहती है पवन पर फिर भी लगता त्रासती है
प्यास अपने कण्ठ ले कर चिर वियोगन जागती है
तुम न आए! प्राण की वंशी अभी निष्प्राण है

झुरमटों से हैं महकते बाग, बन, उपवन मनोरम
श्वेत, रक्तिम, पीत पुष्पी लिग्गियाँ पथ में टँगी है
चुलबुले कलहंस सर में संग भ्रमरों की ये सरगम
कूकती कोयल किनारे मधुमास जैसे माँगती है
बिन तुम्हारे इस हृदय में शूल जैसी सालती है
तुम न आए! प्राण की वंशी अभी निष्प्राण है

रामनारायण सोनी
२०.१२.२२

Tuesday, 20 December 2022

भीतर झाँको जरा

भीतर झाँको जरा

तुम ही बताओ

क्या वो तुम ही हो?

जो कभी तुम थे।
या फिर तुम्हें लगता है
'मैं' जो लगता था कभी
'मैं' अब वैसा नहीं लगता
सुनो सुप्रिये!
रूहों की जात, औकात, रंग
कभी भी नहीं बदलता।
अपने भीतर पलट कर देख लो जरा।
क्या तुम वही नहीं हो?
रामनारायण सोनी
२७.०९.२२

भोर का तारा

भोर का तारा

उधर वहाँ....
भोर का वह तारा
न रात का हो सका न दिन का
बीज बैठा रहा तिजोरियों में
कीमती नगीनों और सोने की गोद में
न मिट सका न उग ही सका
स्वाँति की बूँदें सागर में
सागर में ही फिर से घुल गई, मिल गई
सीपियाँ मिल न सकीं उन्हें
लोग आते रहे, जाते रहे
इन्ही राहों से...
और ये राहें कब से चल रही हैं
पर जाती नहीं हैं कहीं भी
देखती रहती हैं, पहुँचाती रहती हैं
अपनी जगह गड़ी गड़ी सी

रामनारायण सोनी
१५.११.२२






मुक्तावली

फल फूली हर शाख मुखर है मन का मधुबन
आणंद बेली महक रही, भ्रमर गुंजारे गुनगुन
आँगन आँगन सजी रंगोली, माँडन लगे सुहावन
उतरा आज गगन से डोला, वासंती मन भावन
      रामनारायण सोनी
      06.12.2022

Friday, 21 October 2022

स्वप्न से समाधि तक

स्वप्न से समाधि तक

जब मन अन्धा हो
तो नयन और बटन में कोई फर्क नहीं
जब मन ऊँचा सुनता हो
तो बोली और अबोली में कोई फर्क नहीं
जब मन ही दग्ध हो
तो जल में और अनल में कोई फर्क नहीं
लेकिन जब मन ही अमन हो
तो स्वप्न और समाधि में भी कोई फर्क नहीं

रामनारायण सोनी

Wednesday, 19 October 2022

दो पल की पहिचान

अपने जीवन के सब से खास
इस हृदय की शिला पर
लिखे अमिट पल 
स्मरण करते ही
भीतर से बाहर तक 
रोमांच से भर जाता हूँ
पुलक का वह पल
हटात् जब नजरें हुई थी चार
और अतिरेक का वह दूसरा पल
जब जब रूह घुली रूह में
न भूला मैं
न भूल सकोगे तुम!

रामनारायण सोनी
२०.१०.२२

Sunday, 16 October 2022

एक महीन रिश्ता

एक रिश्ता जो आदत बन गया

एक आदत जो लत हो गई
एक लत जो छोड़े नहीं छूटती
रिश्ता जो मंजिल नहीं सफर था
सफर जो ख्वाहिशों की पगडण्डियों से गुजरा
पगडण्डी जो इस दिल से उस दिल को
महीन, मुलायम, पवित्र रिश्ते से जोड़ती है

रामनारायण सोनी
१७.१०.२२

Wednesday, 12 October 2022

सागर किनारे तुम्हें सौंपता हूँ


मैं सागर किनारे तुम्हें सौंपता हूँ।।

अँधेरे का दीपक मेरे साथ में है
रातों का काजल मेरे हाथ में है
मैं दिन के उजाले तुम्हें सौंपता हूँ।
कश्ती फँसी है जो तूफां में घिर के
नजर से तुम्हारी उसे यूँ बचा कर
मैं सागर किनारे तुम्हें सौंपता हूँ।।
    मैं सागर किनारे तुम्हें सौंपता हूँ।।

हुई शूल के संग आज मेरी मिताई
खिले फूल गुलशन से होती चुनाई
वही फूल अब मैं तुम्हें सौंपता हूँ।
झरे पात पतझर में तन से भले ही
बची थी फखत सूखी शाखे भले ही
मैं फिर भी नई कोंपलें सौंपता हूँ।।
    मैं सागर किनारे तुम्हें सौंपता हूँ।।

मेरे स्वप्नों के ये जखीरे पड़े हैं
कई प्रश्न पलकों पे मेरे खड़े हैं
फलक के सितारे तुम्हें सौंपता हूँ।
निरी प्यास ठहरी अधर पे है मेरी
रुँधा कण्ठ अवरुद्ध वाणी है मेरी
मैं गीतों की सरगम तुम्हें सौंपता हूँ।।
    मैं सागर किनारे तुम्हें सौंपता हूँ।।

हुई भोर तारे बिदा हो चले हैं
बुझते चिरागों के तन भी जले हैं
सुबह की किरन मैं तुम्हें सौंपता हूँ।
न फिर याद करना न फिर याद आना
ये आबाद बस्ती ये दिलकश जमाना
मैं तोहफे में जीवन तुम्हें सौंपता हूँ।।
    मैं सागर किनारे तुम्हें सौंपता हूँ।।

तुम्हारा सफर तेज रफ्तार का है
चल ना सका हम कदम बन के तेरे
मैं दिल की धड़कन तुम्हें सौंपता हूँ।
कैसे मैं भूलूँ पलों के वे मेले
बसे हैं जो अन्तस की गहराइयों में
उन्हें भर के गठरी तुम्हें सौंपता हूँ।।
    मैं सागर किनारे तुम्हें सौंपता हूँ।।

  रामनारायण सोनी

Sunday, 2 October 2022

पीर मेरी मधुबनी

इस हृदय की भित्तियों पर जो लिखे कड़वे कथानक
खोजता क्यों बावरा मन दंश की पीड़ा अचानक।
शुष्क अधरों पर निगोड़ी प्यास ही ठहरी हुई है
दौड़ते मृग शावकों को छल रहा मरु ज्यों भयानक।।
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।

क्यों तिमिर के इस निलय में रोशनी को ढूँढते हो
रेत के पदचिन्ह गिन कर जिन्दगी को बूझते हो।
रिस रहे थे व्रण बिचारे क्या उन्हें तुम देख पाये
जान कर भी बेतुके ये प्रश्न तुम क्यों पूछते हो?
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।

मर चुकी संवेदना अब ओस की कहती कहानी
उपवनों की गन्धवह थी यह पवन होती मसानी।
उम्र के माथे लिखी जो सिलवटें कहती जुबानी
क्रन्दनों के इस नगर में खोजते हो तुम रवानी।।
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।

फिर कोई आ कर व्रणों पर खार सारा धर गया है
जो दबे थे तह तले फिर पल हथेली धर गया है।
रागिनी क्यों ढूँढते हो बाँस की इस पोंगरी में
सांझ का प्रहरी सितारा इस सुबह में मर गया है।।
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।

मैं अकेला ही भला हूँ यह पीर मेरी संगिनी है
मैं रहा अनुचर उसी का वह मेरी जो स्वामिनी है।
पीर मीरा की प्रणय था पीर में नवजात सुख था
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।

गीत पीड़ा के स्वयं ही गान अपने गा रहा है
उन सुरों की वेदना में सुख समझ सुख पा रहा है।
इस हृदय को रास आई पीर संग मेरी सगाई
भित्तियों के वे कथानक फिर हृदय दोहरा रहा है।।
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।

रामनारायण सोनी
३.०९.२२

Saturday, 1 October 2022

संस्पर्श

कागज-कलम की दूरी 
कमबख्त इस दिल से
सिर्फ एक हाथ भर की ही तो थी
पर अपनी कुछ बातें 
उन्हें लिख कर बताने में
एक उम्र खर्च कर डाली हमने
फिर भी बात अधूरी ही रह गई

रामनारायण सोनी
२.१०.२२

Friday, 30 September 2022

तुम ही तो थी

तुम ही तो थी

मुझे वह तारीख तो याद नहीं
पर समय के परिन्दे का वह सफर
वह हाथों पर टिकी ठोड़ी
चेहरे पर खिलखिलाता तबस्सुम
नीली झील से झाँकते नयन
ध्वजा से लहराते कुटिल कुन्तल
काँपते से वे अधर 
कुछ कहने को आतुर, लेकिन..
हुनर नजरों से ही कहने का
सुना था, महसूस किया था
मेरी ठगी, ठहरी, सम्मोहित नजरों ने ही
क्या वह तुम नहीं थी?

रामनारायण सोनी
१.१०.२२

Saturday, 24 September 2022

बटुआ

एक ऐयारी का !
जादुई बटुआ है मेरे पास
बहुत सारे पुड़ हैं उसमें
खोल कर दिखाता हूँ
एक तिलिस्म तुम्हें
रख रख्खे हैं इसमें मैंने
तरह तरह के पल
खूबसूरत पल, आनन्द के पल,
जिन्दगी के अलग अलग मोड़ के पल,
मिलन के बिछड़ने के पल।
कुछ पल ऐसे भी हैं
जिनका साया आज तक भी
पीछा नहीं छोड़ रहे
और वे जिन्दगी के सफेद कागजों
को ढँकने लगता है।

रामनारायण सोनी
२५.०९.२२

Thursday, 22 September 2022

दूधिया हो लें

दूर! बहुत दूर!

बहुत बहुत दूर हो तुम!!
लगता है चाँद के पास हो तुम!!
नहीं नहीं! तुम्हारे पास एक वो चाँद है
और एक तुम्हारा, यानी मेरा अपना भी
तुम से अमीर हूँ मैं, मेरी किस्मत है कि
दो दो चाँद है मेरे पास
अब रोशनी भी है और शबाब भी
सनम भी और माहताब भी
रुकोगी तुम तो रुक जाएँगे चाँद भी
यों ही रोके रहो रात को
चलो दूधिया हो लें हम
बहुत सारे थे, वे तारे, देखनहारे
चाँद ने उन्हें छुपा दिया है आकाश में
चलो कोई खूबसूरत सा गीत गा लें हम
ये रात, ये चाँदनी, ये दिलकश नज़ारा!
ये समा मिलेगा फिर न दोबारा!!!

रामनारायण सोनी
२२.०९.२२

Tuesday, 20 September 2022

सिलवटों के पार से

सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ

दर्द ने लिक्खे कसैले घाव आओ मैं दिखाऊँ
जिस लड़कपन को कभी काँधे बिठाया था
भूख खा कर खुद उसे माखन खिलाया था
खोल गठरी से व्यथा की यह कथा तुमको बताऊँ
सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ
   सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ

इक सलोना स्वप्न हमने प्यार से ऐसा संजोया
देव पूजे, भात , धोक दे कर सिर नवाँया
तब कहीं जा कर हमारी गोद में शिशु एक पाया
सो सके वह नींद भर इसलिये खुद को जगाया
खर्च कर अपनी जवानी पालने बचपन झुलाया
उम्र की बीती कहानी आओ तुमको मैं सुनाऊँ
   सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ

स्वप्न अपने रहन रख कर सब खुशी उसकी खरीदी
पाँव के छाले छुपा कर जूतियाँ ला कर उसे दी
था सजा आँगन हमारा गूँजती किलकारियों से
खर्च डाले जो जमा थे  ढूँढ कर अल्मारियों से
हार थक कर लौटते थे दिन दिहाड़ी के कड़े थे
उस थकन की पीर को मैं अब तुम्हें कैसे बताऊँ
   सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ

फिर समय नें बदल करवट तीव्र तेवर थे दिखाए
थे जिन्दगी की ओढ़नी में पेच टाटों के लगाए
वे उँगलियाँ, हाथ, माथा चूमते थे लाड़ से हम
हाय यह हत भाग्य कैसा हो गए कितने पराए
झुर्रियों से ढूँढ कर मुस्कान मुह पर कैसे लाएँ
छूटते दर और टूटते घर की कथा कैसे सुनाऊँ
   सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ

देखता हूँ दृश्य, आश्रम द्वार पर नजरें गड़ी थी
कीमती उस कार से काय कृश उतरे खड़ी थी
जर्जराती जिल्द में हो कामायनी जैसे मढ़ी थी
जिन्दगी बस खार लेकर आँसुओं से वह झड़ी थी
तुम इसे सन्यास का बस नाम दे कर चुप रहोगे
उस हृदय की मर्मभेदी चीख मैं तुम को सुनाऊँ
   सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ

रामनारायण सोनी
२०.०९.२२

तिनके सा मैं

तिनके सा मैं और 
समुन्दर सा इश्क
डूबने की चाहत 
और डूबे ही रहना 
है इश्क! इश्क!! इश्क!!!

