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Tuesday, 12 December 2023

जय जय हे गुरुदेव

जय जय हे गुरुदेव!

तुम क्षितिज के पार से वो युक्ति कोई ढूँढ लाओ
केंचुली में मैं बँधा हूँ आ इसे तुम खोल जाओ
जो वचन तुमने दिया हाथ मस्तक पर छुआ था
मैं घिरा अवसाद में हूँ कर कृपा गुरूदेव आओ

अन्ध उर में घोर रजनी दण्ड ले कर आ खड़ी है
पाश है जकड़े हुए भवबन्ध की बाधा बड़ी है
व्यर्थनाओं से उमर भर ये झोलियाँ मैनें भरी है
पार तुम उतरावगे भवसिन्धु से, आशा बड़ी है

मैं तृणों की नोक सा हूँ तुम गहन आकाश से हो
मैं अकिंचन, मैं प्रवासी, मुक्ति के तुम द्वार से हो
तुम अभय के हो प्रदाता, सीस चरणों में नवाऊँ
तुम प्रथम, अन्तिम तुम्हीं दीन के विश्वास से हो।

रामनारायण सोनी
१३.१२.२३

Saturday, 16 September 2023

आओ तुम भी सुनो

आओ! तुम भी सुनो जरा!

दिशाएँ बोलती हैं
दरख्त, फ़िजाएँ, तितलियाँ
सब कैसे बोलती हैं 
उनकी अपनी जुबानी
वे ध्वनियाँ धन्य हैं
जो ले कर आती हैं
प्रतिध्वनियाँ फिर फिर दिलों तक

आवाजें दी थी मैंने कभी तुम्हें
जो दिशाओं में
गूँजती, अनुगूँजती हैं फिर फिर
वे न मरी हैं न मरेंगी कभी
आओ! तुम भी सुनो!
इसलिये कि...
इनमें तुम भी हो! मैं भी हूँ! साथ साथ!

रामनारायण सोनी

Tuesday, 18 July 2023

जो अभी तुम हो!

जो अभी तुम हो!

कोई होने दे रहा है तुम्हें
तो तुम हो!
जो अभी तुम हो!
सुबह वो ही, लाता है वो ही शाम भी
वह तुम में खास लाता है, आम भी
प्यास लाता है, और लाता है जाम भी
तुम कब के निकल लिये होते
वह उठाता है तुम्हें, सुलाता है शाम भी
कौन सी साँस आखरी हो जाए
खो सकते हो तन भी और यह नाम भी।
कोई होने दे रहा है
तो तुम हो।

ये मालो असबाब,
तरक्की और तुम्हारा ये काम भी
तुम्हारा ईमान और तुम्हारा हराम भी
सारे नाते और ये रिश्ते तमाम भी
मुठ्ठी मे रेत के मानिन्द गुलाम भी
एक खटके में खत्म हों जायें
इन सबके सभी काम भी।
कोई होने दे रहा है
तो तुम हो।

रामनारायण सोनी
१७.०७.२३

Saturday, 15 July 2023

मैं थोड़ा थोड़ा छूट गया हूँ

 मैं थोड़ा थोड़ा छूट गया हूँ


माँ बाबा की गोदी में मैं कुछ थोड़ा सा छूट गया हूँ

तुतलाती बोली ले उनके कानों में कुछ छूट गया हूँ
पलटा पीछे तो देखा वे कहीं दूर जो निकल गये हैं
खेल नियति के देख देख मैं बचपन में ही खूट गया हूँ
उन पल की पदचाप सुनी तो तिनका तिनका टूट गया हूँ

खड़िया की टूटी कलमों का मुँह में स्वाद अभी बाकी है
थूँक लगा कर लिखा मिटाकर पट्टी कैसे ढाँकी है
छड़ी गुरू की हाथ पड़ी थी अब भी मुझको याद बड़ी है
फिर भी सिर पर नेहिल उनकी छुअन अभी बाकी हैन्
पहले गुरू की पहली शिक्षा घूँट घूँट कर तभी पिया हूँ
उन पल की पदचाप सुनी तो तिनका तिनका टूट गया हूँ

अन्नी चन्नी, लंगड़ी में कुछ अंगबंग और चोक चंग में
सोलह सार मंडी फर्शी पर रोत्ता खेले यार संग में
होली के वे शक्कर गहने, पहने फिर कुट कुट खाये थे
कैसी शरम सरल बचपन में खेले खाये अजब ढंग में
उन सोने चाँदी के दिन में थोड़ा थोड़ा छूट गया हूँ 
उन पल की पदचाप सुनी तो तिनका तिनका टूट गया हूँ

रामनारायण सोनी
०७.०७.२३

कितना हो कर देखा मैंने

 कितना हो कर देखा मैंने


तुम्हारे बगैर कितना हो कर देखा है मैंने
मैंने हटात् देखा कि 
मैं शून्य की चट्टान से टकरा गया हूँ
कैसी फिसलन है ये
जो यादों के खण्डहर की
उस बावड़ी तक जाती है
जहाँ दलदल भर बची है अब।

तुम्हारे बगैर कितना हो कर देखा मैंने
चाँद तो रहा हूँ मैं, पर
भाग्य की कालिमा ने ढँक लिया मुझे
देखो! मैं अमावस का हो कर रह गया हूँ।

तुम्हारे बगैर कितना हो कर देखा मैंने
दीपक सा देखता हूँ औचक कर
निगल रही है दीपशिखा को
अपनी ही आशा की वर्तिका

तुम्हारे बगैर कितना हो कर देखा मैंने
हम दोनों की बीच की नेह सरिता की
धार सूख चली है
हमें नौकायन कराने वाली
कश्ती औंधे मुँह पड़ी है 
बिरहा की तपती रेत में

तुम्हारे बगैर कितना हो कर देखा मैंने
हथेली में बिधना की खींची रेखा
डोर थी जोड़ने वाली हमें-तुम्हें
उन हवाओं से बतियाती 
अठखेलियाँ करती पतंग की
मेरे हाथों में के हुचके से बिछुड़ गई है।

तुम्हारे बगैर कितना हो कर देखा मैंने
दौड़ता हूँ वृत्त की अन्तहीन
परिधि पर निरन्तर
न तो तुम मिले मेरे आवर्त में, 
तिस पर, खो गया हूँ मैं ही 

रामनारायण सोनी
३.०७.२३

परछाईं में जियूँगा

 परछाईं में जियूँगा


तुम्हारी स्निग्ध चाँदनी में 
मेरी परछाई और भी ठण्डी हो जाती है
मेरे मन तन में उठती अगन भी
इसे पिघला न सकेगी
जल भी जाए सब कुछ
सम्हाल कर रखना तुम
मेरी इस परछाई को
ताकि मैं इसमें जी सकूँ 
तुम्हारे लिये!

