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Sunday, 31 July 2022

कुछ घड़ी में जीवन जी लें

कुछ घड़ी में जीवन जी लें

क्या कहूँ
कुछ कहा नहीं जाता
शब्द सब दबे पड़ें हैं
भावों के भार तले
ओठ थिरक नहीं पाये
वहीं के वहीं जरा से हिले
भाव भंगिमाएँ भागती दौड़ती रहीं

पलकों के शतदल पर
ठहरे हैं नयन अधखुले
रुके-रुके, झुके-झुके, वहीं टिके
श्वास भी-प्रश्वास भी, धड़कने रुकी रुकी
ठगे ठगे से सब, बिना हिले डुले

और जब तुम मिले !!!
हुआ है कुछ और भी यहाँ
बज उठा है एक वाद्यवृन्द
सितार, जलतरंग,
सरोद, पखावज, मृदंग
मन के मदमस्त मेरे रंगमहल में
संगत में इनके ये आ मिले
प्रतीक्षा में थे ये तुम्हारी ही
हृदय की उमगती वीथियों में
आओ! कुछ घड़ी में
"एक पूरा जीवन जी लें"!!!

रामनारायण सोनी
०१.०८.२०२२

Wednesday, 27 July 2022

तावीज में पल

जानते होगे शायद अब भी तुम

मिले थे जब अचानक हम!
उतार कर रख ली थी
अपनी अपनी घडियाँ जेबों में
रोकने के लिये सरपट दौड़ते वक्त को
पर रुका नहीं वह
तब जो लगा था वह
हमें फिर नहीं लगा कभी भी
गुजर गई थी सदियाँ
उस एक ही पल में
जिये थे हम उस एक पल में
एक पूरी की पूरी जिन्दगी!
... तुम्हें याद हो के न याद हो!
उम्र के अपने तावीज में,
गले में बाँध कर घूमता हूँ मैं
यकबयक चूमता रहता हूँ इसे
जैसे कि यहीं हो तुम

रामनारायण सोनी
२६.०७.२२

Thursday, 21 July 2022

दीप जलता रहा

मिट्टी का ढेला जमीं से उठाया
तुम्हीं ने मुझे चाक पर था चढ़ाया।
हुई रोशनी तैल बाती दी तुमने
अंधेरों से लड़ने हमें था सिखाया।।

मैं मिट्टी था मिट्टी थी पहिचान मेरी 
मेरी जात औकात मिट्टी थी मेरी।
बैठा था गोदी, धरा मेरी माँ थी
फ़कत है जगह ताक में अब तो मेरी।।

आँखों में आँखें धरे चाँद तारे
बतियाते थे सब वो सगे थे हमारे I
दीवारो दर में बने हम तो बन्दी 
हमारी नजर में हमीं हैं बिचारे।।

मिला सुब्ह सूरज तो इतरा रहे थे
ढली शाम साये जब गहरा रहे थे।
जले हैं हमीं आग पी पी के ऐसी
जला के हमीं खुद को, शरमा रहे थे।।

ये अलग बात है हमसे रिश्ते नये हैं
हुई रोशनी संग अपनी सगाई।
सीखा है हमने यूँ जलना खुशी से
पीड़ा जलन की है जग से छुपाई।।

परवाना जब भी, जलता है मुझ में
बैठ बैठ जाता है, मजबूर दिल ये ।
बुझूँगा जलूँगा कई बार मैं तो
इसे जिन्दगी तो, मिलेगी ना फिर ये।।

देखे हैं मैंने कई रंग जग के
आले में चुपचाप दर्शक बना हूँ।
कभी प्रेमियों की चुहल भी सुनी है
कभी प्रेम के मैं रस में सना हूँ।।

रामनारायण सोनी
०३.०५.२२

Sunday, 17 July 2022

जिद कर बैठा हूँ

मैं तुम्हारी जीत और अपनी हार की जिद कर बैठा हूँ ।
रोशनी मीलों पीछे छोड़ अँधेरों से प्यार कर बैठा हूँ
आईना ही झूँठ बोलता रहा मुझसे जिन्दगी भर
न जाने क्यों बुतों को ही मैं जिन्दा मान बैठा हूँ।।

ये माना जिन्दगी तो बुलबुला है क्या सफर इसका
मिली गिनती की जो सांसें भरोसा क्या करें इनका
मगर जीना मयस्सर हो गया तो दो घड़ी जी लें
मिला ले धडकनें धडकन में, न ठहरे सिलसिला इनका।


रामनारायण सोनी


Wednesday, 13 July 2022

चन्द अशआर

चन्द अशआर

जो था वो अब मैं रहा नहीं
जो हूँ वो किसी को पता नहीं

मुझसे नाराज हो के फिर तुम
खुद से ही खफ़ा होते हो क्यूँ?