रामनारायण सोनी
२०.०९.२२

सारस से पाँखी हम

बातों ही बातों में तुमने-

कितने ही पृष्ठ पलट डाले
चमक उठे वातायन
विविध रंग वाले
लिक्खी थी मधुर मधुर
वे शहदीली रातें
सारस से पंख खोलकर
उड़ने की बातें
यादों के अम्बर में
फगुनी टेसू क्या दहका है ?
मौसम का पोर पोर महका है

रामनारायण सोनी
२०.०९.२२

Monday, 19 September 2022

मेरा उपवन बुला रहा

ओ नभ के उड़ते पांखी
मेरा उपवन बुला रहा है 
थोड़ा पंखों को दो विराम
मेरा उपवन बुला रहा है

तुम पहुँचोगे जगह जहाँ पे
प्यारा गाँव हुआ करता था
उसे शहर ने निगल लिया है
एक चौपाल हुआ करता था
  ओ नभ के उड़ते पांखी
  मेरा उपवन बुला रहा है 

आम, नीम, बड, पीपल की
ठण्डी छाँव घनी रहती थी
उनके शव तक नही बचे है
अब सन्नाटा पसर रहा है
  ओ नभ के उड़ते पांखी
  मेरा उपवन बुला रहा है 

सुखद नीड़ था जहाँ बनाया
तिनके तक अब नहीं मिलेंगे
वे मधुर गान तोता मैना के
सुनने को ना कहीं मिलेंगे
  ओ नभ के उड़ते पांखी
  मेरा उपवन बुला रहा है 

ताल तलैया सूख चुके हैं
प्याऊ बस इतिहास हुई है
पथ में छाँव बिछाता बादल
तक भी आना छोड़ रहा है
   ओ नभ के उड़ते पांखी
   मेरा उपवन बुला रहा है 

दूर देश के प्रिय प्रवासी
मीलों तुम उड़कर आए हो
मालव की माटी और पानी
अब कंकरीट वन उगा रहा है 
   ओ नभ के उड़ते पांखी
   मेरा उपवन बुला रहा है 

कोयल और पपीहे की तो
आवाजें सब बिदा हुई है
नगर गाँव में हवा प्रदूषित
बोतल में जल बिक रहा है
   ओ नभ के उड़ते पांखी
   मेरा उपवन बुला रहा है 

    रामनारायण सोनी
     ११.०८.२२

सेवा का हवन कुण्ड

सेवा का हो हवन कुण्ड और हम समिधा हो जाएँ
अगन बने फिर लगन हमारी सर्व समर्पित हो जाए।
तन-मन तप कर संकल्पों का मंगल सूत्र बँधाएँ
शुद्ध भाव की अरणी ले कर पावन ज्योति जगाएँ।।

इस समष्टि का हर कण कण सेवा में आहुतियाँ देता
नदियाँ बहती सूरज तपता पवन प्राण ले क्यों बहता।
सागर अपना पानी दे कर इस जग में जीवन धरता
अम्बर अपने महा उदर में सृष्टि अनेकों क्यों भरता।।

इनमें से कोई भी अपना मूल्य कर्म का नहीं माँगता
इस निर्बाध क्रिया में वह अपना नियम नहीं लाँघता।
ये सब सेवा का प्रकल्प ले आदिकाल से लगे हुए हैं
फिर भी रहते मौन सदा ये ना कोई उपदेश बाँटता।।

सेवा के इस महायज्ञ से महामारियाँ भी हारी हैं
मानवता की प्रतिरक्षा में सेवा ही सब से भारी है
हर सेवक नर में नारायण आ कर स्वयं उतरते हैं
इसीलिये कष्टों के पल में भी तो यह सेवा जारी है

आओ प्रिय इस महायज्ञ में आहुतियाँ अपनी डालें
हो वेद ऋचाओं का उच्चारण तब हम हाथ स्रुवा लें।
अपनी धरा गगन अपना है मन में सेवा दीप जला लें
पीड़ित मानवता की सेवा में तन मन प्राण लगा लें।।

रामनारायण सोनी
१९.०९.२२

शूल और फूल

बहुत प्रयास किये तुम ने भी मैंने भी

न यादें मिटी, न पीछे छूटी रेखाएँ
न वे पल, न ही वे वाकिये
आँगन के बिरवे की टहनियों से झड़ते रहे
बहारें, फूल पत्तियाँ और खुशबू
पर उन गुदाज़ यादों के शूल
चख लेते हैं लहू के स्वाद को
कितना सुकून है इस दर्द और चुभन में
मैं उतना ही प्यार करता हूँ
इन निर्मम शूलों से
जितना करता रहा हूँ
फूलों से, पत्तों से, पंखुड़ियों से

रामनारायण सोनी
१७.०९ .२२

महसूस किया बस तूने

सुनना एक बात है
समझना एक और बात है
पर महसूस करना
सब से अलग और सबसे खास बात है
मुझे सुना भी है, समझा भी है
जमाने भर के लोगों ने
सिर्फ वो है जो महसूस करता है मुझे

रामनारायण सोनी
०९.०९.२२


Saturday, 17 September 2022

सृष्टि है यह ईशमय

चाँदनी कब थी अलग जो चाँद में नभ में घुली
रोशनी को सूर्य से ना तुम अलग देखा करो।
इस सनातन सत्य को तुम जान लो पहचान लो 
इस जगत की अस्मिता को ईशमय देखा करो।।

सृष्टि का साकार दर्शन उस परम का दर्श समझो
जो पवन छू कर गई यह है मृदुल स्पर्श उस का।
भूख भी उसने बनाई अन्न भी उसने दिया है
वह पचाता जठर में खेल यह सब है उसी का।।

पाँच भूतों, पाँच तत्वों, पाँच प्राणों से बनाया
इन प्रपञ्चों से बुना है यह महा जंजाल समझो।
इन्द्रियों के पंचकों से इस कर्म का साधन लगाया
बुद्धि, मन और चित्त जोड़े यह तेरे भीतर सजाया।।

ज्योतियों की है परम ज्योति जो हमें ना दीख पाती 
सूक्ष्मतम प्रज्ञा हृदय में ज्ञान का दीपक जलाती।
चेतना बन प्रभु हमारे सर्व में बसता निरन्तर
वह चलाता,वह जिलाता न दृष्टि अपनी देख पाती।।

चेतना भर प्राण में, इन इन्द्रियों में और तन में
चर अचर में व्यापता है और है हर सूक्ष्म कण में।
दीखते न कर कहीं पर सृष्टि सारी रच रहा है
रंच भर न है कमी उसके करम में और सृजन में।। 

प्यास भी वह दे रहा है फिर बुझाने का जतन 
भूख का अध्यास दे कर दे रहा उसका शमन।
रात का दे कर तमस दी रोशनी भी सूर्य की
जाग दे कर नींद का कैसा निराला है प्रबन्धन।।

सत्य है केवल वही जगत मिथ्या का मिथक
सृष्टि के पहले वही था सृष्टि का केवल सृजक।
जो प्रलय के बाद भी होगा सिर्फ वह ब्रह्म ही
सृष्टिस्थितिविनाशानां है कार्य कारण सब वही।।

वचन अगोचर, दृष्टि अनामय, सृष्टि नियन्ता वो ही
अशरण शरण, भव-भय भंजक परमोद्धारक वो ही।
उसमें सब है सब में वह है होता वह, कर्ता वो ही
सब में उसको देखे जो नर ईश कृपा पाता वो ही ॥

रामनारायण सोनी
१८.०९.२२

नदिया बहती है क्यों


बहती हुई जीवन की यह नदी !
बहना उसका अकेला नहीं है
हरेक पल बहता है !
जल कण की तरह
रास्ते का हर घाट !
भाग्य ले कर खड़ा है..
तमाम स्वार्थ की कश्तियाँ खड़ी हैं
लंगर डाले इस नदी की छाती पर
अपने लिये जल है जीवन इस का
दुनिया के लिये जीवन है जल इस का
बहना है कर्म इसका
बहते रहना ही है धर्म इसका
उद्भव से अवसान तक

रामनारायण सोनी
१७.०९.२२

ज़िंदगी ज़िंदगी

जिन्दगी सिर्फ साढ़े तीन हर्फों की है

कब से लिखे जा रहा हूँ इस को
जिसको ज यानी जन्म से शुरू किया था
बचपन इस में इ की मात्रा लगाने में
याने इल्म पाने में खर्च हो गई
कई अच्छे मकाम जो थे रास्ते में
कुछ बरस इसके माथे बिंदी चढ़ाने में गुजरे
और मैं देख ता ही रह गया
जिदगी की दौड़ती रेल गाड़ी में बैठा रहा मैं
बाहर गाँव, नगर, नदी, पहाड़ और
द-से शुरू होने वाली यह दुनिया
सब के सब दौड़ते दिखाई दिये
ग से गुजरते गए कई मोड़
और जुड़ते गए कई जोड़
हॉफती रही यह फिर भी दौड़ती ही गई
द्वन्द्वों के बीच कौंधती रही कहीं कहीं
हास्य की निसर्ग रेखाएँ 
तमस भरे बादलों में बिजलियों की तरह
भाग्य के परिताप से पीछे रह गए
वे रिश्ते, वे लोग, वे राहें, वे पगडण्डियाँ
जानती है जिन्दगी की नदी कि
पास ही कहीं है समुन्दर का वो मुहाना
जिसे छोर कह लो, मृत्यु कह लो
चिर विछोह कह लो
संज्ञा और नाम इस के कई है
हर वर्तमान के काल के भाल पर
अतीत की मुहर जरूर लगती है
जिंदगी प्रमेय नहीं हो सकती
इसमें दो और दो हमेशा चार नहीं होते...

रामनारायण सोनी
१७.०९.२२

शूल और फूल

बहुत प्रयास किये तुम ने भी मैंने भी

न यादें मिटी, न पीछे छूटी रेखाएँ
न वे पल, न ही वे वाकिये
आँगन के बिरवे की टहनियों से झड़ते रहे
बहारें, फूल पत्तियाँ और खुशबू
पर उन गुदाज़ यादों के शूल
चख लेते हैं लहू के स्वाद को
कितना सुकून है इस दर्द और चुभन में
मैं उतना ही प्यार करता हूँ
इन निर्मम शूलों से
जितना करता रहा हूँ
फूलों से, पत्तों से, पंखुड़ियों से

रामनारायण सोनी
१७.०९ .२२

Tuesday, 13 September 2022

परिपूर्ण ब्रह्म


क्या मैं 
एक देह रूपी मंदिर हूँ ?
जिस में पवित्र आत्मा निवास करती है?
क्या मैं आत्मा हूँ ?
जो इस देह रूपी मंदिर में निवास करती है?
क्या मैं सम्पूर्ण हूँ?
जिसमें यह सम्पूर्ण ही निवास करता है?
हाँ! मैं सर्व व्यापक, परिपूर्ण ब्रह्म ही हूँ !!
अयमात्मा ब्रह्म

रामनारायण सोनी
१४.०९ .२२

Monday, 12 September 2022

मृदुल स्पर्श

समझ नहीं पा रहा हूँ मैं 
यह मेरी स्मृति है? 
इतिहास का स्पर्श है? 
ममता की ओढ़नी है? 
पुलक प्रेम का आकाश है? 
या उन पलों का वर्तमान में साकार हो जाना है? 
अचानक मेरे हाथ पैर छोटे छोटे हो गये हैं, 
नन्हीं सी मेरी उँगली को 
अचानक पकड़ कर मुझे खींच लिया है, 
फिर अपने मृदुल करों से उठा कर 
मुझे अपने हृदय से चिपटा लिया है
और! 
अचानक से माँ तुम कहाँ चली गई?