रामनारायण सोनी
०५.०७.२३

Saturday, 1 July 2023

मन गीत कोई गाने लगता है

नवगीत

मन गीत कोई गाने लागा है

विकल हृदय और तृषित अधर पर
जब से तेरी नवगुलाब की
पंखुड़ियों की छुअन मिली है।
मन की तपती हुई धरा को,
ओ शुष्क कंठ को
अमित नेह के रुचिर मेघ की
मीठी बूँद मिली है।।
   मुझमें इक पावस जागा है।
   मन गीत कोई गाने लागा है।।

शतदल से इस हृदय पत्र पर
बैठे हैं शबनम के मोती
अम्बर की चूनर में राका
तारक की मणिमाल पिरोती
प्रखर प्रेम में सनी वर्तिका
थाम खड़ी है जगमग ज्योति
ऐसे में पढ़ने को आतुर
तेरे इन नयनों की पाती
    यह प्रेम दीप ऐसे जागा है।
    मन गीत कोई गाने लागा है।।

जी चाहे फिर प्यास लगे,
फिर नयनों में आस जगे
फिर सीपी के फलक खुले वो
मोती का सा प्रेम पगे।
रीती गागर, सूने पनघट,
पनिहारिन के रसरी के संग
सर सर कर आती जाती
स्वाँस जगे प्रश्वाँस जगे।।
   अवगुण्ठन को जी भागा है।
    मन गीत कोई गाने लागा है।।

रामनारायण सोनी
०१.०७.२३

Tuesday, 27 June 2023

दो घूँट प्यार के ला देना


दो घूँट प्यार के ला देना

नहीं चाहिये सोम मुझे दो बूँद नेह की मिल जाए
नहीं मलय का चन्दन चाहूँ रिश्तों का लेपन मिल जाए।
मैं समझूँगा झोली में सब हीरे माणिक रत्न भरे है
नजर प्यार की पल भर को ही हौले से गर छू जाए।।
दो पल मुझे जिला देना, 
दो घूँट प्यार के ला देना।।

मेघदूत देखे बहुतेरे जो ले प्रेम पत्र उड़ते फिरते 
उपवन में चहके चंचरीक गुन गुन कर गुंजन हों करते।
मैं तो उन मीठे शब्दों की प्यास लिये बैठा हूँ
जो दिल के छालों पर मरहम सा लेपन हों करते।।  
दो पल मुझे जिला देना, 
दो घूँट प्यार के ला देना।। 

नहीं चाहिये इन्द्रधनुष के वे चटकीले से सात रंग
अमलतास की पीली लटकन झालर सा वह ढंग।
मेरी चाहत मसि पाने की जिससे लिख डालूँ 
जीवन में अपनों संग जीने वाली अलमस्त तुरंग।। 
दो पल मुझे जिला देना, 
दो घूँट प्यार के ला देना।। 

रामनारायण सोनी
२८.०६.२३

Monday, 26 June 2023

गीत सृजन के गावेंगे

बिना छेद की बंसी ने गीत कोई क्या गाया है?
बिना पीर के माता ने पूत कोई क्या जाया है?

तुम चलो उजालों की धरती पर छाया साथ रहेगी
मिले भले पूनम की रातें मावस भी तो तुम्हें मिलेगी
सुख की बिजली यदा कदा अँधियारे में दमकेगी
दुःख की काली घनी बदरिया मौजूद सदा रहेगी
बिना छेद की बंसी ने गीत कोई क्या गाया है?
बिना पीर के माता ने पूत कोई क्या जाया है?

बैठ शिखर पर ध्वजा बिचारी सदा पवन से लड़ती है
मेंहदी सिल पर घिस-घिस कर ही हाथों में रचती है।
ऊँचे वृक्षों महलों पर ही बिजली अक्सर गिरती है
कितना तपा हिमालय पूछो हमको तब गंगा मिलती है।।
बिना छेद की बंसी ने गीत कोई क्या गाया है?
बिना पीर के माता ने पूत कोई क्या जाया है?

कितने सहे प्रहार करारे पत्थर ने मूरत बनने तक
टूटे कितने पत्थर कण-कण धारा से प्रपात होने तक।
मिट्टी ने गल-तप कर ही तो रम्य इमारत बनती है
बीज मिटा है गल कर सड़ कर पादप के आने तक।।
बिना छेद की बंसी ने गीत कोई क्या गाया है?
बिना पीर के माता ने पूत कोई क्या जाया है?

हम जीवन की अक्षय निधि को पा कर भी बिसरे हैं
छोटी छोटी मुश्किल से भी धूल कणों के से बिखरे हैं।
जितने भी अवतार हुए वे अन्तःपीड़ा से गुजरे हैं
पर साहस और धर्म पर चल और अधिक निखरे हैं।।
बिना छेद की बंसी ने गीत कोई क्या गाया है?
बिना पीर के माता ने पूत कोई क्या जाया है?

जंगल हैं तो कभी कभी वे दावानल भी आवेंगे
कश्ती को भी सागर में वे निर्मम तूफान सतावंगे
काँटे कितने शाख उगेंगे फिर भी फूल खिलावेंगे
हार जीत का ख्याल भूल हम गीत सृजन के गावेंगे
बिना छेद की बंसी ने गीत कोई क्या गाया है?
बिना पीर के माता ने पूत कोई क्या जाया है?
बिना छेद की बंसी ने गीत कोई क्या गाया है?
बिना पीर के माता ने पूत कोई क्या जाया है?

