Sunday, 27 February 2022
तुम बिन
Monday, 21 February 2022
एक तू ही तू
ओ मेरे!
परम प्रिय परमात्मा!
देखा है आज मैंने
फिर से एक बार नई नजर से
कुछ अलग ही तरह से
सूर्य की आभा और प्रकाश को
पत्तों के रंग और सुन्दर आकार को
तड़ाग को और तैरती बतखों को
हिमालय और बर्फ में उबलते तप्तकुण्ड को
आकाश को और टँकी आकाशगंगाओं को
महसूस हुआ तू फूल में और खुशबू में
पवन में और प्राणों में
अलग-अलग, विविध-विभिन्न
संच्छिन्न और विच्छिन्न
कहाँ कहाँ और कहाँ नहीं
यत्र तत्र सर्वत्र
मेरे भीतर-बाहर भी
एक तू ही तू! बस तू ही तू!!
रामनारायण सोनी
२२.२.२२
Thursday, 17 February 2022
परमात्मा के अग्रदूत तुम
मैं कृतज्ञ हो लूँ
तुम्हारा सौंदर्य
जिन्दगी के थान का वह टुकड़ा
जब से मुझे मिले तुम
इसे बुना, रंगा और ओढ़ा है हमने
चादर बन कर टँगा है अब
यादों, वादों, इरादों की खूँटियों पर
कभी कभी देखता था इसे
तो कभी तुम्हें भी संग संग
वक्त गुजरता रहा
आईना तब तब का वर्तमान कहता रहा
कभी आनन्द मिला
तो कभी तकलीफें चुभती रही
न हाथ छूटे, न भरोसे ही खूटे
और हम भी कभी कहीं न टूटे
तन मेरा तुम्हारा तपता, गलता गया
जुड़ गए कुछ सिक्के,
और जुड़ते चले गये कुछ मिट्टी के ढेर
प्रिये!
वक्त की सरकती सुइयों संग
तन का सौन्दर्य पतझड़ सा क्षरता गया
मन का सौन्दर्य नवांकुरों सा निखरता गया
तुम्हारे अन्तस का
यह अखूट सौन्दर्य
जमा पूँजी है हमारी ज़िन्दगी की तिजोरी में
और....
देखो! हम कितने अमीर हो गये हैं
देख रहा हूँ मैं अपने अन्तर्चक्षुओं से
तुम्हारे हृदयतल पर खड़े
विशालकाय प्रेम पर्वत को
ऐ मेरे प्रिय!
तुम कितने सुन्दर हो
रामनारायण सोनी
१७.०२.२२
Tuesday, 15 February 2022
मेरी यह कविता
इसे क्या हो गया है यकायक
कि यह
रंगमंच के अनोखे दृश्य के पीछे
नेपथ्य की बुनावट देखने लगी है
श्रृव्य तरंगों के उस पार भी
कुछ कुछ सुनने लगी है
कागज के महीन कैनवास पर
लिपियों से चित्र बनाने लगी है
जाने कैसे
आइने के इस पार, उस पार के
आदमी को देखने, समझने लगी है
कडवे फूलों के पराग से
मधु का सृजन करने लगी है
आओ मेरे प्रिय आत्मन!
इसने तुम्हारी स्वप्न सारिका को
हौंसलों की उड़ान
देना खीख लिया है
नारियल के से कठोर
शब्दों के शल्क में
भावो का मृदुल जल
भरना जान लिया है
हृदय के आलिन्दों से
प्रेम करना सीख लिया है
मेरी यह कविता
सयानी होने लगी है।
रामनारायण सोनी
१६.०२.२२
गाओ दिल, अपने ही गीत
सुन!
ऐ मेरे दिल!!
एक लम्बी उम्र गुजार दी है तुमने
लोगों की बातें
और संगीत सुनने में
खोये भी रहे
उन महफ़िलों में, वादियों में, लयों में
वक्त पुकारता है अब तुम्हें
कि लिखो अपने गीत
गाओ और गुनगुनाओ अपने ही
गीत-संगीत
गीत इस जी हुई जिन्दगी के
संगीत अपने ही मचलते मिजाज का
रामनारायण सोनी
२१.१२. २०२२
काली कलूटी रात
Monday, 14 February 2022
बिन तुम्हारे क्या करूँगा
Sunday, 13 February 2022
जिन्दगी जिये जा रही है
जीत-हार
एक बूँद का महाकाव्य
धरा का श्रृंगार
मुझे तुम्हारा हृदय होना है
ए पुष्प!
तुम्हारे हृदयकोष को
बनाया है परमात्मा ने
जगत में परागण के
निस्तार और संचार के लिये
मुझे. . .
मुझे तुम्हारा हृदय होना है
रामनारायण सोनी
०५.०२.२०२२
रसो वै सः
मैं व्यर्थ ही में
अर्थ ढूँढता रहा
मौसम के मिजाज में
पवन के स्पर्श में
भूरे बादलों की नमी में
शाखों पर उभरती कोंपलों में
वेणु के स्वर रंध्रों में
परन्तु
मेरे प्रियतम!
तुम तो...
स्पंदित मिले
मेरे हृदय की वीथियों में
रमे हुये पोर पोर में
आच्छादित रस ग्रन्थियों में
प्रवाहित होते कण कण में
उच्छवास में, निःश्वास में
श्वास में, प्रश्वास में
कौंध जाते हो प्रिय
फिर तो...
विस्तार पा जाते हो तुम
अन्तस के आकाश से
बाहर के निस्सीम संसार तक
मौसम के निजाज में,
पवन के स्पर्श में,
बादलों की नमी में
नवाङ्कुरित कोपलों में
वेणु के अनुनाद में
व्यष्टि से समष्टि तक
तुम ही तुम, बस
रामनारायण सोनी
१३.०२.२२
Saturday, 5 February 2022
परागण
Friday, 4 February 2022
अपना आशियाना
तुम आये ऐसे!
पुकार के वे मेरे शब्द
बिखर गये अंतरिक्ष में
तुम्हें बिना छुए ही
तब मैंने
मन ही बिछा दिया था
तुम्हारे आगम पथ पर
बुझे बुझे नयन में
कितनी ज्योति जगी
भींगे भींगे बयन में
कैसी आस जगी
एकाकी मेरे जीवन में
तुम आये ऐसे कि फिर
कभी गए नहीं
रामनारायण सोनी
३.२.२०२२