रामनारायण सोनी
१२.०९.२२

कितना फर्क है इन में

कितना फर्क है 

मिट्टी सुराही की, मिट्टी चिलम की
आसमान चाँद-तारों का, 
आसमान कड़कती बिजलियो का
जमीन चमन की, जमीन दफन की
कभी एक बारात गुजरती है सड़क से
हो जाता है आमना-सामना...
उसका किसी जनाजे से 
जिसने बनाया रंग सफेद...
उसी ने काला भी
क्यों बनाया एक परिन्दा...
खुले आसमान के लिए...
तो फिर क्यों बनाया ?
दूसरा पिंजरे के लिये

रामनारायण सोनी
१०.०९.२२

Tuesday, 6 September 2022

आँसू डाकिया भी है

एक दिन
मैंने पूछ ही लिया आँसू से
परिचय और कर्म उसका
वह कहने लगा 
सुनो तुम! और तुम्हारे ये लोग !
मैं खामोश हो कर भी बोलता हूँ
मेरी यात्रा शुरू होती है हृदय के सागर से
सागर जो बस खारा है
सागर जब तपता है तो मीठा हो जाता है
सागर जब उफनता है तो सैलाब आते हैं
सागर को जब मन्द पवन छूती है
तो मैं ले कर आता हूँ उसकी खुशबू
मैं पलकों पर ठहरता हूँ तो शबनम हो जाता हूँ
बहते बहते जब बहुत थक जाता हूँ 
तो सूख जाता हूँ अधबीच में ही
मैं निकलता हूँ सदा गर्म हो कर ही
मैं फैल जाता हूँ नयनों में जब जब
उनकी खामोशियाँ अनुवाद करने लगती हैं 
हृदय के उद्वेलनों का, भावों का, तरंगों का
मैं आता ही हूँ कुछ न कुछ कहने को
लाता हूँ चिट्ठियाँ डाकिये की तरह
मैं नारद भी हूँ और उनकी करताल हूँ
जब प्रिय और प्रियतम मिलते हैं
उनकी खामोशियों में भी 
भावों का अनुवाद करता हूँ मैं
मुखौटेबाजों से बहुत परेशान रहा हूँ
घुटता रहता हूँ भीतर ही भीतर 
परन्तु मैं श्रेष्ठतम तब हूँ
जब ईश्वर के अनुराग में बहता हूँ
कभी भक्तों के गालों पर ही सूख जाता हूँ 
तो कभी प्रभु के चरणों में चढ़ जाता हूँ
वहाँ विदेह हो कर मैं मुक्त हो जाता हूँ

रामनारायण सोनी
७.०९.२२

यमुना एक खोई नदी गंगा में

नहीं भूल पाने का दर्द
नहीं मिल पाने के दर्द से बड़ा है
रेंगते हुए त्रिकाल के सरीसृप 
जीवन की घाटियों और कन्दराओं से 
निकल निकल कर अट्टहास करते हैं 
एक अतीत निर्मम पहाड़ के नीचे दब गया
यह वर्तमान काले आकाश की ओर देखता है
जहाँ न चाँद-सूरज है, न तारे न जुगनू ही हैं
एक भविष्य के पृष्ठ में वह अभागा अध्याय 
लिखा ही नहीं जा सकता 
क्योंकि ऐसी कलम बनी ही नहीं
गर कलम बनी होती तो स्याही नहीं बनी
और स्याही गर कोई होती भी...
तो क्या होता? तो क्या ये लोग?
क्या ये दुनिया, ये दस्तूर, ये परम्पराएँ लिखने देती ? 
कोई कहानी चाहे कितनी भी जीवन्त हो, 
कहानी जो छटपटाती है
अनन्त प्यार का सागर ले कर भी
कलम की टिप पर खड़ी रह जाती है
कभी हो नहीं सकती है वह कोई उपन्यास
बहुत अजीब सी कहानी है यह 
जो न रुकती है, न बकती है, 
जो न तो ठहरी है, न ही चलती है
कहता है केवल सूत्रधार, 
अरे! दर्शक है तो केवल वही है
सुनता भी तो केवल वही है 
दो अदद मूक पात्रों को ले कर
नेपथ्य में लिखे-अनलिखे संवाद 
आत्माएँ कण्ठस्थ सुनाती थी जिसे
वे वाणी विहीन हैं, चुपचाप हैं, निष्पन्द हैं 
ये बड़ी बड़ी दीवारें, मेहराबें, कंगूरे, अट्टालिकाएँ
इनमें रौब-दाब हैं, दीवाने आम है, दीवाने खास है
पर इसमें दो ध्रुवों पर दो अन्तःपुर हैं
एक राजा का, और एक रानी का
उस पार, इस पार
दो अलग अलग संसार 
दो नदी, दो दो तट, दो धार
उद्गम से मुहाने तक बड़ा सारा विस्तार
हिमालय से गंगासागर तक का संचार
बिना किसी पावन प्रयाग के
गंगोत्री से सागर तक खिंची महीन रेखा
भगीरथ इसे नीहारिकाओं से निचोड़ कर
प्रेम की इस धरा पर छोड़ कर 
अदृश्य हो गया कहीं 
कान्हा की कालिन्दी अब 
नहीं पहुँच पायेगी कभी भी सागर तक
गंगा के तेज प्रवाह में बह गई यमुना
बह गया यमुना का नाम, पानी और अस्मिता भी बिना मिले बही जा रही है 
ये नदियाँ बहती है क्यों? 
एक पावन अदृष्य नदी सरस्वती 
ऐसे ही अचरज से देखती है इन्हें
सागर नहीं जान सकेगा कभी भी 
बिना देह की, बिना नाम की, 
बिना पहिचान की उस यमुना को 
जानेगा सागर केवल उस गंगा को
पूछ कर देखे कोई कपिल मुनि से
कि ये गंगा यों बहती है क्यों?

रामनारायण सोनी
६.९ .२२

Sunday, 4 September 2022

खुदी में खुद की तलाश

आओ सभी आईना पहन लें

मुझे मैं न दिखता मेरी आँख से ही
न तू देख पाया तेरी ही खुदी को 
है सारा नगर देखता दूसरों को 
किसी ने न देखा खुद में खुदी को।

कैसा है तू और है कैसा जमाना
उमर अपनी है, अब तक खपाई
बुरा ही बुरा सब है मेरे अलावा
सब की अकल में यही बात आई।

अब हर गले में, टँगा आईना हो 
नकली मुखौटे चलो सब उतारें
देखूँ मैं मुझको तेरे आईने में
जानें स्वयं को, स्वयं को पुकारें।

है बाहर जगत, एक भीतर जगत
ये देखी जमी, लोग देखे हजारों
कभी सामने, कभी मन में हमारे
जगे अपनी प्रज्ञा, चलो अब पुकारो।

जगते में सपना है सोते में सपना
सपना हुआ ना कभी कोई अपना
ना यह सच, ना वो सच, जानें जरा
पहचाने मिथ्या ओ निज रूप अपना

ना तो ये सच है और ना वो सच है
चर में अचर में जो मौजूद रहता
सृष्टि के पहले, प्रलय के भी आगे
वही ब्रह्म था और वही शेष रहता

चलो आँखों में ऐसा अंजन लगाएँ
जगें नीद से और सब को जगाएँ
छह शत्रु खुद में छिपे हैं जो बैठे
खुद के ही पौरुष से उनको हराएँ

ये जमीं आसमां ये अगन ये पवन
ये बस्ती ये गलियाँ ये आँगन बुहारें
सब की है और है ये सब के लिये 
चलो आज मिल के हम सब सुधारें

रामनारायण सोनी
४.०९.२२

Friday, 2 September 2022

आओ सभी आईना पहन लें

आओ सभी आईना पहन लें

मुझे मैं न दिखता मेरी आँख से ही
न तू देख पाया तेरी ही खुदी को 
है सारा नगर देखता दूसरों को 
किसी ने न देखा खुद में खुदी को।

कैसा है तू और है कैसा जमाना
उमर अपनी है, अब तक खपाई
बुरा ही बुरा सब है मेरे अलावा
सब की अकल में यही बात आई।

अब हर गले में, टँगा आईना हो 
नकली मुखौटे चलो सब उतारें
देखूँ मैं मुझको तेरे आईने में
जानें स्वयं को, स्वयं को पुकारें।

है बाहर जगत, एक भीतर जगत
ये देखी जमी, लोग देखे हजारों
कभी सामने, कभी मन में हमारे
जगे अपनी प्रज्ञा, चलो अब पुकारो।

जगते में सपना है सोते में सपना
सपना हुआ ना कभी कोई अपना
ना यह सच, ना वो सच, जानें जरा

ना तो ये सच है और ना वो भी



सभी लोग अपने हैं आओ पुकारें

ये जमीं आसमां ये अगन ये पवन
ये बस्ती ये गलियाँ ये आँगन बुहारें
सब की है और है ये सब के लिये 
चलो आज मिल के हम सब सुधारें

चलो आँखों में ऐसा अंजन लगाएँ

....... निरन्तर

रामनारायण सोनी
02.09.22

खामोश चिट्ठी

तुम्हारे नाम से शुरू मेरे नाम से खत्म मेरी चिट्ठी
इस बीच कोई लिखा हाल न खबर ये मेरी चिट्ठी
हर बार फिर भी तुमने सिद्दत से पढ़ी मेरी चिट्ठी
मेरे दिल से तेरे दिल का नाजुक जोड़ मेरी चिट्ठी
हो गया होगा महसूस उन लफ़्जों और जुबान का
जो बयान करती है जो खामोशियाँ मेरी चिट्ठी
इन्हीं खामोशियों ने फिर गज़ल गाई नज़्म गाई
बिना बोले भी कितना बोलती है ये मेरी चिट्ठी

रामनारायण सोनी

२.०९.२२


Tuesday, 30 August 2022

गर मैं पागल होता

गर मैं पागल होता

गर मैं पागल होता तो
बस तू होता और मैं होता
प्याले पर नाम तेरा होता
तो विष भी वह अमृत होता

आँसू धार बही सब खातिर
पर एक बूँद तुझे चढ़ जाती
मेरे अगले पिछले सारे
जनम जनम के अघ धो जाती
   गर मैं पागल होता तो
   बस तू होता और मैं होता।।

लौटा दे वह भोला बचपन
जब तू संग रमा करता था
तुतलाती लटपट बानी तू
जो हर बार सुना करता था

मुझे जिताने खातिर नटखट
खुद तू हार लिया करता था
रोता था मैं जब जब गिर कर
बढ तू थाम लिया करता था
   गर मैं पागल होता तो
   बस तू होता और मैं होता।।

मैंने कभी नहीं माँगा कुछ
सब देता है, तेरी मर्जी
चाहे दे इस हाथ अभी ये
फिर लौटा ले, तेरी मर्जी

जनम मरण है हाथ तुम्हारे
यह जीवन भी, तेरी मर्जी
बाहर भीतर तू ही तू है
इतना सा गर समझा होता
   गर मैं पागल होता तो
   बस तू होता और मैं होता।।

जर्जर मेरी नाव हुई है
तट भी छूट गये हैं सारे
धार तेज है भँवर बड़े हैं
तन भी मन भी दोनों हारे

बिन पतवार बही जाती है
मेरा भरोसा है कि तुम ही
मातु पिता या बन्धु बनोगे
भव से तारोगे बस तुम ही
   गर मैं पागल होता तो
   बस तू होता और मैं होता।।

रामनारायण सोनी
२८.०८.२२

Saturday, 27 August 2022

छाया कैसी कैसी

तुम चलो ! छाया चलती है
तुम रुको! छाया रुकती है
पर विज्ञान ने इसे मोडीफाय कर दिया
जब तुम चले, जब तुम रुके
जस का तस लेन्स के उस पार
अंकित कर के रख लिया
अब छाया बोलती है, चलती है
नाचती है , गाती है,
हँसाती, रुलाती है, गुदगुदाती है
कभी कागज पर छप कर
कभी पर्दे पर उतर कर
कभी मोनीटर के स्क्रीन पर
छाया अब प्रतिच्छाया नहीं रही

रामनारायण सोनी
२४.०८.२२

साहिल पर क्यों बैठे हो

सुना है! थी तो वह बेजान लाश
जो चार सौ किलोमीटर तक तैर गई
बिना किसी साँस के, बिना किसी नाव के
बिना किसी साथ के, बिना किसी ताव के
तुम हो कि साहिल पर डरे डरे से
खड़े हो भारी भरकम लंगर डाल के
साहिल पर लगी नाव ले कर
पर लाशें उतर गई उफनते दरिया में
क्योंकि लाशें डरती नहीं
मौत से, आँधियों से, भवरों से
पानी में मगरों से और भीमकाय अजगरों से
अपनों से, परायों से, दोपायों से, चौपायों से
तीरों और तलवारों से
कह रही है वह कहानी, अपनी ही जुबानी
जिन्दगी को हार कर भी मैं
मीलों तक चलती ही रही
मेरी व्यथा में रोने वालों तक से नहीं कही
जल कर हो जाऊँ, मिल जाऊँ भले खाक में
पर साहस की, शौर्य की
एक कहानी अपने नाम जरूर लिख जाऊँगी

रामनारायण सोनी
२६ .०८.२२

ऐ विराट नभ!

