इसे क्या हो गया है यकायक
कि यह
रंगमंच के अनोखे दृश्य के पीछे
नेपथ्य की बुनावट देखने लगी है
श्रृव्य तरंगों के उस पार भी
कुछ कुछ सुनने लगी है
कागज के महीन कैनवास पर
लिपियों से चित्र बनाने लगी है
जाने कैसे
आइने के इस पार, उस पार के
आदमी को देखने, समझने लगी है
कडवे फूलों के पराग से
मधु का सृजन करने लगी है
आओ मेरे प्रिय आत्मन!
इसने तुम्हारी स्वप्न सारिका को
हौंसलों की उड़ान
देना खीख लिया है
नारियल के से कठोर
शब्दों के शल्क में
भावो का मृदुल जल
भरना जान लिया है
हृदय के आलिन्दों से
प्रेम करना सीख लिया है
मेरी यह कविता
सयानी होने लगी है।
रामनारायण सोनी
१६.०२.२२
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