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Tuesday, 31 May 2022

क्यों लिखता हूँ मैं

*अब क्या लिखूँ मै*

जब भी मैं गाँव लिखता हूँ
गाँव का चौपाल लिखता हूँ
चौपाल में खड़ा वटवृक्ष दिखता है
वटवृक्ष पर चिटिर पिटिर करते
रक्तकण्ठी हरे कच तोते लिखने लगता हूँ
फिर सूरज से आती उस अप्रतिम ऊर्जा को!
देखता हूँ जीवनी शक्ति में परिवर्तन होते
हाँ फिर जब जब मैं 
आश्रम बनते देखता हूँ....
वनस्थली के घर आँगन को!
बाड़े में रंभाते गाय के बछड़े को!
ममतामयी छाया में दुलार का स्पर्श देखता हूँ!!
जहाँ पवन बुहारता है घर, आँगन, वन, उपवन, 
सरसराता हुआ संगीत भी सुनाता है, 
फिर...
जब मैं लिखता हूँ गँवई लोक धुन पर 
थिरकती हुई किशोरियाँ का रुचिर लोकनृत्य
जहाँ प्रकृति स्वयं लाती है प्रभाती का पर्व
और भी है अनगिनत जो मैं लिख नहीं सका
इनकी सब की हर आहट में देखता हूँ, 
नितान्त स्तब्ध हो कर
तो उभरता है धरा की सुरम्य गोद में
एक सौम्य सा, सरल सा मन्दस्मित चेहरा...
ममत्व से, अपनत्व से भरा 
तुम्हारा ही!
कौन हो तुम!!!?

रामनारायण सोनी

(परिष्कृत
१७.१२.२२)

Saturday, 28 May 2022

उठो भी!

मैं सोया हुआ था
पर मुझ में वह जाग रहा था
जैसे जगा रहा हो मुझे
उठो भी! 
बहारें फिर लौट आई हैं
उस सरोवर के किनारे
प्रतीक्षारत हैं वे पथरीली आसन्दियाँ
बैठ लो घड़ीक भर,
बतखों का वही जोड़ा
जल में खिले शतदलों के बीच
डूबता उतराता है 
विस्तीर्ण नीलनभ की ओर उठी 
आह्लादित आतुर बाजुएँ
खुली हैं स्वागत में
आओ खींच लाएँ उन
मधुमय पलों के पाँखियों को
जियें फिर कल को
आज में, अभी ही

रामनारायण सोनी
२८.०५.२२

Thursday, 12 May 2022

जीवन की चादर

जब जब जीवन की पतंग के
पेच कहीं ये उलझे हैं
वाणी भी जो बोल सकी ना
तूने भाव सभी समझे हैं

जीवन की चादर करघे के
जब जब तार मेरे बिखरे हैं
तब तब कृपा तेरी बरसी है
बिगड़े काज सभी सुधरे हैं

इस भीतर की तनहाई मे मैं
एकाकी जब जब हो पाता हूँ
यह भीड़ कहीं खो जाती है
बस साथ तेरे रह जाता हूँ।

उस खास घड़ी को जी कर ही
सदियाँ पल में जी लेता हूँ
गरल भरे इस सागर में भी 
अमिय घूँट कुछ पी लेता हूँ

अन्तःपुर के खोल किवारे
जब जब तू घर आता है
मेरा अगला पिछला जीवन
कितना पावन हो जाता है

रामनारायण सोनी
१३.०५.२२

झरना झराता है



चाहे जितना बिखर जाए पानी उसका
बिखर बिखर धुआँ धुआँ हो जाए भले ही
परन्तु झरना जो एक मौज है
झरना जो एक उल्लास है
झरते ही जाना है इसे, 
झरते ही जाना है इसे
और सवार हो जाना है
हवा के महीन परों पर
उसकी धवल धार 
है कण कण का विस्तार 
गिरते जाना है ऊँचाइयों से..
सख्त चट्टानों की सख्त छातियों पर
झर-झर झरझराता नाद ही
गिर कर जब उठ खड़ा होगा
अपनी वही पुरानी धार ले कर 
फेनिल ही काया है इसकी
मस्ती में फिर से बहेगा
पतन की यादों को झाड़ कर
टूट कर बिखरना, 
बिखर कर फिर जुड़ना
साहस और सामर्थ्य है इसका
वन प्रान्तर में उसकी गूँज होंगी मौजूद
झरना इरझराता हो
जैसे अब भी
गाता है, आता है 
जीवन का मधुमय संगीत लेकर

