कैसे कह दूँ
कि मेरे पास वक्त है
मुमकिन है,
कि मैं ही वक्त की अमानत हूँ
कैसे मान लूँ..
कि मैं तुम्हारा हूँ?
भले ही तुम मेरे हो
कैसे समझ लूँ...
कि आकाश सिर्फ परिन्दों के लिये है?
जबकि मैं भी जिन्दा हूँ
उसी की प्राण वायु से
फिर भी न जाने क्यूँ
मैं कहता हूँ, मानता हूँ, समझता हूँ
कि मैं समय की गोद में हूँ,
तुम मेरे हो,
तभी तो..!
यह जिन्दगी यूँ ही
जिये चली जा रही है
रामनारायण सोनी
१४.०२.२२
No comments:
Post a Comment