ऐ!नभ  ऐ! विराट

नभ विशाल! ऐ नभ विराट
तेरी गाथा है अमित अपार
तुझ में बसते है सूर्य चाँद
क्या नाप सका कोई प्रसार

तू हर खाली घट में रहता
तुझ में ही तो सारे घट हैं
धरती मानव जीव जन्तु की
जीवन सरिता का पनघट है

अम्बर तुम इतने विराट
क्षीर समुद्र कहाते हो तुम
ग्रह नक्षत्र तारिकाओं के
आश्रय दाता हो केवल तुम

तुम असीम तुम महाशून्य
तुम पंच तत्व में भी प्रधान
सृष्टि उदर में बसी तुम्हारे
है इसीलिये महिमा महान

नारायण तुझ क्षीर सिन्धु में
शैया शेष लिये बसते हैं
सप्त लोक और भुवन भी
तेरे आश्रय में रहते हैं

तुम में बादल और पखेरू
हैं आजाद विचरते रहते
पवन प्राण और गन्ध लिये
तुम में ही नित बहते रहते

गरिमा लघिमा और महिमा
इन शक्ति के तुम हो धर्ता
बिन तेरी इस महिमा के यह
सृष्टि सृजन ना सम्भव होता

रामनारायण सोनी
२८.०८. २२

गगन तुम्हारे अमित रूप

गगन तुम्हारे अमित रूप

गगन तुम्हारे अमित रूप, पर हर रूप निराला है
दिन में कितना उजला है, और रजनी में काला है।
सघन घनों को धरते हो तो, श्यामल तुम हो जाते हो
स्वच्छ सलोने हो कर तुम, नील गगन कहलाते हो।
गगन तुम्हारे अमित रूप, पर हर रूप निराला है।।

प्राची में जब अरुणिम ऊषा, सूरज ले कर आता है
वह कनक थाल तब तब, कुंकुम रोली बिखराता है।
कभी टाँक लेते हो तन में, तारक हीरे माणक मोती
कभी चाँदनी घोल धरा को, पहनाते दुधिया धोती।
गगन तुम्हारे अमित रूप, पर हर रूप निराला है।।

बने क्षितिज पे नील कटोरा, तान रहे हो तुम वितान
इसमें जग ने हर दिन देखे, नित नूतन नव-नव विहान।
कभी चंदोवा तनता नभ में रजत थाल सज जाती है
अमृत की गागर फिर भर कर धरा धाम नहलाती है।
गगन तुम्हारे अमित रूप, पर हर रूप निराला है।।

रामनारायण सोनी
२७.०८.२२

Thursday, 25 August 2022

कहानी लिख जाऊँगी

सुना है! थी तो वह बेजान लाश
जो चार सौ किलोमीटर तक तैर गई
बिना किसी साँस के, बिना किसी नाव के
बिना किसी साथ के, बिना किसी ताव के
तुम हो कि साहिल पर डरे डरे से
खड़े हो भारी भरकम लंगर डाल के
साहिल पर लगी नाव ले कर
पर लाशें उतर गई उफनते दरिया में
क्योंकि लाशें डरती नहीं
मौत से, आँधियों से, भवरों से
पानी में मगरों से और भीमकाय अजगरों से
अपनों से, परायों से, दोपायों से, चौपायों से
तीरों और तलवारों से
कह रही है वह कहानी, अपनी ही जुबानी
जिन्दगी को हार कर भी मैं
मीलों तक चलती ही रही
मेरी व्यथा में रोने वालों तक से नहीं कही
जल कर हो जाऊँ, मिल जाऊँ भले खाक में
पर साहस की, शौर्य की
एक कहानी अपने नाम जरूर लिख जाऊँगी

रामनारायण सोनी
२६ .०८.२२

बारिश की बूँदें


चलो आज बारिश की बूँदों से खेलें
शबनम से मोती को हाथों पे झेलें
बहुत दूर से ये जो चल के है आई 
इन्हें भी तो हौले से दो बोल कह लें
    चलो आज बारिश की बूँदों से खेलें

ये सावन का मौसम, घटा ये घनेरी
ये धरती की गोदी है चुलबुल छरेरी
ये धनुवे की रंगीन आभा रुपेहरी
चलो आओ बाहों में इन सब को लेलें
    चलो आज बारिश की बूँदों से खेलें

ये स्वांति का नक्षत्र, पिऊ पिऊ रटना
ये दादुर का टर टर दिन रात करना
ये चुर चुर का पानी ये झर झर है झरना
चलो आज इसमें ये तन मन भिंगो लें
      चलो आज बारिश की बूँदों से खेलें

ये पीपल की शाखों बँधे प्यारे झूले
लगा ऐसी पींगें कि आकाश छू लें
वो मस्तों की टुल्लर यहीं आ रही है
चलो छप छपाके गलियों में कर लें
     चलो आज बारिश की बूँदों से खेलें

ये कजरी दे आल्हा ये ठुमरी का गायन
ये मोरों का बगिया में मस्ती का नर्तन
लगे सारा उपवन खिला जैसे मधुबन
चलो हम भी पैरों में घुँघरू बधा लें
      चलो आज बारिश की बूँदों से खेलें

ये कैसा नशा है ये खुशबू पनीली
बिजुरी जो कड़के डरे गोरी भोली
ये जुगनू की चकमक किसे ढूँढती है
चलो लुत्फ थोड़ा ये हम भी उठा लें
      चलो आज बारिश की बूँदों से खेलें

ये टिप टिप टिपाते मद्दम पनाले
हवा के परों पे झुलाती हिंडोले
ये सर सर सराती वो बौछार डाले
चलो भूल हस्ती जरा इन में न्हा लें
      चलो आज बारिश की बूँदों से खेलें


Contd..

रामनारायण सोनी

अब क्या लिखूँ मै

.जब भी मैं गाँव लिखता हूँ
गाँव का चौपाल लिखता हूँ
चौपाल में खड़ा वटवृक्ष दिखता है
वटवृक्ष पर चिटिर पिटिर करते
रक्तकण्ठी हरे कच तोते लिखता हूँ
और सूरज से आती उस अप्रतिम ऊर्जा को
देखता हूँ जीवनी शक्ति में परिवर्तन होते
और जब जब मैं आश्रम बनते देखता हूँ....
.. वनस्थली के घर आँगन को
बाड़े में रंभाते गाय के बछड़े को
ममतामयी छाया में दुलार का स्पर्श देखता हूँ
जहाँ पवन बुहारता भी है, संगीत भी सुनाता है
फिर...
जब मैं लिखता हूँ गँवई लोक धुन पर 
थिरकती हुई किशोरियाँ का सुरम्य लोकनृत्य
जहाँ प्रकृति स्वयं लाती है प्रभाती का पर्व
और भी है जो मैं लिख नहीं सका
इनकी सब की हर आहट में देखता हूँ, 
स्तब्ध हो कर
तो उभरता है एक सौम्य सा, सरल सा...
ममत्व से, अपनत्व से, मुस्कान से 
स्नेह से परिपूर्ण चेहरा
जनक दीदी का

रामनारायण सोनी
25.08.22

Wednesday, 24 August 2022

कैसी ये खुशफहमियाँ

एक दिन इश्क के महल में
घुस क्या गया मैं
रास्ते, दरवाज़े, बाहर जाने के
बन्द हो गए हैं सभी
पर तभी कोई दीवार चठकी
और तुम शायद मलबे के उस पार खड़े थे 
बस आवाजें दौड़ती हैं मेरी सभी दिशाओं में
गूँज उठती है मेरी पुकार कि तुम कहाँ हो?
पूछता हूँ दरख्तों से, आम्र कुञ्जो से, 
तितलियों से, उन सूख चुके फूलों से
पर मेरी प्रतिध्वनियाँ, मेरी पदचाप
सिर पीटती हुई लौट लौट कर आती है
बावजूद इसके मैं खुश हो लेता हूँ
कि जैसे वे तुम्हारी ही हैं
देखा नहीं किसी ने भी
मेरी गलत फहमियों को 
इस तरह खुश फहमियों में बदलते

रामनारायण सोनी
२५.०८.२२

Tuesday, 23 August 2022

मुझे मैं क्यूँ पसन्द हूँ

चाहे तुम इसे..
अपने प्रिय से, प्रियतम से, 
स्वामी से, सखा से, अनुचर से..
यहाँ तक कि अपने सेवक से कहो
या फिर 
स्वयं उस परमात्मा से कहो!!!
कि, मुझे मैं इसलिये पसन्द हूँ
कि
मै सिर्फ तुम्हें पसन्द करता हूँ
तो समझो कि 
तुम उपलब्ध हो गए हो
गीता के समत्व योग को

रामनारायण सोनी 
१०.०८.२२

ड्राफ्ट

आइना कहता रहा कि जानता हूँ मैं तुम्हें
मैं मुकरता ही गया कि तुम मुखौटा पढ़ रहे।
पर कोई बैठा छुपा है सक्ष मेरी ही खुदी में 
रात दिन बस बिम्ब दोनों द्वद्व कैसा लड़ रहे।।

चाँदनी कब थी अलग जो चाँद में नभ में घुली
रोशनी को सूर्य से ना तुम अलग देखा करो।
इस सनातन सत्य को तुम जान लो पहचान लो 
इस जगत की अस्मिता को ईशमय देखा करो।।

सृष्टि का साकार दर्शन उस परम का दर्श समझो
जो पवन छू कर गई यह है मृदुल स्पर्श उस का।
भूख भी उसने बनाई अन्न भी उसने दिया है
वह पचाता जठर में खेल यह सब है उसी का।।

पाँच भूतों, पाँच तत्वों, पाँच प्राणों से बनाया
इन प्रपञ्चों से बुना है यह महा जंजाल समझो
इन्द्रियों के पंचकों से इस कर्म का साधन लगाया
बुद्धि, मन और चित्त जोड़े यह तेरे भीतर सजाया

ज्योतियों की है परम ज्योति जो हमें ना दीख पाती 
सूक्ष्मतम प्रज्ञा हृदय में ज्ञान का दीपक जलाती
चेतना बन प्रभु हमारे सर्व में बसता निरन
वह जगाता, वह चलाता 




चेतना को निष्प्राण को
आधि दैहिक आधि दैविक आधि भौतिक 


प्यास भी वह दे रहा है




रामनारायण सोनी

Thursday, 18 August 2022

चन्द अशआर

चन्द अशआर

जो था मैं कभी अब वो रहा मैं नहीं
जो हूँ आज वो किसी को पता नहीं

मुझसे नाराज हो के फिर तुम
खुद से ही खफ़ा होते हो क्यूँ?

ये माना कि इश्क में बंदिशें बहुत है
बन्दगी है इश्क इतना ये समझा हूँ मैं
इश्क दरिया है, इश्क राह जीने की
इश्क इबादत है इतना ही समझा हूँ मैं

जो बाजार में दिन भर ताले बेचते हैं
दुकानें उनकी भी कभी लुट जाती है।
बिसात पर तो खेल कई देखे हमने
बिन खेले भी बाजियाँ जीती जाती है

जो उनकी आँखों में बयां होते है
वो लफ्ज किताबों में कहाँ होते हैं।
ये गाती हैं गीत गज़लें और नज़्मे
जरा देख ! यहाँ कितने जहां होते हैं

रख लो आईने हजारों हज़ार लेकिन
हकीकत से नजरें मिलानी ही पड़ती है

जवाब फल से दिया जाता है पत्थर का
एक पेड़ होना भी बड़ा इम्तिहान है

वो खुद आईना धोता फिर रहा है
उसे अपने चेहरे पे शक हो रहा है
ये कैसा मलाल है उसकी समझ में
चिराग बुझा के अँधेरों से लड़ रहा है

सूरज का डूबना तय था और चाँद का सँवरना भी
शिद्दत से हो रहा था जिन्दगी का गुजरना भी.....