रामनारायण सोनी
२७ .०६.२३

Thursday, 22 June 2023

दो दिये दो जिन्दगी

दो दिये दो जिन्दगी

दीप मैं और दीप तुम भी फिर विषमता क्यों हुई है।
दो ध्रुवों सी जिन्दगी ये किस तरह हम ने छुई है।।

जब गढ़ा था तन हमारा, एक से थे तेल-बाती
एक सी ही ज्योति वह है जो हमें आकर जलाती।।
नाम भी तो एक ही है पर मुझे आला मिला है
पर तुझी से अप्सराएँ थालियाँ अपनी सजाती।।
दीप मैं और दीप तुम भी फिर विषमता क्यों हुई है।
दो ध्रुवों सी जिन्दगी ये किस तरह हम ने छुई है।।

तुम सजे फानूस में यह भाग्य है प्रियतम तुम्हारा
इन कुटीरों के तमस से लड़ रहा हूँ मैं बिचारा
सोच लो पर इक घड़ी ही जल रहे हैं एक से हम
गर्व को तुमने प्रकासा जिन्दगी का हूँ मैं सहारा
दीप मैं और दीप तुम भी फिर विषमता क्यों हुई है।
दो ध्रुवों सी जिन्दगी ये किस तरह हम ने छुई है।।

तुम छतों पर कैद हो कर रोशनी की हो गवाही
देखते तुम प्यालियों को भर रही कैसे सुराही
देखता मैं जिन्दगी यह लिख रही कैसी सचाई
क्रन्दनों के गाँव में जो लिख रहा बचपन रुबाई
दीप मैं और दीप तुम भी फिर विषमता क्यों हुई है।
दो ध्रुवों सी जिन्दगी ये किस तरह हम ने छुई है।।

टट्टरों से झाँकती है घूरती प्यासी निगाहें
मोल में बिकती जवानी ओट में लेकर कराहें
ये वही तो लोग हैं जो तेरी बस्ती से हैं आये
कान उनके ना सुनेंगे चीख और इनकी कराहें
दीप मैं और दीप तुम भी फिर विषमता क्यों हुई है।
दो ध्रुवों सी जिन्दगी ये किस तरह हम ने छुई है।।

जिन्दगी जब लौटती है मुट्ठियों में प्राण ले कर
भार तन का झेलती अवसाद का अहसास ले कर
गिट्टियों के संग टूटे हाड़ और फिर भाग इनके
कट रहा कैसा सफर हर ओर है बहपा कहर
दीप मैं और दीप तुम भी फिर विषमता क्यों हुई है।
दो ध्रुवों सी जिन्दगी ये किस तरह हम ने छुई है।।

रामनारायण सोनी
22.06.23

Sunday, 18 June 2023

स्मृतियों में सदा जियूँगा




स्मृतियों में सदा जियूँगा

मृत्यु भले ही वरण करे मैं स्मृतियों में सदा जियूँगा
तुझे जिया हूँ जीते जी मैं छोड़ सुधा क्या गरल पियूँगा
मुझ में कितना दर्द घुला है
काँटों ने भी मुझे छला है
तप तप कर कितना पिघला मैं
तब साँचे में तेरे ढला मैं
तुझे भरम है भूल जायगा, फिर फिर तुझमें मैं लौटूँगा
मृत्यु भले ही वरण करे मैं स्मृतियों में सदा जियूँगा

क्या वे माटी के लमहे थे
जो पानी से बह निकले थे
क्या वे वचन निरे फिकरे थे
सौ सौ जो सौगंध भरे थे
उन्ही पलों की याद दिलाने, फिर फिर तुझमें मैं लौटूँगा
मृत्यु भले ही वरण करे मैं स्मृतियों में सदा जियूँगा

वट की लटकी हुई जड़ों की
पींगें क्या तुम बिसर गई हो
बेंदी चौड़े भाल सजा कर
नव कलिका सी निखर गई हो
उन बिम्बों की सुधी कराने, फिर फिर तुझ में लौटूँगा
मृत्यु भले ही वरण करे मैं स्मृतियों में सदा जियूँगा

चुपके चुपके उन तारों की
झिलमिल फिर फिर वही कहेगी
भाव भरे शब्दों की दिल में
रसधारा फिर वही बहेगी
उन शब्दों भावों में घुल कर, फिर फिर तुझ में लौटूँगा
मृत्यु भले ही वरण करे मैं स्मृतियों में सदा जियूँगा

श्यामल कुन्तल की वेणी में
बूँदनियों की माल सजी थी
माटी पहली बारिश पी कर
जब तन मन में सौंधी महकी थी
याद उसी की तुझे दिलाने, फिर फिर तुझ में लौटूँगा
मृत्यु भले ही वरण करे मैं स्मृतियों में सदा जियूँगा

रामनारायण सोनी

Friday, 16 June 2023

घुल जाएँ हम

घुल जाएँ हम

कहीं ऐसा न हो कि
सामने हो कर भी
पुतलियों में ही खड़ा रह जाऊँ
चलो हम मूँद लें
आँखें अपनी अपनी
जब तलक घुल न जाएँ हम
भीतर ही भीतर 
मैं तुझ में! तू मुझ में!!

रामनारायण सोनी
१६.०६.२३

Thursday, 15 June 2023

ऐ जिन्दगी

ऐ जिन्दगी

जिन्दगी मोड़ दे कर मुझे 
  खुद तो वहीं खड़ी है
कई ख्वाहिशें गलियारों में 
  अब भी वहीं पड़ी हैं

ऐ जिन्दगी खुद याद कर
   तू कब गले मिली थी
बस मैं ही चला अकेला
   तू साथ कब चली थी

खुश्क है तेरी हवाएँ
    पी गई पानी नयन का
सूख कर काँटा हुआ हर
    फूल मेरे इस चमन का

गुजरते हुए पलों की
     रफ्तार कम तो कर ले
ले लूँ जरा सा दम मैं
     तू भी जरा तो दम ले

लौटेंगे फिर कभी ना
      जो जो भी मेरे संग है
फिर से न मिल सकेगा
      यही मौज की लहर है

फिर कब जुड़ेंगे मेले
       अपनों का साथ इतना
टूटे न ख्वाब कोई
       अब टूटे न कोई सपना

छोटी सी मेरी अँजुरी
       थोडी बिसात इसकी
है डोर मेरी उलझी 
      थगती हुई पतंग की

इक दौर वो था जिसमें
      रोशन चराग थे सब
इक दौर ये है जिसमें
      श्याही में डूबी है शब
        
