Friday, 21 October 2022
स्वप्न से समाधि तक
Wednesday, 19 October 2022
दो पल की पहिचान
Sunday, 16 October 2022
एक महीन रिश्ता
एक रिश्ता जो आदत बन गया
एक आदत जो लत हो गई
एक लत जो छोड़े नहीं छूटती
रिश्ता जो मंजिल नहीं सफर था
सफर जो ख्वाहिशों की पगडण्डियों से गुजरा
पगडण्डी जो इस दिल से उस दिल को
महीन, मुलायम, पवित्र रिश्ते से जोड़ती है
रामनारायण सोनी
१७.१०.२२
Wednesday, 12 October 2022
सागर किनारे तुम्हें सौंपता हूँ
Sunday, 2 October 2022
पीर मेरी मधुबनी
इस हृदय की भित्तियों पर जो लिखे कड़वे कथानक
खोजता क्यों बावरा मन दंश की पीड़ा अचानक।
शुष्क अधरों पर निगोड़ी प्यास ही ठहरी हुई है
दौड़ते मृग शावकों को छल रहा मरु ज्यों भयानक।।
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।
क्यों तिमिर के इस निलय में रोशनी को ढूँढते हो
रेत के पदचिन्ह गिन कर जिन्दगी को बूझते हो।
रिस रहे थे व्रण बिचारे क्या उन्हें तुम देख पाये
जान कर भी बेतुके ये प्रश्न तुम क्यों पूछते हो?
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।
मर चुकी संवेदना अब ओस की कहती कहानी
उपवनों की गन्धवह थी यह पवन होती मसानी।
उम्र के माथे लिखी जो सिलवटें कहती जुबानी
क्रन्दनों के इस नगर में खोजते हो तुम रवानी।।
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।
फिर कोई आ कर व्रणों पर खार सारा धर गया है
जो दबे थे तह तले फिर पल हथेली धर गया है।
रागिनी क्यों ढूँढते हो बाँस की इस पोंगरी में
सांझ का प्रहरी सितारा इस सुबह में मर गया है।।
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।
मैं अकेला ही भला हूँ यह पीर मेरी संगिनी है
मैं रहा अनुचर उसी का वह मेरी जो स्वामिनी है।
पीर मीरा की प्रणय था पीर में नवजात सुख था
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।
गीत पीड़ा के स्वयं ही गान अपने गा रहा है
उन सुरों की वेदना में सुख समझ सुख पा रहा है।
इस हृदय को रास आई पीर संग मेरी सगाई
भित्तियों के वे कथानक फिर हृदय दोहरा रहा है।।
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।
रामनारायण सोनी
३.०९.२२