ये जिन्दगी तमन्नाओं का गुलदस्ता ही तो है
कुछ मुरझाती है तो कुछ चुभ जाती है।

रात की बात न कर वहाँ रोशन माहताब होता है
हर सक्ष अपनी हदों में खुद लाजवाब होता है

न मीरा की पीर हूँ, ना ही मैं कोई कबीर हूँ
फख्त शब्दों से इश्क है, ऐसा इक फ़कीर हूँ

मोहब्बत कोई धूल भी नहीं कि हवा में उड़ा दूँ
इश्क कोई जंग भी तो नहीं कि पत्थर से लड़ा दूँ
रात बहुत काली है, जालिम है, कैसे मैं ये भुला दूँ?
राह तेरी रोशन हो, आ मैं दिया दिल का जला दूँ

तुमने शायद मान लिया है अब ये पूरी तरह
कि साँसों का चलते जाना जिन्दगी है मेरी
अहसास, जज़्बात रख के भूल गए हो कहीं
मेरा इश्क सरहदों पार भी एक बन्दगी है मेरी

मेरी मुफलिसी अब हद को पार कर गई 
जितनी भी पास थी मोहब्बत, खर्च हो गई

मेरी साँसे कुछ बेसुरी सी हो गई है सुनो तो ज़रा
मेरी धड़कने उधड़ सी गई हैं फिर बुनो तो जरा
बस्तियाँ, कारवाँ, वो लवाजमें कहीं गुम हो गए
जब से गए तुम, गुम हो गए हैं हम सुनो तो ज़रा

एक तुम ही तो थे जिसे बताता था मै राज-ए- दिल
अब न लोग सुनते हैं न ही मगरूर खामोशियाँ ही
तुम्हारे हिस्से का वह वक्त मैं अब भी खाली रखता हूँ
और सोने के पहले ही वे हसीं यादें सिरहाने रखता हूँ

इन्तज़ार में एक जिन्दगी कम पड़ जाएगी, मालूम ना था
वरना दो जिन्दगियाँ रब से माँग लेते, इसी जिन्दगी में

तुझे पता नही है, जिस्म से इश्क बड़ा होता है
न जलता है न गलता है न ही ये फ़ना होता है
इश्क जिन्दगी की रोशनी भी है ताजगी भी
ओढ़ लिहाफ जो  इश्क के धागो से बुना होता है

थक जाती हैं आवाज और लफ़्ज भी थक जाते हैं
ढूँढते ढूँढते ।
अकेली एक अदद खामोशी ढूँढ लाती है कहीं से भी तुम्हे।।

उन लम्हों के उस शबनमी आब के क्या कहने
महसूस करता हूँ उसका कुदरती नूर अब भी
उन लम्हों में जो खुशबू थी न, वो तुम्हारी ही थी
कमबख्त महकते हैं उसी तरह याद में अब भी

गुजर जाती है हर रात वो उदासी लेकर तनहा तनहा
फिर उस दिन तो हम भी हुए थे यूँ ही तनहा तनहा
दिल से कहीं दूर निकल आए हैं हम यूँ ही तनहा तनहा
गुजरी हुई बारिश में हो जैसे एक बूँद तनहा तनहा

लिखा नहीं जा सकता उसे, जिसे महसूस किया
पढ़ा नही जा सका उसे, जिसे महसूस किया
पढ़ना लिखना तो सिर्फ कलम की घिसावट है
दिलों की जुबान वही समझे जिसे बस महसूस किया

चीजों और रिश्तों का फर्क समझना होगा
आसमां में घर नहीं होते जमीं पे उतरना होगा।
रोशनी उधार की लम्बी नही चल सकती है
अपने ही दिये से घर में उजाला करना होगा।।

हाँ आज तलक घर पे घर बदले हैं कई मैंने
पर बदला नही है ये तेरा दर मैंने कभी भी
तू जानता है ये कि यह घर-दर और ये दुनिया
बदलूँगा जब, तू भी न जान सकेगा कभी भी

मैं मिट्टी हूँ मिट्टी कहानी मेरी
कल भी यही थी कल भी रहूँगी
घड़ा हूँ, चिलम हूँ या सकोरा रहूँ
आखिर में फिर भी मैं मिट्टी रहूँगी

वक्त ने एक दिन कान में यह बुदबुदाया
ये चपल पल जो भी है अभी हाथ में मेरे I
कल मैं तुझे यह फिर ना लौटा सकूँगा
इसलिए चल हमकदम बन कर साथ मेरे।।

फानूस सी मेरी इस छत में टँगी है आशाएँ
सोने की जुगत करता हूँ तो शोर मचाती है।
फिक्रों की किताब सिरहाने रख कर मेरे
जिन्दगी एक खामोशी दे कर चली जाती है।।

रिश्तों को थोड़ा वक्त चाहिये निगाहों को फक्त तू चाहिये
रात की माँग में हैं सितारे बहुत मुझे रोशनी की किरन चाहिये।
है मय के पियाले निराले बहुत मुझे बस तुम्हारी नजर चाहिये
है बस्ती में लाखों नगीने भरे नहीं ये मुझे फक्त तू चाहिये।।

मैं अमीर था शहर में कई रईसों की तरह
एक दिन आई तकदीर कोई सक्ष लेकर।
मेरे हिस्से में था जो मेरे दिल का कवंल
चुरा लिया है मुझसे मेरा वो ही दगा देकर।।

जिन्दगी की अजब चाल कभी सबक एक देती है।
पूरी कायनात दे कर भी उस एक को छीन लेती है।।

रामनारायण सोनी
१.०८.२०२२

आरजू, इम्तिहान, मिन्नतें, मुश्किलें वो रास्ते हैं पगडण्डियाँ हैं।
चलते रहो, चलते रहो तकदीर से शायद कहीं वो मिल जाए।।
वो चाहत भी कोई चाहत है ? जो कहीं मोम सी पिघल जाए।
वो इश्क ही क्या जो फौलाद की बर्छियों से भी कट जाए।। '

सारा खार नमी में घुल कर नयनों से बह गया है।
क्या कहूँ, तेरी याद का हर पल मीठा हो गया है।।

अब मैं यही कहूँगा कि तेरी यादें बहुत मीठी है।।

मैं बहुत बोलता रहता हूँ यूँ ही वक्त बेवक्त तुमसे।
शायद सुनोगे फ़क्त मेरी आखरी खामोशी के बाद।

बावरा मन देखता है कई सपने
जो बने ही है टूटने के लिए

यूँ तो नजर का काम ही है देखना और देखते रहना
मगर एक उसे क्या देखा फिर तो उसी उसी को देखा

हर मुलाकात का अंजाम बिछड़ना ही होगा
जलेगा दीप कब तक, अंजाम अंधेरा ही होगा
माना कि एक दरिया बने और खूब बहे हो तुम
पर इक दिन चल के समुन्दर में ही गिरना होगा

मिरी दिल की जमी पर तुम क्या उगे
सारा जीवन सुहाना चमन हो गया

तुम्हें अब कुछ भी कहना शिकायत सा लगता है
हमें चुपचाप अपने अंदर ही रहना अच्छा लगता है
जमाना और अपने ही कहे जाने वाले ये सब लोग
जख्म देते हैं तेरे नाम से, ये दर्द मुझे अच्छा लगता है

जिन्दगी हारी हमने उम्र भर के इन्तेजार में
किया गुम खुद को तुम्हें अब तक ना पाया है
बड़ा अचरज दिखा हमको हमारे इस सफर मे
नही है पास वो फिर भी रगों में क्यूँ समाया है

इन आँखों की दहलीज पर अभी आँसू ठहरे हैं
पलकों के किनारों पे काजल के सख्त पहरे हैं
रिसते रहे इस रात में पुरजोर दिल के अंदर से
एक सागर है बसा सीने में इनसे ही तो उभरे हैं

रामनारायण सोनी

🌹🌹🌹🌹💐🌹💐

मैंने लिखना छोड़ा तुझको,
पर तुम्हें भजना छोड दिया क्या ?
कब लडूँगा आखिर खुद से खुदी में,
मैं इस जंग में अपनी हार को
मुकम्मल तुम्हारी जीत महसूस करता हूँ
तुम्हारी दुआओं का असर
था जब तक उन दवाओं में
वे हजार गुना काम करती थी,
वे तो अब निरे चूने की टिकिया हो गई है

शहर छूटा, घर छूटा, छूटे पीछे यहाँ वहाँ कई लोग
न छूटी छबियाँ, पल, नजर में उस नजर का संजोग

मैंने कभी माँगा ही नहीं, रब ने दिया उसकी मर्जी
इस हाथ दिया उस हाथ लिया, जो किया उसकी मर्जी
आज मैं हूँ; मेरे सब हैं, कल हो न हो उसकी मर्जी
खाली हाथ आये फिर खाली हाथ चले उसकी मर्जी

किसी की मंजिल खोई होगी पर हमारे रास्ते ही खो गए हैं
कश्ती किनारे से कुछ ही दूर थी हम बे पतवार हो गए हैं
सदियाँ हम से ले लो खुशी खुशी कुरबान कर देंगे हम
सिर्फ कुछ लमहे ले के उनसे हम कितने कर्जदार हो गए हैं

एक बड़ी भीड़ से हमने भी जीत कर बता दिया
आखिर में हम हारे भी तो सिर्फ़ उस एक से हारे

समझ नहीं पाये हम कि क्या उसे फिकर नहीं
या कि उसके दिलो में बाकी मेरा जिकर नहीं

जागती खामोशियों में उफनती यादों के बीच
पलकों का इस तरह भींग जाना ही बदा था
जलजलों की शक्ल में कुछ इस तरह बिफरा
दिल का सैलाब था बाँध में सब्र के ये बँधा था

ये बेनाम रिश्ते हैं न देखों इन्हें हदों में बाँध कर
बने प्यार के हैं ये रिश्ते इन रिश्तों से प्यार कर

हसीं हमसफर देखे होंगे कई
बरसों चले साथ हमको देखा नहीं
आँखों के आँसू बहुत देखे होंगे
ये दिल कितना रोया है देखा नहीं

मैं एक लम्बे अर्से से एक जहान की तलाश में हूँ
जहाँ तुम रहो, हाँ सिर्फ तुम रहो और सिर्फ मैं रहूँ

तुमने उतर कर कई बार देख लिया है मेरे दिल में
होंगे कई वहाँ पर खास एक जगा है तुम्हारी दिल में


वे छोटी छोटी बाते गर हुई न होती मेरी जिन्दगी में

तो फिर ये बड़ी बात कभी हो नहीं पाती बन्दगी में

देखे हैं तूने खूबसूरत फूल चमन में कई किसम केछाले भरे, मिट्टी सने देखे न हाथ कभी बागबां के

बूँदे जो बिछड़ी थी समन्दर से ये तो सफर का आगाज है

उठना, चलना, गिरना फिर उसी ओर बहना खूबसूरत अन्दाज़ है


🌹🥀🔥🥀🌹🥀🔥


देखे हैं तूने खूबसूरत फूल चमन में कई किसम के

छाले भरे, मिट्टी सने देखे हैं हाथ कभी बागबां के?


सतहों को देख कर गहराई न जान पाओगे

हर डूबने वाली लाश सतहों पर ही तैरती है


खो दिया खुद को तुझी में पा सकूँगा ना अब कभी

ये इश्क है कि इबादत है समझ सका न तब न अभी


किसे याद रखूँ किसे भूल जाऊँ कुछ भी सूझता नहीं।

आखिर होता यही है कि जिसे भूलना चाहूँ उसे भूलता नहीं।।


हदों में रह कर, बँधे से रह कर प्यार कभी हो नहीं सकता।

प्यार करना गलत नहीं पर गलती से प्यार हो नहीं सकता।।


बदल सका है कौन कभी इस आज को कल में

फिर आज को खो कर क्यों डूब रहे हम कल में।

जो बीत ही गया उसे दबा रहने दो उसी कल में

होगा कल कैसा हमारा ये तुम सोचना कल में।।


बेकार कोशिश करता रहा तेरी कहानी का किरदार बनने की।

मैं खुद अब अपनी अधूरी कहानी लिये घूमता हूँ गली गली।।


पुरानी सी किताब से मिली है एक कागज़ की वो कश्ती।

लिपटी मिली हैं उसमें ढेरों किलकारियाँ, मौज और मस्ती।।

क्यों उदास हूँ मैं ?

