जानते होगे शायद अब भी तुम
मिले थे जब अचानक हम!
उतार कर रख ली थी
अपनी अपनी घडियाँ जेबों में
रोकने के लिये सरपट दौड़ते वक्त को
पर रुका नहीं वह
तब जो लगा था वह
हमें फिर नहीं लगा कभी भी
गुजर गई थी सदियाँ
उस एक ही पल में
जिये थे हम उस एक पल में
एक पूरी की पूरी जिन्दगी!
... तुम्हें याद हो के न याद हो!
उम्र के अपने तावीज में,
गले में बाँध कर घूमता हूँ मैं
यकबयक चूमता रहता हूँ इसे
जैसे कि यहीं हो तुम
रामनारायण सोनी
२६.०७.२२
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