रामनारायण सोनी
१४.०६.२३


Sunday, 11 June 2023

चुभते हुए ख्वाब

चुभते हुए ख्वाब 

कुछ ख्वाब! चुभते बहुत हैं
तैर जाती है 
गुलमोहर के फूलों की रक्तिमा
आँखों के इन सकोरों में!
और फिर भर जाती है अचानक ही
सांभर झील की सी नमक-गन्ध 
ये कँटीले ख्वाब! 
चुभते बहुत हैं

रामनारायण सोनी
१२.०६.२३

Saturday, 10 June 2023

कस्तूरी के मृग

कस्तूरी के मृग ही क्यूँ  यूँ जंगल जंगल भाग रहे हैं।
पावन प्रेम पला जिन उर में वे सारी रातें जाग रहे हैं।।
अँधियारों से लड़ने वाले आले के सब दीप बुझे वे।
प्रात किरण से रो रो कर फिर से जीवन माँग रहे है।।

अधरों की पहचान बनी यह प्यास और डर का कंपन।
बहते नयनों को कोरों में ठहरेगा कैसे कोई अंजन।।
फूलों पर उस मृत तितली के अब तो केवल पंख बचे हैं।
प्रेम ग्रंथ में विरह व्यथा के किसने ये सोपान रचे हैं।।

हलकी सी चलती बयार से कॅंप जाती है शिखर पताका।
शबनम के आँसू पातों पर छोड़ गई वो ठिठुरी राका।।
पनघट, अमराई, चौपालों पर नहीं किसी ने ताका।
सुबक रहा बिरवा का आँगन बरसों से ना कोई झाँका।।

सूना नगर, हवेली सूनी कभी यहाँ वे रंगमहल थे।
सखियों की थी चुहलबाजियाँ चंचल चपल शगल थे।।
आगत के आगम में जिनके पलक पाँवड़े बिछ जाते थे।
उनमें से कुछ सुखद सलोने मीठे सपने बो जाते थे

जुड़ते नहीं रंग के मेले, आभासी दुनिया सारी है 
रिश्तों के सम्बोधन तक में पश्चिम हम पर भारी है
पलकों पर ठहरे काजल में कैसा आ कर खार घुला है
सच के माथे पड़ी शिलाएँ झूँठ अनर्गल भारी है

रामनारायण सोनी
११.०६.२३

Friday, 9 June 2023

तुम न आए

दुआ करो कि अब मेरी
       याददाश्त ही खो जाए।
दिल के दरिया में बहते पल 
       लौट कहीं न फिर आ जाएँ।।

बीते तन और रीते मन में
        फिर से ज्वार नहीं आ जाए।
अवगुंठन के शहदी सपने
        नयन कोर में धुल न जाए।।

सांझ सकारे अपने द्वारे
        देहरी का दीपक कहता है।
सब जग लौटा ठौर ठौर पर
        बाट निहारूँ, तुम ना आए।।

जो कहानी जी रही मैं
        मर चुकी कब की उसी में।
मौत ने लिख दी इबारत
        मैं जली फिर फिर उसी में।।

रामनारायण सोनी
6.6.23

मन का संस्पर्श

मन का संस्पर्श

जब भी मैंने तुम्हें देखा 
केवल तन के पार ही देखा है
रूह की निगाह से!
रूह को देखा है!!
अक्षर और शब्द छुप जाते हैं कहीं
अर्थ छोड़ जाते हैं, मेरे मन में
मन के आकाश में कहता है मन ही 
मन सुनता है मन ही मन
मन के संस्पर्श कितने गहरे हैं
भाव कोष में अभी भी गुदगुदाते हैं 
वैसे के वैसे ही

रामनारायण सोनी
८.६.२३


Wednesday, 7 June 2023

नदी के बेचारे पत्थर

नदी के बिचारे पत्थर

नदी की तलहटी में 
पत्थर कुछ पड़े हैं 
तो कुछ गड़े हैं 
अभी अभी कुछ लोग आए 
और छाती पर पांव रखकर चले गए 
जंगलात की मिट्टी आई 
वह कर चली गई मुझ पर से गुजर कर
धार नदी की कब से 
उजाल रही है हमें
काले ही हैं अब कुछ और काले हो गए 
कुछ चट्टानें बिवाइयों की तरह 
अभी भी फटी पड़ी है 
ये गड़े-पड़े चिकने पत्थर हैं
कुछ वर्ष पहले तक जल मग्न रहते थे 
धारे नदी के सब पी लिए हैं आदमी ने 
जल रहा हूँ मैं और मेरी नदी का तन-बदन 
अब आग उगलते हुए 
इस सूरज की तपिश में 
अब एक और नया डर समा गया है मुझमें
कि कोई आदमी आवेगा कहीं से
मुझे उखाड़ कर ले जावेगा 
मशीनों में भरकर पीस देगा हमें
गिट्टी और चूरी के रूप में टूट जावेंगे
चुन दिये जावेंगे हम सभी
एक दिन आदमी की 
ऐश-ओ-आराम देने वाली दीवारों में

रामनारायण सोनी
१.६.२३


Monday, 5 June 2023

रंगकर्म का सूत्रधार

रंगकर्म का सूत्रधार

कैसे सूत्रधार हो तुम
बिना मुखौटे के भी
चेहरा बदल दिया है मेरा तुमने!
मेरी ही आवाज में मुझमें से अब
बोलता है कोई और ही
तुम्हारे रंगकर्म में अब
धरातल पर कर्म के रंग नहीं बचे हैं
सब कुछ आभासी हो चुका है
सिनेमा घर के निर्जीव पर्दों पर 
चलती हुई परछाइयों की तरह
मेरी पुतलियों में तो बस
कठपुतलियाँ ही नृत्य करती हैं
नेपथ्य में बजती हुई थाप पर
मैं उछलता हूँ, कूदता हूँ, रोता-हँसता हूँ
उन सामने की कुर्सियों पर
लोग अँधेरे में ही डूबे डूबे
बड़े अजीब हैं ये लोग
मेरे साथ साथ बहने लगते हैं
वे खुद को 
मुझ में ही जीने लगते हैं
वे शायद जानते नहीं कि
मैं खुद ही ढँका हुआ होता हूँ पूरा का पूरा
चोलों, लबादों और मुखौटों से 
कभी कभी ये लोग
मेरे रोने पर खुशियाँ मनाते हैं
जैसे बच्चा जन्मते ही रोता है, तब
मेरे हँसने पर गुस्साते है, तब
जैसे खलनायक ने ठहाका लगाया हो
तंग आ चुका हूँ दूसरे-दूसरों को जीते जीते
हे मेरे जीवन के सूत्रधार!
अब.....
मैं मुझमें लौटना चाहता हूँ! 

