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Tuesday, 15 March 2022

हम तुम

विस्तारण मेरे हृदय का
देख नहीं पाये हो तुम
क्योंकि इसी में तो हो तुम
प्रस्रवन देखा ही नही तुमने 
मेरे अजस्र प्रेम का
क्योंकि घुलमिल गये हो इसीमें तुम
स्पन्दन मेरे हृदय का
शायद नही होगा महसूस तुम्हें
क्योंकि स्पन्दन हमारे तुम्हारे हृदय के भी
लयलीन हो कर ये गड्डमड्ड गये हैं
और इसलिये भी कि 
एकमेक हो गये हैं हम और तुम
 
रामनारायण सोनी
१५.०३.२२

Thursday, 3 March 2022

नेह की वही शपथ

चुभे शूल मेरे तलवों में
चीख तुम्हारी निकल गई थी
टीस हुई जब मेरे दिल में
साँस तुम्हारी विकल हुई थी
करुण हृदय की, कथा रुदन की तुम्हें सुनाने आया हूँ।
उसी नेह की वही शपथ फिर आज दिलाने आया हूँ।।

तोड़ गई सपने प्रभात में
ऊषा की स्वर्णिम किरणें ही
छोड़ गई रीती गागर सब
आशा पनिहारिन पनघट ही
इस एकाकी पथ पर उमड़े पतझार दिखाने आया हूँ।
उसी नेह की वही शपथ फिर आज दिलाने आया हूँ।।

यहीं कहीं अन्तस की गाँठें
खोल खोल रख डाली थी
नील नयन के नील गगन पर
पलकों की चादर डाली थी
टूटे बिखरे मन की किरचें, तुम्हें बताने आया हूँ।
उसी नेह की वही शपथ फिर आज दिलाने आया हूँ।।

आँगन आँगन बिरवा सूखे
पवन उकेरे कहीं जुन्हाई
चंचरीक की गुंजन लगती
होली के दिन बिरहा गाई
झुकी की नीम की टहनी पर, तुम्हें झुलाने आया हूँ।
उसी नेह की वही शपथ फिर आज दिलाने आया हूँ।।

रामनारायण सोनी 
३.३.२२









 ल्;

जानता हूँ मैं

जानता हूँ मैं
भूलते भूलते थक गई हो तुम!
और सुस्ताने लगती हो जैसे ही
उस बरगद की शीतल छाँव में
यादों की चुन्नी फुदक फुदक कर
फिर फिर लिपट जाती होगी तुमसे।

हे मृदुले! 
बोझिल पलके मुँद जाने के पहले
सिरहाने का वह रेशमी गिलाफ
फुसफुसाने लगता होगा कानों में तुम्हारे
वे अफसाने, तराने।
फिर तो....
वे कसीदे जो गढ़े गये थे
हमारी तुम्हारी बतकही के
टपकने लगते होंगे छौने बन कर
छत से टकरा टकरा कर
वे सपने अलोने-सलोने।

हे विशालाक्षी!
ठिठक-ठिठक जाते होंगे
आतुर आतुर तुम्हारे नयन अब भी
टूटे कवेलुओं और नुकीले पत्थर से
रास्ते के किनारे खड़ी चट्टानों पर
लिखे रह गये हमारे नामों पर
जिनको पढ़ते पढ़ते
गड़ जाता होगा उन पर
तुम्हारा लसलसा मन

हे सुचिते!
उड़ाती होंगी कौओं, सुग्गों और गौरेया को
उन मुंडेरो, मेहराबों, ख़िड़ाकियों पर से
बरबस ही पीट पीट कर तालियाँ
दिखलाया करती भी जिन्हें तुम
उन्हीं की तरह चिटिर पिटिर करते करते

हे शुभे!
चाहा होगा यदा कदा तुमने
सिकुड़ कर शून्य हो जाऊँ मैं
और खो दूँ मेरा अस्तित्व ही,
पर उन आलापों को रोक सकोगी कैसे तुम
जो अम्बर में जमे हुए स्मृति बिम्बों के
नेह मेह से पिघल पिघल कर 
नन्ही नन्ही बूँदनियाँ बन
नहला रही होंगी तुम्हें अब भी।
श्रावणी फुहारों सी

जानता हूँ मैं यह और वह सब कि
जिसे भूलते भूलते थक गई हो तुम!

रामनारायण सोनी
३.३.२२