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Friday, 8 July 2022

रोशनी में अंधेरों का सैलाब


मैंने होश सम्हाला ही न था तब तक
अभी छुप भी नहीं पाया !
मैं मेरी माँ के नर्म नर्म आँचल में
सिर को सहलाने वाले हाथों को
मैं समझ ही ना पाया था!!
मैं थोड़ा सा भी!!
देख नहीं पाया था 
जी भर कर उसे अभी!!!
और वो चली गई!!!!
वो चली गई बिन बताए, बिना कहे
मेरी बिना मेरी सुने, बिना कोई लोरी सुनाये

कौन चुप करता मुझे
चार काँधे आए कहीं से
उठा ले गए उसे
तीन रस्सियों से लटकती 
एक काला सा धुआँ उगलती 
यह जिन्दगी!!
उठा कर मैं चला हूँ, चलता ही रहा हूँ 
और ढो रहा हूँ तब से अब तलक!!
जैसे ही देखने को उतावला होता हूँ !
आँखों में बसी उसकी बसी छबि को
आँसुओं की नदी में
बह जाती है मेरी माँ

दादी मेरी कहती रही 
बाँह पकड़ कर मेरी
वह माँ तेरी चाँद पर चली गई है
इस बार दिखाऊंगी तुझे
पूनम के दिन उसकी परछाईं उस चाँद में
तब से हर माह एक पूनम आती है
आँखों में अमावस ठूँस कर चली जाती है
हर चौंधियाती तेज रोशनी में भी
मैं अँधेरों का सैलाब देखता हूँ

रामनारायण सोनी
०८ .०७.२२


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