रामनारायण सोनी
०६.०६.२३

Saturday, 3 June 2023

रंग मेरी संकल्पना के

रंग मेरी संकल्पना के 

भले ही मैं बेढब होऊँ कितना ही,
मैं और मेरी संकल्पनाएँ
विनम्र और स्पन्जी हैं, 
सोंखती है पहले जमाने भर के रंगों को
अपने भीतर के महीन सुराखों में
उँडेलती हैं कैनवास की धरती पर
और देखो कैसे हटात् उग आये हैं!
ये सब्ज पेड़ और 
मेरी पुतलियों में
धरती यह तृणावर्त हो गई हैं
लौट आये है आप्रवासी पाँखी
और मैं!
मैं आनन्द से भर गया हूँ!
गले-गले तक!!

रामनारायण सोनी
०४.०६.२३

Thursday, 1 June 2023

पाँच कविताएँ


क्या अधूरा हूँ मैं?

चाँद भी यह अधूरा है
कितनी ही बार...
कभी पूरब से उगता है 
तो कभी पश्चिम से। 
 कम-स-कम महीने में 
अट्ठाईस बार रहा है अधूरा, 
फिर एक बार पूरा खाली
मौन, मुखर, विश्रान्त
और एक बार भरा भरा पूनों का
टकटकी लगाये देखता है
अपनी आँखों के दूधिया पानी में
पानी के रंगों में नहाते
देखता है मगन हो कर
कूँचियों से छूटे उन रंगों को
बना चुकी हैं जो
द्रुम-दल, नदियाँ, पहाड़ और झरन 
सुनता है मौन मुखर ध्वनियों को
तुम भी सुन रहे हो ना!

रामनारायण सोनी
२९.०५.२३

 Dance with the waves, move with the sea. Let the rhythm of the water set your soul free."

- Christy Ann Martine

#kathascopesketch #watercolour #landscape #sea #seawaves


🌺🙏🌺🙏

तुम्हारी हमारी अधूरी कहानी

कहानी तो कहानी ही है
कहानी अधूरी ही होती है
पूरा होता है उपन्यास
कहानी! जीवन के बड़े से प्याज का
महज एक अलग हुआ छिलका है
वे लोग अक्सर पागल हैं
जो इस छिलके को
सुनहरे फ्रेम में मढ़ कर
दिल के भीतर टाँग लेते हैं
एक हिडन फाइल की तरह
पर ताज्जुब है
खुशबूदार, रुआँसी, रुलाती, हँसाती
ये अमर कहानियाँ 
आदमी खुद से खुद कहता सुनता है
फिर ये...
जिस्म के साथ ही दफन होती है

रामनारायण सोनी
२९.०५.२३


🌺🌺🙏🙏🍁🍁🍁


मेरे पास मलयगिरि है
पर यकायक मलयज पवन की 
दिशाएँ कहीं और हो गई हैं,
मैं रात भर ढूँढता ही रहता हूँ 
अपना एक सितारा!
इन आकाश गंगाओं में।
मेरे हृदय की गठरी में 
सावन कई बँधे रखें हैं
डरता हूँ खोलते ही इसे
वे बह निकलेंगे आँखों के रास्ते 
ऐसे में मुझे वो देख न ले।

रामनारायण सोनी
३०.०५.२३

यह जानते हुए भी कि...
कोई नहीं सुनेगा इन स्पन्दनों को
जाने क्यों ये शब्द हठी हो गये हैं
मना लेने को कोशिशें व्यर्थ हुई मेरी 
फेंके गये पत्थरों से
आसमान में छेद नहीं होते
चिड़िया की चोंच में भरे पानी से
दावानल नहीं बुझा करती
जुगनू फिर जुगनू है
सूरज, सूरज ही रहेगा

१.६.२३

🙏🍁🍁🌺🌺🙏

नदी के बिचारे पत्थर

नदी की तलहटी में 
पत्थर कुछ पड़े हैं 
तो कुछ गड़े हैं 
अभी भी कुछ लोग आए 
और छाती पर पांव रखकर चले गए 
जंगलात की मिट्टी आई 
वह कर चली गई 
धार नदी की कब से 
उजाल रही है इन्हें 
इनमें से काले कुछ और काले हो गए 
कुछ चट्टानें बिवाइयों की तरह 
अभी भी फटी पड़ी है 
ये गड़े-पड़े चिकने पत्थर
कुछ वर्ष पहले तक जल मग्न रहते थे 
धारे सब पी लिए हैं आदमी ने 
जल रहा हूँ अब आग उगलते 
इस सूरज की तपिश में 
डरता हूँ कि कोई आवेगा 
मुझे उखाड़ने मशीनों में भरकर ले जावेगा
गिट्टी और चूरी के रूप में टूट 
एक दिन आदमी की 
ऐश-ओ- आराम देने वाली दीवारों में

रामनारायण सोनी
१.६.२३

🌺🌺🌺💐💐🌼🙏🌺🙏

यह मेरा इन्दौर है, यह राष्ट्र का सिरमौर है

जो कदम हमने चले पदचिह्न बनते वे गये।
गढ़ लिये प्रतिमान हमने कर्म से सब नित नये।।
युग प्रवर्तन के नये संकल्प भर कर मुट्ठियों में
स्वच्छता के ध्वज तले एकत्र जन गण सब हुए।।
यह मेरा इन्दौर है, यह राष्ट्र का सिरमौर है

शहर के बच्चे बड़े सहभागिता इसमें किये हैं
स्वच्छता के सूत्र सारे विश्व ने हम से लिये हैं 
पञ्च तत्वों के प्रदूषण खत्म कैसे हों शहर से
जन-प्रशासन ने हमारे लक्ष्य हाथों में लिये हैं।।
यह मेरा इन्दौर है, यह राष्ट्र का सिरमौर है

कान्ह और यह सरस्वती स्वच्छ नीरा हो बहेगी
छत्रियाँ तट पर विरासत की कथाएँ खुद कहेंगी।
राजवाड़ा है हृदय में मराठा-शौर्य का इतिहास गाता
रंग की पिचकारियाँ उल्लास की गाथा कहेगी।।

