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Tuesday, 12 December 2023

जय जय हे गुरुदेव

जय जय हे गुरुदेव!

तुम क्षितिज के पार से वो युक्ति कोई ढूँढ लाओ
केंचुली में मैं बँधा हूँ आ इसे तुम खोल जाओ
जो वचन तुमने दिया हाथ मस्तक पर छुआ था
मैं घिरा अवसाद में हूँ कर कृपा गुरूदेव आओ

अन्ध उर में घोर रजनी दण्ड ले कर आ खड़ी है
पाश है जकड़े हुए भवबन्ध की बाधा बड़ी है
व्यर्थनाओं से उमर भर ये झोलियाँ मैनें भरी है
पार तुम उतरावगे भवसिन्धु से, आशा बड़ी है

मैं तृणों की नोक सा हूँ तुम गहन आकाश से हो
मैं अकिंचन, मैं प्रवासी, मुक्ति के तुम द्वार से हो
तुम अभय के हो प्रदाता, सीस चरणों में नवाऊँ
तुम प्रथम, अन्तिम तुम्हीं दीन के विश्वास से हो।

रामनारायण सोनी
१३.१२.२३