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Friday, 21 October 2022

स्वप्न से समाधि तक

स्वप्न से समाधि तक

जब मन अन्धा हो
तो नयन और बटन में कोई फर्क नहीं
जब मन ऊँचा सुनता हो
तो बोली और अबोली में कोई फर्क नहीं
जब मन ही दग्ध हो
तो जल में और अनल में कोई फर्क नहीं
लेकिन जब मन ही अमन हो
तो स्वप्न और समाधि में भी कोई फर्क नहीं

रामनारायण सोनी

Wednesday, 19 October 2022

दो पल की पहिचान

अपने जीवन के सब से खास
इस हृदय की शिला पर
लिखे अमिट पल 
स्मरण करते ही
भीतर से बाहर तक 
रोमांच से भर जाता हूँ
पुलक का वह पल
हटात् जब नजरें हुई थी चार
और अतिरेक का वह दूसरा पल
जब जब रूह घुली रूह में
न भूला मैं
न भूल सकोगे तुम!

रामनारायण सोनी
२०.१०.२२

Sunday, 16 October 2022

एक महीन रिश्ता

एक रिश्ता जो आदत बन गया

एक आदत जो लत हो गई
एक लत जो छोड़े नहीं छूटती
रिश्ता जो मंजिल नहीं सफर था
सफर जो ख्वाहिशों की पगडण्डियों से गुजरा
पगडण्डी जो इस दिल से उस दिल को
महीन, मुलायम, पवित्र रिश्ते से जोड़ती है

रामनारायण सोनी
१७.१०.२२

Wednesday, 12 October 2022

सागर किनारे तुम्हें सौंपता हूँ


मैं सागर किनारे तुम्हें सौंपता हूँ।।

अँधेरे का दीपक मेरे साथ में है
रातों का काजल मेरे हाथ में है
मैं दिन के उजाले तुम्हें सौंपता हूँ।
कश्ती फँसी है जो तूफां में घिर के
नजर से तुम्हारी उसे यूँ बचा कर
मैं सागर किनारे तुम्हें सौंपता हूँ।।
    मैं सागर किनारे तुम्हें सौंपता हूँ।।

हुई शूल के संग आज मेरी मिताई
खिले फूल गुलशन से होती चुनाई
वही फूल अब मैं तुम्हें सौंपता हूँ।
झरे पात पतझर में तन से भले ही
बची थी फखत सूखी शाखे भले ही
मैं फिर भी नई कोंपलें सौंपता हूँ।।
    मैं सागर किनारे तुम्हें सौंपता हूँ।।

मेरे स्वप्नों के ये जखीरे पड़े हैं
कई प्रश्न पलकों पे मेरे खड़े हैं
फलक के सितारे तुम्हें सौंपता हूँ।
निरी प्यास ठहरी अधर पे है मेरी
रुँधा कण्ठ अवरुद्ध वाणी है मेरी
मैं गीतों की सरगम तुम्हें सौंपता हूँ।।
    मैं सागर किनारे तुम्हें सौंपता हूँ।।

हुई भोर तारे बिदा हो चले हैं
बुझते चिरागों के तन भी जले हैं
सुबह की किरन मैं तुम्हें सौंपता हूँ।
न फिर याद करना न फिर याद आना
ये आबाद बस्ती ये दिलकश जमाना
मैं तोहफे में जीवन तुम्हें सौंपता हूँ।।
    मैं सागर किनारे तुम्हें सौंपता हूँ।।

तुम्हारा सफर तेज रफ्तार का है
चल ना सका हम कदम बन के तेरे
मैं दिल की धड़कन तुम्हें सौंपता हूँ।
कैसे मैं भूलूँ पलों के वे मेले
बसे हैं जो अन्तस की गहराइयों में
उन्हें भर के गठरी तुम्हें सौंपता हूँ।।
    मैं सागर किनारे तुम्हें सौंपता हूँ।।

  रामनारायण सोनी

Sunday, 2 October 2022

पीर मेरी मधुबनी

इस हृदय की भित्तियों पर जो लिखे कड़वे कथानक
खोजता क्यों बावरा मन दंश की पीड़ा अचानक।
शुष्क अधरों पर निगोड़ी प्यास ही ठहरी हुई है
दौड़ते मृग शावकों को छल रहा मरु ज्यों भयानक।।
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।

क्यों तिमिर के इस निलय में रोशनी को ढूँढते हो
रेत के पदचिन्ह गिन कर जिन्दगी को बूझते हो।
रिस रहे थे व्रण बिचारे क्या उन्हें तुम देख पाये
जान कर भी बेतुके ये प्रश्न तुम क्यों पूछते हो?
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।

मर चुकी संवेदना अब ओस की कहती कहानी
उपवनों की गन्धवह थी यह पवन होती मसानी।
उम्र के माथे लिखी जो सिलवटें कहती जुबानी
क्रन्दनों के इस नगर में खोजते हो तुम रवानी।।
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।

फिर कोई आ कर व्रणों पर खार सारा धर गया है
जो दबे थे तह तले फिर पल हथेली धर गया है।
रागिनी क्यों ढूँढते हो बाँस की इस पोंगरी में
सांझ का प्रहरी सितारा इस सुबह में मर गया है।।
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।

मैं अकेला ही भला हूँ यह पीर मेरी संगिनी है
मैं रहा अनुचर उसी का वह मेरी जो स्वामिनी है।
पीर मीरा की प्रणय था पीर में नवजात सुख था
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।

गीत पीड़ा के स्वयं ही गान अपने गा रहा है
उन सुरों की वेदना में सुख समझ सुख पा रहा है।
इस हृदय को रास आई पीर संग मेरी सगाई
भित्तियों के वे कथानक फिर हृदय दोहरा रहा है।।
पीर है अभ्यर्थना प्रिय प्रीति की यह मधुबनी है।।

रामनारायण सोनी
३.०९.२२

Saturday, 1 October 2022

संस्पर्श

कागज-कलम की दूरी 
कमबख्त इस दिल से
सिर्फ एक हाथ भर की ही तो थी
पर अपनी कुछ बातें 
उन्हें लिख कर बताने में
एक उम्र खर्च कर डाली हमने
फिर भी बात अधूरी ही रह गई

रामनारायण सोनी
२.१०.२२