क्यों उदास हूँ मैं

बड़ी अजीब सी बात है
मैं इसलिये उदास हूँ कि!
बहुत दिनों से मुझसे कोई लड़ा नहीं
मेरे कानों ने बहुत दिनों से
'तुम पागल हो!' सुना नहीं
एक अर्से से इन सूखी आँखों से
खारा पानी बहा नहीं
चाय के इस एक प्याले से
चाय पी नहीं साइड बदल कर

मैं उदास हूँ कि !
वे खिड़कियाँ अब बात नहीं करती
मन्दिर की वे सीढ़ियाँ मुझ से पूछती हैं
कि तुम अकले ही क्यों आये हो?
छतों पर कबूतरों की सी
गुटरगूँ अब सुनाई नहीं देती

मैं उदास हूँ कि!
इस किनारे की नाव
जब से गई है उस पार
वह कभी लौटी ही नहीं
आँगन का पीपल अपने पत्तों की
पीटता रहता था तालियाँ
तुम्हारी खिलखिलाहट देख कर
बरस भर अब पतझड़ रहता है उस पर

मैं उदास हूँ कि!
कूकती कोयल के सुर
भेद जाते है मन, प्राण, हृदय को!
अनमनी मुंडेर पर
नहीं सुनी काँव काँव अर्से से
बूढ़े बरगद की झूलती जड़ों पर
अब भी चिपके हैं वे
हाथों के वे मृदुल स्पर्श तुम्हारे
रक्तकण्ठी हरे कच सुग्गे दोहराते हैं
पुकारे गए हमारे तुम्हारे नामों, सम्बोधनों को
क्या यादों के तुम्हारे उस नीड़ में
उन पलों के पंछी कभी लौट कर नहीं आते?

रामनारायण सोनी
    १७.०८.२२

Tuesday, 16 August 2022

किसे ढूँढता है यह सक्ष

😳 किसे ढूँढता है यह सक्ष 😢

बिल्लोरी काँच की ऐनक के
पीछे से एक जोड़ी नम आँखें
धुन्दियाती, चुन्धियाती आँखें
नीले विस्तीर्ण अम्बर पर छितरे
श्वेत श्याम बादलों में गड़ जाती है
सहसा उभरता है बेटे का बचपन
खिलखिलाता रेशमी एहसास सा
तभी वक्त की बहकी हवाएँ चली
बादल बिखर गए गल गल कर
टूटी तन्द्रा, पसर गई नीरवता
   जिन्दगी तार-तार, निराधार
   शून्य ही शून्य चहुँ ओर

खाली आसमान अनन्त अपार
कितना खाली खाली संसार

बचपन जो उसकी गोद खेला
अपनी काँपती उंगलियोँ में अब
उस बेटे की छुअन को ढूँढता है
उम्र से झुके इन काँधों पर
बैठे मचलते उस बचपन के
महसूस करता है भार को
तब ये काँधे जवान थे
हाथों में भी कर्म के संधान थे
अब अहसास का बोझ भी असह्य है
शिराएँ मन्द हैं, धमनियाँ निष्पन्द हैं
इधर तन गला गला, मन बुझा बुझा
बातें सिर्फ फजाएँ ही सुनती है
आशाएँ अपने हाथों सिर धुनती हैं
  फिर भी आशीष को उठे हाथ
  दिशाओं में फैल जाते हैं

खाली आसमान अनन्त अपार
कितना खाली खाली संसार

किस कदर ये पीढ़ियाँ बदल गई
संस्कृति पूरी की पूरी निगल गई
संवेदनाएँ श्मसान में और
श्मसान चौराहे पर खड़ा है
विश्व-गुरू की आकाँक्षा, आदर्श लिए
राष्ट्र कितना बेसुध पड़ा है
अतीत की पोटली से सोनचिरैया
चीख चीख दुनिया को  दिखाते हैं
स्वर्ण कूड़े के बदले बिक चुका है
चिरैया बेजान खिलौना हो चुका है।
   जानती नहीं पीढ़ियों की ये भेड़ें
   एक दिन इसी गर्त में वे ही गिरनी है।

खाली आसमान अनन्त अपार
कितना खाली खाली संसार

रामनारायण सोनी 

Saturday, 13 August 2022

कौन दस्तक दे रहा है।

वेदना के द्वार पर यह कौन दस्तक दे रहा है ?
क्यों पराई पीर को अपने हृदय में बो रहा है?
टाँग दी अपनी खुशी अपने मकां की खूंटियों पर
छोड़ फूलो की मसहरी कंटकों पे चल रहा है
           कौन दस्तक दे रहा है।

कौन है वह सक्ष जिस के कण्ठ में है प्यास तेरी
कोई भूखा गर रहा तो सामने की थाल फेरी
जागती संवेदना जब दस्यु भी कवि हो रहा है
सो रहा जब जगत यह मौन साधक जग रहा है
           कौन दस्तक दे रहा है।

हाथ में ले कर मथानी शास्त्र को जब जब बिलोया
सूत्र का नवनीत ले फिर थाल में तेरे संजोया
जिन्दगी के कायदों को माला में ऐसे पिरोया
कौन है जिसने सुधा को छोड़ के विष पी रहा है
           कौन दस्तक दे रहा हैl

तीन कालों में विचरता कुछ ढूँढता किसके लिये
उस घडी के उन पलों को क्या कभी उसने जिये
काव्य की पावन धरा तू देख कितनी उर्वरा है
खेत तेरा हो भले वह बीज आ कर बो रहा है
           कौन दस्तक दे रहा हैl

             रामनारायण सोनी
               १४.०८.२२

Thursday, 11 August 2022

बस कुछ बूँद चाहिये

सुचिते!
माना कि तुम समुन्दर !
मैं बस कुछ बूँद माँगता हूँ!!
सुनयने!
थोड़ा सा वक्त चाहिये
मेरी उन बातों को सुनने को
जो मेरी पीड़ाएँ कहना चाहती है
प्रिये!
मेरे दिल में, ख्यालों में रहना केवल तुम
जब भी मैं होऊँ परेशान
तुम्हारे काँधे पर रख सकूँ सर अपना
जब भी मैं दुनिया के गमों से घिर जाऊँ..
सुस्मिते !
चाहता हूँ कायम रहो.
मेरी आस में, अहसास में, विश्वास !
कि जैसे साथ हो तुम मेरे
फूलों में खुशबू की तरह

रामनारायण सोनी
१२.०८.२२

मेरा उपवन बुला रहा है

ओ नभ के उड़ते पांखी
मेरा उपवन बुला रहा है 
थोड़ा पंखों को दो विराम
मेरा उपवन बुला रहा है

तुम पहुँचोगे जगह जहाँ पे
प्यारा गाँव हुआ करता था
उसे शहर ने निगल लिया है
एक चौपाल हुआ करता था
  ओ नभ के उड़ते पांखी
  मेरा उपवन बुला रहा है 
  
आम, नीम, बड, पीपल की
ठण्डी छाँव घनी रहती थी
उनके शव तक नही बचे है
अब सन्नाटा पसर रहा है
  ओ नभ के उड़ते पांखी
  मेरा उपवन बुला रहा है 
  
सुखद नीड़ था जहाँ बनाया
तिनके तक अब नहीं मिलेंगे
वे मधुर गान तोता मैना के
सुनने को ना कहीं मिलेंगे
  ओ नभ के उड़ते पांखी
  मेरा उपवन बुला रहा है 

ताल तलैया सूख चुके हैं
प्याऊ बस इतिहास हुई है
पथ में छाँव बिछाता बादल
तक भी आना छोड़ रहा है
   ओ नभ के उड़ते पांखी
   मेरा उपवन बुला रहा है 

दूर देश के प्रिय प्रवासी
मीलों तुम उड़कर आए हो
मालव की माटी और पानी
अब कंकरीट वन उगा रहा है 
   ओ नभ के उड़ते पांखी
   मेरा उपवन बुला रहा है 

कोयल और पपीहे की तो
आवाजें सब बिदा हुई है
नगर गाँव में हवा प्रदूषित
बोतल में जल बिक रहा है
   ओ नभ के उड़ते पांखी
   मेरा उपवन बुला रहा है 

    रामनारायण सोनी
     ११.०८.२२

Tuesday, 9 August 2022

तुम्हारी और उनकी पसन्द


तुम्हारी पसन्द हो सकती है
मोगरा, जुही, गुलाब या चमेली
पर उन्हें पसन्द है 
सारे जगत को बिना भेदभाव के
खुशबू और खूबसूरती बिखेरना
पसन्द शायद तुम्हें वे फूल भी हो...
जैसे अमलतास, टेसू, कचनार, कमल
पर उन्हें पसन्द हैं
जगत में प्रकृति और परमात्मा के
सौंदर्य का दर्शन कराना
तुम्हें पसन्द जरूर होगा
नन्हें से शिशु का सहज हास्य
पर महसूस करके देखो
वहाँ परमात्मा मुस्कुरा रहा है।
महसूस करना कि
तुम्हारा रुदन भी
उस करुणा वरुणालय की
प्रार्थना का हिस्सा हो सकता है।

रामनारायण सोनी
१०.०८.२२

Sunday, 7 August 2022

अशआर २

वेदना के द्वार पर यह कौन दस्तक दे रहा है ?
क्यों पराई पीर को अपने हृदय में बो रहा है?
टाँग दी अपनी खुशी अपने मकां की खूंटियों पर
छोड़ फूलो की मसहरी कंटकों पे चल रहा है

रामनारायण सोनी

तुम्हारा समय दौड़ता ही रहा इस जमाने के संग संग।
खड़ा हूँ मैं अब भी वहीं जहाँ मिले थे वो पहली दफ़ा हम।।



रामनारायण सोनी
९ .७ . २२

Sunday, 31 July 2022

कुछ घड़ी में जीवन जी लें

कुछ घड़ी में जीवन जी लें

क्या कहूँ
कुछ कहा नहीं जाता
शब्द सब दबे पड़ें हैं
भावों के भार तले
ओठ थिरक नहीं पाये
वहीं के वहीं जरा से हिले
भाव भंगिमाएँ भागती दौड़ती रहीं

पलकों के शतदल पर
ठहरे हैं नयन अधखुले
रुके-रुके, झुके-झुके, वहीं टिके
श्वास भी-प्रश्वास भी, धड़कने रुकी रुकी
ठगे ठगे से सब, बिना हिले डुले

और जब तुम मिले !!!
हुआ है कुछ और भी यहाँ
बज उठा है एक वाद्यवृन्द
सितार, जलतरंग,
सरोद, पखावज, मृदंग
मन के मदमस्त मेरे रंगमहल में
संगत में इनके ये आ मिले
प्रतीक्षा में थे ये तुम्हारी ही
हृदय की उमगती वीथियों में
आओ! कुछ घड़ी में
"एक पूरा जीवन जी लें"!!!