थी कभी यह राजधानी सूत की और सूतमिल की
यह मेरा इन्दौर है, यह राष्ट्र का सिरमौर है
थी श्रमिक को बाँटती आजीविका परिवार भर की
कौन जाने इस नगर को क्यो नजर काली लगी
छिन गया वैभव श्रमों का छिन गई थी शान्ति जन की
यह मेरा इन्दौर है, यह राष्ट्र का सिरमौर है

पर शहर जीवट हमारा फिर नई अंगड़ाई ले ली
कृषि उपज और मण्डियों ने राह अपनी खोज डाली
फिर जगा व्यापार का इक नया अभिसार ले कर
शहर हो स्मार्ट सूरत फिजाँ मिल कर बदल डाली।
यह मेरा इन्दौर है, यह राष्ट्र का सिरमौर है

चल शिखर की श्रृंखलाएँ हर क्षेत्र में अपनी बनाएँ
सीखने यह विश्व सारा हैं ऑंगने इन्दौर आए
भोग छप्पन बाफलों संग आएँ और सब जीम जाएँ
मालवी की मालवा की मधुरता सब को चखाएँ।।
यह मेरा इन्दौर है, यह राष्ट्र का सिरमौर है
हम सभी मिल कर इसे फिर राष्ट्र का गौरव बनाएँ।।।


रामनारायण सोनी
२८.०५.२३


यह मेरा इन्दौर है

यह मेरा इन्दौर है, यह राष्ट्र का सिरमौर है

जो कदम हमने चले पदचिह्न बनते वे गये।
गढ़ लिये प्रतिमान हमने कर्म से सब नित नये।।
युग प्रवर्तन के नये संकल्प भर कर मुट्ठियों में
स्वच्छता के ध्वज तले एकत्र जन गण सब हुए।।
यह मेरा इन्दौर है, यह राष्ट्र का सिरमौर है

शहर के बच्चे बड़े सहभागिता इसमें किये हैं
स्वच्छता के सूत्र सारे विश्व ने हम से लिये हैं
पञ्च तत्वों के प्रदूषण खत्म कैसे हों शहर से
जन-प्रशासन ने हमारे लक्ष्य हाथों में लिये हैं।।
यह मेरा इन्दौर है, यह राष्ट्र का सिरमौर है

कान्ह और यह सरस्वती स्वच्छ नीरा हो बहेगी
छत्रियाँ तट पर विरासत की कथाएँ खुद कहेंगी।
राजवाड़ा है हृदय में मराठा-शौर्य का इतिहास गाता
रंग की पिचकारियाँ उल्लास की गाथा कहेगी।।

थी कभी यह राजधानी सूत की और सूतमिल कीयह मेरा इन्दौर है, यह राष्ट्र का सिरमौर है

थी श्रमिक को बाँटती आजीविका परिवार भर की
कौन जाने इस नगर को क्यो नजर काली लगी
छिन गया वैभव श्रमों का छिन गई थी शान्ति जन की
यह मेरा इन्दौर है, यह राष्ट्र का सिरमौर है

पर शहर जीवट हमारा फिर नई अंगड़ाई ले ली
कृषि उपज और मण्डियों ने राह अपनी खोज डाली
फिर जगा व्यापार का इक नया अभिसार ले कर
शहर हो स्मार्ट सूरत फिजाँ मिल कर बदल डाली।
यह मेरा इन्दौर है, यह राष्ट्र का सिरमौर है

चल शिखर की श्रृंखलाएँ हर क्षेत्र में अपनी बनाएँ
सीखने यह विश्व सारा हैं ऑंगने इन्दौर आए
भोग छप्पन बाफलों संग आएँ और सब जीम जाएँ
मालवी की मालवा की मधुरता सब को चखाएँ।।
यह मेरा इन्दौर है, यह राष्ट्र का सिरमौर है
हम सभी मिल कर इसे फिर राष्ट्र का गौरव बनाएँ।।।

रामनारायण सोनी
२८.०५.२३

Thursday, 25 May 2023

मैं ही तो हूँ

जाने क्या हुआ मुझे
समय की तेज बहती धार के संग
सहज रूप से बहते बहते
यकायक मैं स्थिर हो गया हूँ
गुलमोहर का सुर्ख रंग
रगों में लहू बन कर उतर गया है
पुतलियों पर काई अपनी हरीतिमा की
दरियाँ बिछा गईं है
पैरों तले उल्टी खड़ी मेरी परछाईं
देख देख हँसती है मुझ पर
कि तुम छोटे से गुलंगे थे, अब
सिर पर खड़ी सफेद घाँस तक आ गये हो
तन की मलमली चादर पर
उभर आई है सिलवटों की पगडण्डियाँ
हाथों की अंजुरी में पड़ी रेखाएँ
भविष्य के चरम बिन्दुओं के
निकट आ कर ठिठक सी गई हैं
कह रही है बस अतीत की
उलझी सुलझी कथाएँ हरबोलों की तरह
ठहरी ठहरी सी मेरी इस ठठरी में
मन चौकडियाँ भरता है
अट्टालिकाओं और झरोखों से
झाँक झाँक कर
रोता है, हँसता है, उदास होता है
पढ़ता है जीवन के सप्त सर्ग
देखो! जाने क्या हुआ मुझे
समय की तेज बहती धार के संग
सहज रूप से बहते बहते
यकायक मैं स्थिर हो गया हूँ
हाँ यह मैं ही हूँ!

