कुछ घड़ी में जीवन जी लें
क्या कहूँ
कुछ कहा नहीं जाता
शब्द सब दबे पड़ें हैं
भावों के भार तले
ओठ थिरक नहीं पाये
वहीं के वहीं जरा से हिले
भाव भंगिमाएँ भागती दौड़ती रहीं
पलकों के शतदल पर
ठहरे हैं नयन अधखुले
रुके-रुके, झुके-झुके, वहीं टिके
श्वास भी-प्रश्वास भी, धड़कने रुकी रुकी
ठगे ठगे से सब, बिना हिले डुले
और जब तुम मिले !!!
हुआ है कुछ और भी यहाँ
बज उठा है एक वाद्यवृन्द
सितार, जलतरंग,
सरोद, पखावज, मृदंग
मन के मदमस्त मेरे रंगमहल में
संगत में इनके ये आ मिले
प्रतीक्षा में थे ये तुम्हारी ही
हृदय की उमगती वीथियों में
आओ! कुछ घड़ी में
"एक पूरा जीवन जी लें"!!!
रामनारायण सोनी
०१.०८.२०२२
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