शब्द ब्रह्म
मैं शब्द हूँ
मैं उस अनन्त अक्षर से मण्डित हूँ
मैं अमर हूँ, मैं समर हूँ
मैं सुधा हूँ, मैं गरल हूँ
गूँज हूँ, अनुगूँज हूँ, स्पन्द हूँ
मैं वज्र भी हूँ, पुष्पों सा कोमल भी हूँ
नेपथ्य में बोये गए कुछ शब्द बीज
उगते, विकसते हैं जगत के रंगमंच पर
अपने अर्थ, भाव, संदेश और कथ्य ले कर
मेरी बिखरन होती है सतरंगी
रक्त सी लाल, सत्य सी श्वेत
निस्सीम व्योम सी नील,
पाण्डु सी पीत, राम-कृष्ण सी श्याम
वसन्त सी अभिराम,
लता सी हरित ललाम
जब जब मैं उतरता हूँ कोरे कागज पर
किसी के अन्तस से निकल कर
बाहर बिखरता हूँ साकार हो कर
बनाता हूँ चित्र, धँसता हूँ तुम्हारे भीतर
बैठ जाता हूँ शूल लेकर मन की कोंख में
चुभता हूँ, सालता हूँ कभी जीवन भर
लेप हूँ, मरहम हूँ, तसल्ली भी मैं ही तो हूँ।
मैं ओज का उद्घोष हूँ
शान्ति का दूत हूँ, स्मृतियों का महाकोष हूँ
प्रणय का गीत हूँ, प्रिय का मन मीत हूँ
पावन ऋचा हूँ, जीवन का उद्गीत हूँ
मैं नाद हूँ, मैं गीत हूँ, मैं प्रगीत हूँ
मैं माँ की ममता हूँ, पिता की गोद हूँ
आर्त की पुकार और वीरों में क्रोध हूँ
तुम्हारे मन में हूँ, आकाश में भी हूँ
चलता हूँ विद्युत की तरंगों पर
कभी हवा के परों पर बैठ कर
वहाँ सें यहाँ, यहाँ से वहाँ, जाने कहाँ कहाँ
मैं बीज हूँ
सृजन भी मैं, जीवन भी मैं, ध्वंस भी हूँ मैं
मैं ब्रह्म हूँ। शब्द ब्रह्म।।
रामनारायण सोनी
२०.१२.२२
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