रामनारायण सोनी
१३.०५.२२

Tuesday, 10 May 2022

मधुपरी का मधुच्छन्दा गान

मेरे घर आई मधुपरियाँ
चीकू की डाल पर
मीठे फलों  के बीच
गुनगुनाती हैं मधुच्छन्दा
गिलहरियाँ आती हैं तिड़िप तिड़िप करती
दिन भर करती है 
चीकू, आम का ब्रह्मभोज
और इस आँगन में
नीचे महमहाती है वृन्दा

प्रज्ञान

दिल भी क्या दिल है
जो धड़कना नहीं जानता
वह आँख भी कोई आँख है
जो फड़कना नहीं जानती
उस कान को भी कान कैसे कहें
जो उनके मौन को न सुन सके
वे रोंएँ तो तन की जमीन पर
बेजान उगी हुई तृणें हैं
जो रोमांचित होना नहीं जानती
वे यादें सब मरी मरी सी हैं
जो मन मस्तिष्क के आकाश में
बिजली सी गरजती और कौंधती नहीं
ये नजरें भी बस
काँच की निरी गोलियाँ सी ही हैं
अगर ये खाली कैनवास पर भी
तुम्हें नहीं देख सके
वह प्रज्ञा ही तो है 
जो हजारों आहटों में से
उसके हल्की सी पदचाप को भी
साफ साफ सुन लेती है
तुम्हें बता दूँ!
कि ये सब एक साथ
मेरे पास हैं, मेरे साथ है,
और मुझ में मौजूद है
इसलिये ही तो मैं..
महसूस करता हूँ पूरी तरह
तुम्हें! हमेशा!!

रामनारायण सोनी
९.५.२२

कृतज्ञता से भर जाऊँ मैं

मैंने जब जब निश्छल हो कर पुकारा
उसने ठीक ठीक सुना
मैंने तन्मय हो कर.. 
सुनना चाहा जब उसे
उसने सुमधुर स्वर में 
मुझे "मेरा अपना" कहा
भरोसा उस पर किया जब जब
वह संकटों से निकाल कर लाया मुझे
मैं चलता ही गया उसके पीछे पीछे
उसने मंजिल खिसका दी मेरी पहुँच में
उसने सिखाया काले पानी में तैरना
ताकि दुश्मन भी पीछा नहीं कर सके मेरा
विश्वास मेरी संवेदनाएँ नहीं
अपितु मेरे दृढ़ निश्चय का परिणाम है
वह मेरा सबसे प्यारा है।
मैंने उससे प्रार्थना की....
हे मेरे प्यारे परमात्मा!
तुम मुझे इतना खाली कर दो
कि मैं पूरे का पूरा ही..
तुम्हारी कृतज्ञता से भर जाऊँ !!!

रामनारायण सोनी
११.०५.२२

Monday, 9 May 2022

यादों की महक

ग्रेनाइट की काली सख्त चट्टान पर
पैनी छैनी से खुदी
सुकोमल सुरमई यादें
टटोल लेता हूँ मैं
एकाकीपन के घुप्प अँधेरो में भी
मिट नही सकेंगी कभी यादें ये।
अलबत्ता कतरा कतरा हो कर
बिखर जावेंगी किसी भी दिन
चट्टान के तिलिस्मी जिस्म के संग
उसकी धूल से निकलती वे सदाएँ
पुकारेंगी तुम्हें फिर! फिर!!
कि तुम!!
पिसी मेंहदी, झरे फूल
गुलाबजल  सौंधियाती मिट्टी में
रची बसी खुशबू की तरह
अब भी मौजूद हो मुझ में
तुम्हें पता है कि नहीं?

रामनारायण सोनी
०९.०५. २०२२

Thursday, 5 May 2022

प्रीत मेरी

प्रीत मेरी देह संग ना मर सकेगी
   प्रीत मेरी साँझ सी ना ढल सकेगी।।
    प्रीत की न उम्र है ना परिधियाँ ही
     प्रीत मेरी मेघ सी न गल सकेगी।

प्रीत रूहों के मिलन का नाम है
 प्राण में होता विलय जहँ प्राण है
  रूप का लालित्य बाहर हो खड़ा
   बन्धनों से मुक्ति है और त्राण है

अग्नि भी ना दह सकी इस प्रीत को
 सह सका ना क्यों जगत मन प्रीत को
  प्यास अधरों पर रुकी ले कण्ठ की
   सुन पपीहा स्वाँति के प्रिय गीत को

रामनारायण सोनी
६.५.२२