रामनारायण सोनी
२६.०५.२३

ठीक ही तो है

तुमने खूब बाँटा
पर बँटे नहीं हो
क्योंकि बाँटना अभी और भी है
तुम घटे नहीं, न ही घटी चमक
क्योंकि तुम 
शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा हो
चाँदनी तुम्हीं से तो है!
तुम रुके नहीं
क्योंकि तुम सदा नीरा नदी हो
तुम्हारे किनारों पर
कई गाँव, कई शहर 
कई खेत, कई पंछी प्यासे हैं
तुमसे ही मल्लाहों के घर चूल्हे जलेंगे
तुम पिघले हो 
करुणा से भर कर
क्योंकि फूँस के उन टप्परों में
जिन्दगियाँ जोह रही थी बाट
पथराई निगाहों से तुम्हारी ही
बरस रहे हो
नेह के मेह ले कर
ऐसे ही बने रहना है तुम्हें
नित्य, निरन्तर, अविचल, अविकल

रामनारायण सोनी
२५.०५.२३ 

Tuesday, 23 May 2023

पत्थर में फूल खिलाएँ

पत्थर में फूल खिलाओ

पाषाणों से टकरा कर भी देखो निर्झर गाता है
जलती लू में खड़ा गुलमुहर कितना मुस्काता है
गल गल कर भी मेघ धरा की कैसे प्यास बुझाता है
स्वयं बिखर कर सुमन जगत को सौरभ दे जाता है

कंपते वीणा के तारों ने स्वर लहरों को जन्म दिया है
तप तप कर ही महा उदधि ने जल जीवन से धन्य किया है
पिघल रहा हिमगिरि पर पावन गंगा का वरदान दिया है
सृष्टि बचाने शिव-शंकर ने स्वयं हलाहल पान किया है

सृष्टि बनाने के पहले खुद ब्रह्मा तप में खूब तपे हैं
संस्कृति की गंगा लाने को कई भगीरथ यहाँ खपे हैं
पग पग पर अवरोध खड़े पर दरिया इनसे कहाँ रुके हैं
तूफानों की कमी नहीं पर मस्तूलों के सिर न झुके है

जीवन इतना सरल नहीं है झंझावात कई आवेंगे
दुर्गम पथ हैं शूल भरे हैं पग में छाले भर जावेंगे
निज श्रम और विश्वास स्वयं में सदा बनाये रखना
साहस के सिर मुकुट सजेगा बन्दी जन गुन गावेंगे

रामनारायण सोनी
२४.०५.२३

Tuesday, 25 April 2023

मेरा काम तो है पुकार

तो क्या हुआ 
जो तुम न मिल सके!
मिला तो वह ईश्वर भी नहीं मुझे!
फिर भी मैने रत्ती भर नही छोड़ी है
मेरी चाहतें, प्रार्थनाएँ, अर्चनाएँ
मेरा तो काम है बस 
पुकार! असदास!! और बन्दगी!!!

रामनारायण सोनी
२५.०४.२३

Monday, 10 April 2023

अर्चना पञ्च तत्वों की

अर्चना पञ्च तत्वों की

तुम ही तो आधार हो
व्यष्टि के, समष्टि के, जीव के, जगत के

हे पवन !
ठहरी सी क्यों हो मलय की वीथियों में
चन्दन की सुगन्ध बाट जोह रही है तुम्हारी
इन्हें जन जन तक पहुँचा दो
प्राणवह, गन्धवह, वेगवाहिनी,
विश्व व्यापिनी, अमित बलवान हो तुम !
प्राणदा हो तुम!

हे जल!
तुम्हारी कल कल करती धाराओं को कहो !
प्रपातों से गिर कर धुआँ-धुआँ हो कर देखो !
इस निसर्ग को सौंदर्य से भर क्यों नहीं देती ?
भर दो नद -नदियों को अपने पावन जल से
इस दग्ध जीवन की प्यास मिटाने की सामर्थ्य है
केवल तुम में ही
कह दो इन्हे जगजीवन ले कर बहो ! .

हे दीप्त अग्नि!
ऋत्विज वेदियों को समिधाओं से
सज्जित कर प्रतिक्षा कर रहे हैं तुम्हारी ही
ऋचाएँ सर्वदिक् अनुनादित हो रही हैं
अपनी उत्तप्त जिव्हाओं में भर कर
पहुँचा दो आहुतियाँ देवों को
हे नचिकेत! हमारे भोज्य को
सुपाच्य और आरोग्यप्रद बनाओ!

हे मातृभूमि!
तुम पालक, धरित्री हो!
और जीवन दायिनी हो !
हम पर प्रसन्न हो कर हम पर अनुग्रह करो!
कृतार्थ करो हम पुत्रों को

हे असीम अम्बर!
इधर यहाँ भी, वहाँ भी हो तुम...
दिवस के प्रकाश में छोटे हो जाते हो
अँधेरे का उदय होते ही
तुम में उगती है अकाशगंगाएँ
और यहाँ...
इधर मेरे घर के कक्ष में
यह रात कहती है
हे दीपक! आओ
और मेरी एक कोने में
अपनी रोशनी लेकर बैठ जाओ
यहाँ किसी के मिलन की घड़ी आ रही है
साक्षी बनो उस महापर्व के

रामनारायण सोनी
१५/११/२२

महायोग:- मूलाधार से विशुद्धि तक

श्रीमद्भगवद्गीता
भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा।।7/4।।
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्।।7/5।।

Friday, 17 March 2023

जिन्दगी सँवार लो

जिन्दगी सँवार लो

झरने की झझराती वो आवाज,
सूखे पत्तों की ये सरसराहट,
बादलों की वो गरज,
बूँदों की टिप-टिप
मिमियाते मेमने,
लगती होगी तुम्हें महज आवाजें
पर मुझे तो लगता है
जैसे प्रकृति इनके माध्यम से बोलती है।
अपने कान नहीं,
अपना ध्यान लगा कर सुनो जरा!
ये देवदार की ध्वजाएँ,
रोमावली हैं अल्पनाएँ
नदियाँ हैं शिराएँ,
अलकें हैं लताएँ
श्रृंग शिखर हैं परिपुष्ट भुजाएँ
धरा के धाम पर गगन का वितान है
जैस जगती के मण्डप में
साकार हो रहा सृष्टि का विधान है
प्रदर्श नहीं महादर्श है
प्रकृति का मनोरम आधान है
खुले नयनों से निहार लो जरा!
जीवन छोटा सा है
सँवार लो जरा

रामनारायण सोनी
१८.०३.२३

Thursday, 16 March 2023

महाविनाश की ओर

भूल जाते हैं कि हम ने प्राण खींचा है पवन से
तृप्ति ले कर चल रही हर बूँद धरती से गगन से
जान लो इक ग्रास भर का अन्न महिनों में उपजता
कई वर्षों तक है तपता तब कहीं यह वन सरसता

यह धरा है माँ हमारी, पालती है चर अचर को
खाद कृत्रिम डाल कर विष से भरा इसके उदर को
मौन धरती कँपकँपाती इस तरह इस क्रूर नर से
जो विकासों की कहानी गढ रहा विध्वंस ही से