रामनारायण सोनी
०१.०८.२०२२

Wednesday, 27 July 2022

तावीज में पल

जानते होगे शायद अब भी तुम

मिले थे जब अचानक हम!
उतार कर रख ली थी
अपनी अपनी घडियाँ जेबों में
रोकने के लिये सरपट दौड़ते वक्त को
पर रुका नहीं वह
तब जो लगा था वह
हमें फिर नहीं लगा कभी भी
गुजर गई थी सदियाँ
उस एक ही पल में
जिये थे हम उस एक पल में
एक पूरी की पूरी जिन्दगी!
... तुम्हें याद हो के न याद हो!
उम्र के अपने तावीज में,
गले में बाँध कर घूमता हूँ मैं
यकबयक चूमता रहता हूँ इसे
जैसे कि यहीं हो तुम

रामनारायण सोनी
२६.०७.२२

Thursday, 21 July 2022

दीप जलता रहा

मिट्टी का ढेला जमीं से उठाया
तुम्हीं ने मुझे चाक पर था चढ़ाया।
हुई रोशनी तैल बाती दी तुमने
अंधेरों से लड़ने हमें था सिखाया।।

मैं मिट्टी था मिट्टी थी पहिचान मेरी 
मेरी जात औकात मिट्टी थी मेरी।
बैठा था गोदी, धरा मेरी माँ थी
फ़कत है जगह ताक में अब तो मेरी।।

आँखों में आँखें धरे चाँद तारे
बतियाते थे सब वो सगे थे हमारे I
दीवारो दर में बने हम तो बन्दी 
हमारी नजर में हमीं हैं बिचारे।।

मिला सुब्ह सूरज तो इतरा रहे थे
ढली शाम साये जब गहरा रहे थे।
जले हैं हमीं आग पी पी के ऐसी
जला के हमीं खुद को, शरमा रहे थे।।

ये अलग बात है हमसे रिश्ते नये हैं
हुई रोशनी संग अपनी सगाई।
सीखा है हमने यूँ जलना खुशी से
पीड़ा जलन की है जग से छुपाई।।

परवाना जब भी, जलता है मुझ में
बैठ बैठ जाता है, मजबूर दिल ये ।
बुझूँगा जलूँगा कई बार मैं तो
इसे जिन्दगी तो, मिलेगी ना फिर ये।।

देखे हैं मैंने कई रंग जग के
आले में चुपचाप दर्शक बना हूँ।
कभी प्रेमियों की चुहल भी सुनी है
कभी प्रेम के मैं रस में सना हूँ।।

रामनारायण सोनी
०३.०५.२२

Sunday, 17 July 2022

जिद कर बैठा हूँ

मैं तुम्हारी जीत और अपनी हार की जिद कर बैठा हूँ ।
रोशनी मीलों पीछे छोड़ अँधेरों से प्यार कर बैठा हूँ
आईना ही झूँठ बोलता रहा मुझसे जिन्दगी भर
न जाने क्यों बुतों को ही मैं जिन्दा मान बैठा हूँ।।

ये माना जिन्दगी तो बुलबुला है क्या सफर इसका
मिली गिनती की जो सांसें भरोसा क्या करें इनका
मगर जीना मयस्सर हो गया तो दो घड़ी जी लें
मिला ले धडकनें धडकन में, न ठहरे सिलसिला इनका।


रामनारायण सोनी


Wednesday, 13 July 2022

चन्द अशआर

चन्द अशआर

जो था वो अब मैं रहा नहीं
जो हूँ वो किसी को पता नहीं

मुझसे नाराज हो के फिर तुम
खुद से ही खफ़ा होते हो क्यूँ?

ये माना कि इश्क में बंदिशें बहुत है
बन्दगी है इश्क इतना ही समझा हूँ मैं

जो बाजार में दिन भर ताले बेचते हैं
दुकानें उनकी भी कभी लुट जाती है।
बिसात पर तो खेल कई देखे हमने
बिन खेले भी बाजियाँ जीती जाती है

जो उनकी आँखों में बयां होते है
वो लफ्ज किताबों में कहाँ होते हैं।

रख लो आईने हजारों हज़ार लेकिन
हकीकत से नजरें मिलानी ही पड़ती है

जवाब फल से दिया जाता है पत्थर का
एक पेड़ होना भी बड़ा इम्तिहान है

वो आईने धोता फिर रहा है
उसे अपने चेहरे पे शक हो रहा है

सूरज का डूबना तय था और चाँद का सँवरना भी
शिद्दत से हो रहा था जिन्दगी का गुजरना भी.....

ये जिन्दगी तमन्नाओं का गुलदस्ता ही तो है
कुछ मुरझाती है तो कुछ चुभ जाती है। 

रात की बात न कर वहाँ रोशन माहताब होता है 
हर सक्ष अपनी हदों में खुद लाजवाब होता है

न मीरा की पीर हूँ, ना ही मैं कोई कबीर हूँ
फख्त शब्दों से इश्क है, ऐसा इक फ़कीर हूँ

मोहब्बत कोई धूल भी नहीं कि हवा में उड़ा दूँ
इश्क कोई जंग भी तो नहीं कि पत्थर से लड़ा दूँ
रात बहुत काली है, जालिम है, कैसे मैं ये भुला दूँ?
राह तेरी रोशन हो, आ मैं दिया दिल का जला दूँ


तुमने शायद मान लिया है अब ये पूरी तरह
कि साँसों का चलते जाना जिन्दगी है मेरी
अहसास, जज़्बात रख के भूल गए हो कहीं
मेरा इश्क सरहदों पार भी एक बन्दगी है मेरी

मेरी मुफलिसी अब हद को पार कर गई  
जितनी भी पास थी मोहब्बत, खर्च हो गई


मेरी साँसे कुछ बेसुरी सी हो गई है सुनो तो ज़रा
मेरी धड़कने उधड़ सी गई हैं फिर बुनो तो जरा
बस्तियाँ, कारवाँ, वो लवाजमें कहीं गुम हो गए
जब से गए तुम, गुम हो गए हैं हम सुनो तो ज़रा


एक तुम ही तो थे जिसे बताता था मै राज-ए- दिल
अब न लोग सुनते हैं न ही मगरूर खामोशियाँ ही
तुम्हारे हिस्से का वह वक्त मैं अब भी खाली रखता हूँ
और सोने के पहले ही वे हसीं यादें सिरहाने रखता हूँ

इन्तज़ार में एक जिन्दगी कम पड़ जाएगी, मालूम ना था
वरना दो जिन्दगियाँ रब से माँग लेते, इसी जिन्दगी में

तुझे पता नही है, जिस्म से इश्क बड़ा होता है
न जलता है न गलता है न ही ये फ़ना होता है

थक जाती हैं आवाज और लफ़्ज भी थक जाते हैं
ढूँढते ढूँढते ।
अकेली एक अदद खामोशी ढूँढ लाती है कहीं से भी तुम्हें॥

उन लम्हों में जो खुशबू थी न, वो तुम्हारी ही थी
कमबख्त महकते हैं उसी तरह याद में अब भी

गुजर जाती है हर रात वो उदासी लेकर तनहा तनहा 
फिर उस दिन तो हम भी हुए थे यूँ ही तनहा तनहा
दिल से कहीं दूर निकल आए हैं हम यूँ ही तनहा तनहा
गुजरी हुई बारिश में हो जैसे एक बूँद तनहा तनहा

लिखा नहीं जा सकता उसे, जिसे महसूस किया
पढ़ा नही जा सका उसे, जिसे महसूस किया
पढ़ना लिखना तो सिर्फ कलम की घिसावट है
दिलों की जुबान वही समझे जिसे बस महसूस किया

चीजों और रिश्तों का फर्क समझना होगा
आसमां में घर नहीं होते जमीं पे उतरना होगा।
रोशनी उधार की लम्बी नही चल सकती है
अपने ही दिये से घर में उजाला करना होगा।।

हाँ आज तलक घर पे घर बदले हैं कई मैंने
पर बदला नही है ये तेरा दर मैंने कभी भी
तू जानता है ये कि यह घर-दर और ये दुनिया
बदलूँगा जब, तू भी न जान सकेगा कभी भी

मैं मिट्टी हूँ मिट्टी कहानी मेरी
कल भी यही थी कल भी रहूँगी
घड़ा हूँ, चिलम हूँ या सकोरा रहूँ
आखिर में फिर भी मैं मिट्टी रहूँगी

वक्त ने एक दिन कान में बुदबुदाया
ये पल जो भी है अभी हाथ में मेरे I
कल मैं तुझे यह फिर ना लौटा सकूँगा
इसलिए चल हमकदम बन कर साथ मेरे।।

फानूस सी मेरी इस छत में टँगी है आशाएँ
सोने की जुगत करता हूँ तो शोर मचाती है।
फिक्रों की किताब सिरहाने रख कर मेरे
जिन्दगी एक खामोशी दे कर चली जाती है।।

रिश्तों को थोड़ा वक्त चाहिये निगाहों को फक्त तू चाहिये
रात की माँग में हैं सितारे बहुत मुझे रोशनी की किरन चाहिये।
है मय के पियाले निराले बहुत मुझे बस तुम्हारी नजर चाहिये
है बस्ती में लाखों नगीने भरे नहीं ये मुझे फक्त तू चाहिये।।

मैं अमीर था शहर में कई रईसों की तरह
एक दिन आई तकदीर कोई सक्ष लेकर।
मेरे हिस्से में था जो मेरे दिल का कवंल
चुरा लिया है मुझसे मेरा वो ही दगा देकर।।

जिन्दगी की अजब चाल कभी सबक एक देती है।
पूरी कायनात दे कर भी उस एक को छीन लेती है।।

रामनारायण सोनी
१.०८.२०२२




Friday, 8 July 2022

रोशनी में अंधेरों का सैलाब


मैंने होश सम्हाला ही न था तब तक
अभी छुप भी नहीं पाया !
मैं मेरी माँ के नर्म नर्म आँचल में
सिर को सहलाने वाले हाथों को
मैं समझ ही ना पाया था!!
मैं थोड़ा सा भी!!
देख नहीं पाया था 
जी भर कर उसे अभी!!!
और वो चली गई!!!!
वो चली गई बिन बताए, बिना कहे
मेरी बिना मेरी सुने, बिना कोई लोरी सुनाये

कौन चुप करता मुझे
चार काँधे आए कहीं से
उठा ले गए उसे
तीन रस्सियों से लटकती 
एक काला सा धुआँ उगलती 
यह जिन्दगी!!
उठा कर मैं चला हूँ, चलता ही रहा हूँ 
और ढो रहा हूँ तब से अब तलक!!
जैसे ही देखने को उतावला होता हूँ !
आँखों में बसी उसकी बसी छबि को
आँसुओं की नदी में
बह जाती है मेरी माँ

दादी मेरी कहती रही 
बाँह पकड़ कर मेरी
वह माँ तेरी चाँद पर चली गई है
इस बार दिखाऊंगी तुझे
पूनम के दिन उसकी परछाईं उस चाँद में
तब से हर माह एक पूनम आती है
आँखों में अमावस ठूँस कर चली जाती है
हर चौंधियाती तेज रोशनी में भी
मैं अँधेरों का सैलाब देखता हूँ

रामनारायण सोनी
०८ .०७.२२


Sunday, 3 July 2022

तुम आज भी याद आते हो (नज़्म)


तुम आज भी बहुत याद आते हो
क्यों याद आते हो?
इसे न तुम जानते हो
न हम जानते हैं
कि तुम क्यों याद आते हो?
तुम आज भी बहुत याद आते हो

तुम आज भी बहुत याद आते हो
इसे हम तुम से पूछ नहीं सकते
ना ही हम तुम्हें बता सकते 
ये याद हमारे दिल में आती है
यह भी कि क्यों याद आते हो?
तुम आज भी बहुत याद आते हो

तुम आज भी बहुत याद आते हो
फिजाएँ खुद महकतीं हैं
हवाएँ भी मचलती हैं
घटाएँ नाचती फिरती हैं गगन भर में
ये खबर सारी तुम्हारी हैं
तुम्ही तो याद आते हो
तुम आज भी बहुत याद आते हो

रामनारायण सोनी

Wednesday, 22 June 2022

बावरा मन

यह चाँद है?
या उसका कंगन
ये टूटते हुए तारे हैं?
या जुल्फों से छितरी हुई 
बूँदों की बिखरन
यह राजपथ है?
या बस राह की भटकन
इस रात की ये खामोशी 
कह रही है...
कितना बावरा हूँ मैं
और मेरा यह मन

     रामनारायण सोनी

अनगढ़ यह नगीना

मेरे पास
लमहों का एक ज्वेलरी बॉक्स है
उसमें कुछ ताज के जड़ाऊ नगीने हैं
कुछ लाल, हरे, नीले, पीले
जिन्हें मैं कभी नहीं पहनता
पर एक नायाब नगीना
रखा है एक गुप्त खाने में
अनतराशा ही रह गया वह,
निकाल कर जब रखता हूँ
यादों की अकेली अँधेरी कोठरी में
एक फफ़कता उजास फैल जाता है
बाहर भी और मेरे ठेठ भीतर तक भी
मैं उसे चूमता हूँ बार बार
बाकी सब नागीनों ने तो 
देखी है मेरे चेहरे की चमक दमक
पर इस अलहदा अनगढ़ से नगीने ने
देखे हैं कई बार मेरे नयनों के
खारे उफनते, बहते आँसुओं के सागर को।
अब कोई आए कहीं से और
ले जावे छीन कर सारा मालोअसबाब
बस छोड़ कर केवल
एक अदद इस अनतराशे नगीने को