ये माना कि इश्क में बंदिशें बहुत है
बन्दगी है इश्क इतना ही समझा हूँ मैं

जो बाजार में दिन भर ताले बेचते हैं
दुकानें उनकी भी कभी लुट जाती है।
बिसात पर तो खेल कई देखे हमने
बिन खेले भी बाजियाँ जीती जाती है

जो उनकी आँखों में बयां होते है
वो लफ्ज किताबों में कहाँ होते हैं।

रख लो आईने हजारों हज़ार लेकिन
हकीकत से नजरें मिलानी ही पड़ती है

जवाब फल से दिया जाता है पत्थर का
एक पेड़ होना भी बड़ा इम्तिहान है

वो आईने धोता फिर रहा है
उसे अपने चेहरे पे शक हो रहा है

सूरज का डूबना तय था और चाँद का सँवरना भी
शिद्दत से हो रहा था जिन्दगी का गुजरना भी.....

ये जिन्दगी तमन्नाओं का गुलदस्ता ही तो है
कुछ मुरझाती है तो कुछ चुभ जाती है। 

रात की बात न कर वहाँ रोशन माहताब होता है 
हर सक्ष अपनी हदों में खुद लाजवाब होता है

न मीरा की पीर हूँ, ना ही मैं कोई कबीर हूँ
फख्त शब्दों से इश्क है, ऐसा इक फ़कीर हूँ

मोहब्बत कोई धूल भी नहीं कि हवा में उड़ा दूँ
इश्क कोई जंग भी तो नहीं कि पत्थर से लड़ा दूँ
रात बहुत काली है, जालिम है, कैसे मैं ये भुला दूँ?
राह तेरी रोशन हो, आ मैं दिया दिल का जला दूँ


तुमने शायद मान लिया है अब ये पूरी तरह
कि साँसों का चलते जाना जिन्दगी है मेरी
अहसास, जज़्बात रख के भूल गए हो कहीं
मेरा इश्क सरहदों पार भी एक बन्दगी है मेरी

मेरी मुफलिसी अब हद को पार कर गई  
जितनी भी पास थी मोहब्बत, खर्च हो गई


मेरी साँसे कुछ बेसुरी सी हो गई है सुनो तो ज़रा
मेरी धड़कने उधड़ सी गई हैं फिर बुनो तो जरा
बस्तियाँ, कारवाँ, वो लवाजमें कहीं गुम हो गए
जब से गए तुम, गुम हो गए हैं हम सुनो तो ज़रा


एक तुम ही तो थे जिसे बताता था मै राज-ए- दिल
अब न लोग सुनते हैं न ही मगरूर खामोशियाँ ही
तुम्हारे हिस्से का वह वक्त मैं अब भी खाली रखता हूँ
और सोने के पहले ही वे हसीं यादें सिरहाने रखता हूँ

इन्तज़ार में एक जिन्दगी कम पड़ जाएगी, मालूम ना था
वरना दो जिन्दगियाँ रब से माँग लेते, इसी जिन्दगी में

तुझे पता नही है, जिस्म से इश्क बड़ा होता है
न जलता है न गलता है न ही ये फ़ना होता है

थक जाती हैं आवाज और लफ़्ज भी थक जाते हैं
ढूँढते ढूँढते ।
अकेली एक अदद खामोशी ढूँढ लाती है कहीं से भी तुम्हें॥

उन लम्हों में जो खुशबू थी न, वो तुम्हारी ही थी
कमबख्त महकते हैं उसी तरह याद में अब भी

गुजर जाती है हर रात वो उदासी लेकर तनहा तनहा 
फिर उस दिन तो हम भी हुए थे यूँ ही तनहा तनहा
दिल से कहीं दूर निकल आए हैं हम यूँ ही तनहा तनहा
गुजरी हुई बारिश में हो जैसे एक बूँद तनहा तनहा

लिखा नहीं जा सकता उसे, जिसे महसूस किया
पढ़ा नही जा सका उसे, जिसे महसूस किया
पढ़ना लिखना तो सिर्फ कलम की घिसावट है
दिलों की जुबान वही समझे जिसे बस महसूस किया

चीजों और रिश्तों का फर्क समझना होगा
आसमां में घर नहीं होते जमीं पे उतरना होगा।
रोशनी उधार की लम्बी नही चल सकती है
अपने ही दिये से घर में उजाला करना होगा।।