रामनारायण सोनी
२१.०६.२२

Friday, 3 June 2022

झरना

झरना झरझराता है

चाहे जितना बिखर जाए पानी उसका
बिखर बिखर धुआँ धुआँ हो जाए भले ही
परन्तु झरना जो एक मौज है
झरना जो एक उल्लास है
झरते ही जाना है इसे,
झरते ही जाना है इसे
और सवार हो जाना है
हवा के महीन परों पर
उसकी धवल धार
है कण कण का विस्तार
गिरते जाना है ऊँचाइयों से..
सख्त चट्टानों की सख्त छातियों पर
झर-झर झरझराता नाद ही
गिर कर जब उठ खड़ा होगा
अपनी वही पुरानी धार ले कर
फेनिल ही काया है इसकी
मस्ती में फिर से बहेगा
पतन की यादों को झाड़ कर
टूट कर बिखरना,
बिखर कर फिर जुड़ना
साहस और सामर्थ्य है इसका
वन प्रान्तर में उसकी गूँज होंगी मौजूद
झरना इरझराता हो
जैसे अब भी
गाता है, आता है
जीवन का मधुमय संगीत लेकर

रामनारायण सोनी
१३.०५.२२

Wednesday, 1 June 2022

अधूरी कहानी वैताल सी


.कुछ कहानियाँ!!! 
अधूरी ही होती!
निष्ठुरता भी इतनी कि
वे पूरी नहीं होती कभी भी...
लेकिन वे अनवरत रेंगती रहती है 
धमनियों, शिराओं और मगज में
पिघले सीसे की तरह
सफ़र इनका कहीं से शुरू हुआ
और जाने क्यों, न आधा न पूरा हुआ
इनमें चल रहे रास्तों का क्या ठिकाना? 
मुड़ जाते हैं अचानक 
कभी भी, कहीं भी, कैसे भी
जंगली हवाओं की तरह
मैं देखता रहता हूँ लाचार हो कर
अपनी ही कहानियों को
निरीह सूत्रधार की तरह
चलता हूँ ढोता हुआ इन्हें 
अपनी ही पीठ पर
वैताल की तरह

रामनारायण सोनी
१.६.२२

Tuesday, 31 May 2022

क्यों लिखता हूँ मैं

*अब क्या लिखूँ मै*

जब भी मैं गाँव लिखता हूँ
गाँव का चौपाल लिखता हूँ
चौपाल में खड़ा वटवृक्ष दिखता है
वटवृक्ष पर चिटिर पिटिर करते
रक्तकण्ठी हरे कच तोते लिखने लगता हूँ
फिर सूरज से आती उस अप्रतिम ऊर्जा को!
देखता हूँ जीवनी शक्ति में परिवर्तन होते
हाँ फिर जब जब मैं 
आश्रम बनते देखता हूँ....
वनस्थली के घर आँगन को!
बाड़े में रंभाते गाय के बछड़े को!
ममतामयी छाया में दुलार का स्पर्श देखता हूँ!!
जहाँ पवन बुहारता है घर, आँगन, वन, उपवन, 
सरसराता हुआ संगीत भी सुनाता है, 
फिर...
जब मैं लिखता हूँ गँवई लोक धुन पर 
थिरकती हुई किशोरियाँ का रुचिर लोकनृत्य
जहाँ प्रकृति स्वयं लाती है प्रभाती का पर्व
और भी है अनगिनत जो मैं लिख नहीं सका
इनकी सब की हर आहट में देखता हूँ, 
नितान्त स्तब्ध हो कर
तो उभरता है धरा की सुरम्य गोद में
एक सौम्य सा, सरल सा मन्दस्मित चेहरा...
ममत्व से, अपनत्व से भरा 
तुम्हारा ही!
कौन हो तुम!!!?

रामनारायण सोनी

(परिष्कृत
१७.१२.२२)

Saturday, 28 May 2022

उठो भी!

मैं सोया हुआ था
पर मुझ में वह जाग रहा था
जैसे जगा रहा हो मुझे
उठो भी! 
बहारें फिर लौट आई हैं
उस सरोवर के किनारे
प्रतीक्षारत हैं वे पथरीली आसन्दियाँ
बैठ लो घड़ीक भर,
बतखों का वही जोड़ा
जल में खिले शतदलों के बीच
डूबता उतराता है 
विस्तीर्ण नीलनभ की ओर उठी 
आह्लादित आतुर बाजुएँ
खुली हैं स्वागत में
आओ खींच लाएँ उन
मधुमय पलों के पाँखियों को
जियें फिर कल को
आज में, अभी ही

रामनारायण सोनी
२८.०५.२२

Thursday, 12 May 2022

जीवन की चादर

जब जब जीवन की पतंग के
पेच कहीं ये उलझे हैं
वाणी भी जो बोल सकी ना
तूने भाव सभी समझे हैं

जीवन की चादर करघे के
जब जब तार मेरे बिखरे हैं
तब तब कृपा तेरी बरसी है
बिगड़े काज सभी सुधरे हैं

इस भीतर की तनहाई मे मैं
एकाकी जब जब हो पाता हूँ
यह भीड़ कहीं खो जाती है
बस साथ तेरे रह जाता हूँ।

उस खास घड़ी को जी कर ही
सदियाँ पल में जी लेता हूँ
गरल भरे इस सागर में भी 
अमिय घूँट कुछ पी लेता हूँ

अन्तःपुर के खोल किवारे
जब जब तू घर आता है
मेरा अगला पिछला जीवन
कितना पावन हो जाता है

रामनारायण सोनी
१३.०५.२२

झरना झराता है



चाहे जितना बिखर जाए पानी उसका
बिखर बिखर धुआँ धुआँ हो जाए भले ही
परन्तु झरना जो एक मौज है
झरना जो एक उल्लास है
झरते ही जाना है इसे, 
झरते ही जाना है इसे
और सवार हो जाना है
हवा के महीन परों पर
उसकी धवल धार 
है कण कण का विस्तार 
गिरते जाना है ऊँचाइयों से..
सख्त चट्टानों की सख्त छातियों पर
झर-झर झरझराता नाद ही
गिर कर जब उठ खड़ा होगा
अपनी वही पुरानी धार ले कर 
फेनिल ही काया है इसकी
मस्ती में फिर से बहेगा
पतन की यादों को झाड़ कर
टूट कर बिखरना, 
बिखर कर फिर जुड़ना
साहस और सामर्थ्य है इसका
वन प्रान्तर में उसकी गूँज होंगी मौजूद
झरना इरझराता हो
जैसे अब भी
गाता है, आता है 
जीवन का मधुमय संगीत लेकर

रामनारायण सोनी
१३.०५.२२

Tuesday, 10 May 2022

मधुपरी का मधुच्छन्दा गान

मेरे घर आई मधुपरियाँ
चीकू की डाल पर
मीठे फलों  के बीच
गुनगुनाती हैं मधुच्छन्दा
गिलहरियाँ आती हैं तिड़िप तिड़िप करती
दिन भर करती है 
चीकू, आम का ब्रह्मभोज
और इस आँगन में
नीचे महमहाती है वृन्दा

प्रज्ञान

दिल भी क्या दिल है
जो धड़कना नहीं जानता
वह आँख भी कोई आँख है
जो फड़कना नहीं जानती
उस कान को भी कान कैसे कहें
जो उनके मौन को न सुन सके
वे रोंएँ तो तन की जमीन पर
बेजान उगी हुई तृणें हैं
जो रोमांचित होना नहीं जानती
वे यादें सब मरी मरी सी हैं
जो मन मस्तिष्क के आकाश में
बिजली सी गरजती और कौंधती नहीं
ये नजरें भी बस
काँच की निरी गोलियाँ सी ही हैं
अगर ये खाली कैनवास पर भी
तुम्हें नहीं देख सके
वह प्रज्ञा ही तो है 
जो हजारों आहटों में से
उसके हल्की सी पदचाप को भी
साफ साफ सुन लेती है
तुम्हें बता दूँ!
कि ये सब एक साथ
मेरे पास हैं, मेरे साथ है,
और मुझ में मौजूद है
इसलिये ही तो मैं..
महसूस करता हूँ पूरी तरह
तुम्हें! हमेशा!!

रामनारायण सोनी
९.५.२२

कृतज्ञता से भर जाऊँ मैं

मैंने जब जब निश्छल हो कर पुकारा
उसने ठीक ठीक सुना
मैंने तन्मय हो कर.. 
सुनना चाहा जब उसे
उसने सुमधुर स्वर में 
मुझे "मेरा अपना" कहा
भरोसा उस पर किया जब जब
वह संकटों से निकाल कर लाया मुझे
मैं चलता ही गया उसके पीछे पीछे
उसने मंजिल खिसका दी मेरी पहुँच में
उसने सिखाया काले पानी में तैरना
ताकि दुश्मन भी पीछा नहीं कर सके मेरा
विश्वास मेरी संवेदनाएँ नहीं
अपितु मेरे दृढ़ निश्चय का परिणाम है
वह मेरा सबसे प्यारा है।
मैंने उससे प्रार्थना की....
हे मेरे प्यारे परमात्मा!
तुम मुझे इतना खाली कर दो
कि मैं पूरे का पूरा ही..
तुम्हारी कृतज्ञता से भर जाऊँ !!!

रामनारायण सोनी
११.०५.२२

Monday, 9 May 2022

यादों की महक

ग्रेनाइट की काली सख्त चट्टान पर
पैनी छैनी से खुदी
सुकोमल सुरमई यादें
टटोल लेता हूँ मैं
एकाकीपन के घुप्प अँधेरो में भी
मिट नही सकेंगी कभी यादें ये।
अलबत्ता कतरा कतरा हो कर
बिखर जावेंगी किसी भी दिन
चट्टान के तिलिस्मी जिस्म के संग
उसकी धूल से निकलती वे सदाएँ
पुकारेंगी तुम्हें फिर! फिर!!
कि तुम!!
पिसी मेंहदी, झरे फूल
गुलाबजल  सौंधियाती मिट्टी में
रची बसी खुशबू की तरह
अब भी मौजूद हो मुझ में
तुम्हें पता है कि नहीं?

रामनारायण सोनी
०९.०५. २०२२

Thursday, 5 May 2022

प्रीत मेरी

प्रीत मेरी देह संग ना मर सकेगी
   प्रीत मेरी साँझ सी ना ढल सकेगी।।
    प्रीत की न उम्र है ना परिधियाँ ही
     प्रीत मेरी मेघ सी न गल सकेगी।

प्रीत रूहों के मिलन का नाम है
 प्राण में होता विलय जहँ प्राण है
  रूप का लालित्य बाहर हो खड़ा
   बन्धनों से मुक्ति है और त्राण है

अग्नि भी ना दह सकी इस प्रीत को
 सह सका ना क्यों जगत मन प्रीत को
  प्यास अधरों पर रुकी ले कण्ठ की
   सुन पपीहा स्वाँति के प्रिय गीत को

रामनारायण सोनी
६.५.२२

Tuesday, 19 April 2022

बिखर गए सब सपने

नयनों में दर्दों का सागर
इसीलिए आँसू खारे हैं
जीत तुम्हारी सदा रही
हर बार हमीं हम हारे हैं

मन के खुले रहे वातायन
द्वार देहरी चौखट सूनी
बाहर है बौराया मधुबन
धू धू जलती भीतर धूनी

हुई गुबारों संग सगाई
उजड़ी उजड़ी बस्ती है
घाट घाट पर सन्नाटे हैं
बिन पतवारों की कश्ती है

टूटे श्यामल मेघों के वे
संग विचरने के अनुबन्ध
पवन कहीं रूठी बैठी है
मुखर हुआ कैसा प्रतिबन्ध

पदचापों की आहट बिखरी
बिखरे बालू में सब सपने 
सिसक रही प्राणों की वंशी
जग में किसे कहें अब अपने

रामनारायण सोनी

क्या करूँ



मेरे कुछ प्रश्न थे-
   अनुत्तरित हैं
मेरे कुछ प्रस्ताव थे-
    फाइल हो गये
मेरे कुछ अनुरोध थे-
     सुने तो, मगर काम के बोझ तले
     दब गए
मेरी तरह कई की आशाएँ हैं
     अपेक्षित जनाकांक्षाएँ हैं
क्या वक्त इतना निर्मम है?
      या सबसे अच्छा बहाना है
छोटी सी थी कहानी 
      क्षेपक नहीं हो जाये

रामनारायण सोनी