हाँ आज तलक घर पे घर बदले हैं कई मैंने
पर बदला नही है ये तेरा दर मैंने कभी भी
तू जानता है ये कि यह घर-दर और ये दुनिया
बदलूँगा जब, तू भी न जान सकेगा कभी भी

मैं मिट्टी हूँ मिट्टी कहानी मेरी
कल भी यही थी कल भी रहूँगी
घड़ा हूँ, चिलम हूँ या सकोरा रहूँ
आखिर में फिर भी मैं मिट्टी रहूँगी

वक्त ने एक दिन कान में बुदबुदाया
ये पल जो भी है अभी हाथ में मेरे I
कल मैं तुझे यह फिर ना लौटा सकूँगा
इसलिए चल हमकदम बन कर साथ मेरे।।

फानूस सी मेरी इस छत में टँगी है आशाएँ
सोने की जुगत करता हूँ तो शोर मचाती है।
फिक्रों की किताब सिरहाने रख कर मेरे
जिन्दगी एक खामोशी दे कर चली जाती है।।

रिश्तों को थोड़ा वक्त चाहिये निगाहों को फक्त तू चाहिये
रात की माँग में हैं सितारे बहुत मुझे रोशनी की किरन चाहिये।
है मय के पियाले निराले बहुत मुझे बस तुम्हारी नजर चाहिये
है बस्ती में लाखों नगीने भरे नहीं ये मुझे फक्त तू चाहिये।।

मैं अमीर था शहर में कई रईसों की तरह
एक दिन आई तकदीर कोई सक्ष लेकर।
मेरे हिस्से में था जो मेरे दिल का कवंल
चुरा लिया है मुझसे मेरा वो ही दगा देकर।।

जिन्दगी की अजब चाल कभी सबक एक देती है।
पूरी कायनात दे कर भी उस एक को छीन लेती है।।

रामनारायण सोनी
१.०८.२०२२




Friday, 8 July 2022

रोशनी में अंधेरों का सैलाब


मैंने होश सम्हाला ही न था तब तक
अभी छुप भी नहीं पाया !
मैं मेरी माँ के नर्म नर्म आँचल में
सिर को सहलाने वाले हाथों को
मैं समझ ही ना पाया था!!
मैं थोड़ा सा भी!!
देख नहीं पाया था 
जी भर कर उसे अभी!!!
और वो चली गई!!!!
वो चली गई बिन बताए, बिना कहे
मेरी बिना मेरी सुने, बिना कोई लोरी सुनाये

कौन चुप करता मुझे
चार काँधे आए कहीं से
उठा ले गए उसे
तीन रस्सियों से लटकती 
एक काला सा धुआँ उगलती 
यह जिन्दगी!!
उठा कर मैं चला हूँ, चलता ही रहा हूँ 
और ढो रहा हूँ तब से अब तलक!!
जैसे ही देखने को उतावला होता हूँ !
आँखों में बसी उसकी बसी छबि को
आँसुओं की नदी में
बह जाती है मेरी माँ

दादी मेरी कहती रही 
बाँह पकड़ कर मेरी
वह माँ तेरी चाँद पर चली गई है
इस बार दिखाऊंगी तुझे
पूनम के दिन उसकी परछाईं उस चाँद में
तब से हर माह एक पूनम आती है
आँखों में अमावस ठूँस कर चली जाती है
हर चौंधियाती तेज रोशनी में भी
मैं अँधेरों का सैलाब देखता हूँ

रामनारायण सोनी
०८ .०७.२२


Sunday, 3 July 2022

तुम आज भी याद आते हो (नज़्म)


तुम आज भी बहुत याद आते हो
क्यों याद आते हो?
इसे न तुम जानते हो
न हम जानते हैं
कि तुम क्यों याद आते हो?
तुम आज भी बहुत याद आते हो

तुम आज भी बहुत याद आते हो
इसे हम तुम से पूछ नहीं सकते
ना ही हम तुम्हें बता सकते 
ये याद हमारे दिल में आती है
यह भी कि क्यों याद आते हो?
तुम आज भी बहुत याद आते हो

तुम आज भी बहुत याद आते हो
फिजाएँ खुद महकतीं हैं
हवाएँ भी मचलती हैं
घटाएँ नाचती फिरती हैं गगन भर में
ये खबर सारी तुम्हारी हैं
तुम्ही तो याद आते हो
तुम आज भी बहुत याद आते हो

रामनारायण सोनी