जब न था विकसित जगत तब लोग सब ही स्वस्थ थे
स्वच्छ थे तब तत्व पाँचों, सदा नीरा सरित नद थे
स्वानुशासन में मनुज थे, प्रकृति लावण्यमय थी
बस्तियाँ, बन-बाग घर घर, हर गली वे मोदमय थी

बस अर्चना में अरु हवन में हम वरुण को पूजते हैं
वृक्ष के तन काट कर ही हम पुरन्दर पूजते हैं
विष उगलती चिमनियों से हम पवन को रौंदते हैं
प्यास का नगदीकरण जल बोतलें भर बेचते हैं

रोज बढ़ते ताप से तप यह हिमालय गल रहा है
विश्व बढ़ते तापक्रम की भट्टियों में जल रहा है
सूखती इन जल शिराओं में बची है बाढ़ केवल 
हो रहा विकसित जगत बस यह कथानक चल रहा है

सागरों से उठ चले घन हरितिमा को ढूँढ़ते हैं
वन कहाँ सब गुम हुए है प्रान्तरों से पूछते हैं
हम कहाँ बरसें कहाँ ठहरें कहाँ बैठें बता दो
पर्वतों के पत्थरों से पीट माथा खीजते हैं

अब न होगी गोधूली ही भूमि गोचर नहीं बची है
नोट छापू बाग उपवन, यह महा माया रची है
पंछियों के नीड़ बिखरे, अब गोरैया कुछ बची है
वनचरों के वंशजों पर तीर तलवारें खिंची है

रामनारायण सोनी


 






Wednesday, 15 March 2023

आत्मा का आह्लाद

आत्मा का आह्लाद

गूँगा जो बोलता है,
बहरा जो सुनता है,
बिना आँख के भी जो देखता है
वह भाषा है, बोली है, जुबान है
वह केवल 'मौन' है
वह सन्नाटा है, वह निस्पन्द है।
फुसफुसाहट, शोर, दहाड़, गर्जन
बहुत सुने होंगे, पर
सुनो इस मौन को
यह 'अनहद नाद' है
शरीर का नहीं, मन का नहीं
आत्मा का आह्लाद है

रामनारायण सोनी
13.03.23

Wednesday, 1 March 2023

तुम्हारी मौजूदगी

तुम्हारी मौजूदगी

तुम्हारी मौजूदगी
मेरे जीवन में
बसन्त की सुहानी सुबह में 
एक खिला हुआ गुलाब है
ग्रीष्म की चिलचिलाती धूप में
गुलमोहर का फूल है
वर्षा में झिरमिराती फुहार है
शरद ऋतु में कमलदल पर
ठहरी हुई शबनम है
हेमन्त में गुनगुनाती धूप है
शिशिर में रुई के फाहों जैसा
बरसता हिम है

तुम्हारी मौजूदगी
अस्ताचल को जाते सूर्य की
सुनहरी किरण है
अँधेरी रात में
टिमटिमाता तारा है
बरखा की बूँदों पर
चित्रलिखा इन्द्रधनुष है
और ठिठुरती शरद में
तृणों का नोक पर आसन्न
रजतमयी ओस कण है

तुम्हारी मौजूदगी
जलतरंग से उठती हुई
मधुमय रागिनी है
और इन से भी परे
तुम्हारी उपस्थिति
मेरे जीवन का गीत-संगीत है

रामनारायण सोनी
२.३.२३

नूतन नव विहान


नूतन नव-विहान

कल फिर एक नया दिवस होगा! 
उसी पुरातन सूर्य के साथ!
होगी वही सुरम्या मैदिनी
पर कुछ बीज नये होंगे। 
वह नवआशाओं के इन्द्रधनुष से! 
आप्लावित होगा फिर वही आकाश, 
दामिनियों के संग मेघों के तृप्त उदर में 
खारे समुद्र का मृदु आसुत जल होगा। 
धरती की वही प्यास होगी 
पर तृप्तियाँ चल कर स्वयं मूर्त होंगी। 
रात भर सुस्ताई हवाओं की 
सूक्ष्मतम कणिकाओं के गर्भ में 
प्रातः के कुसुमित पुष्पों की 
मधुसौरभ समाहित होगी। 
उज्ज्वल रश्मियों से द्रुमदलों के अणु-अणु में 
पमात्मा का सौंदर्य प्रतिबिम्बित होगा। 
दर्शन कर सकेंगे जन-जन इनका।

फिर एक नया दिन होगा! 
रजकणों में गोखुरों के आघात से 
उत्पन्न उर्मियाँ होंगी 
और वे रोलियाँ की स्वर्णाभा ले कर 
पश्चिम दिशा को आवृत्त कर डालेंगी। 
अपने अपने गृहों से निर्गमित हो कर 
पञ्चाग्नियाँ दिव्य हविष्य ले कर 
ऊर्ध्वाकाश में देवों को परितुष्ट करेंगी। 
ऐसे में प्राची के आलोकित अरुणाभ 
दिगन्त को निहारने पर विहंग-वरूथ 
कलरव किये बिना कैसे रह सकेंगे?

एक नया दिन फिर होगा! 
जरा व्याधियाँ सब विखंडित होंगी, 
अपने स्कन्धों में फिर पौरुष दौड़ेगा। 
उत्साह के अश्वों की हिनाहिनाहट से 
उपत्यकाएँ गूँज उठेंगी। 
प्रखर प्रज्ञा की स्रोतस्विनियाँ 
मनस्वियों के हृदयों से उत्सर्जित होंगी, 
जो अर्चियों के प्रकम्प से 
ब्रह्मनाद का उद्घोष करेंगी।

फिर से एक दिन नया होगा!
उदय होगा भास्कर भुवन में 
नूतन नवविहान ले कर 
उपासना जन्य सिद्धियों 
और कर्मजा समृद्धियों का 
दिशा दिशा में प्रतिवर्षण होगा। 
पुरुषार्थ की अग्नि शलाकाएँ प्रतिरोधों को
विदीर्ण कर देने वाली शक्तियाँ स्फूर्त होंगी।

फिर उस दिवस की नीरव निशा 
नीहारिकाओं अथवा धवल ज्योत्सना को 
ले कर उपस्थित होंगी 
जिसमें यह धरा फिर सद्यस्नात होगी।
फिर अहोरात्र में शिखर-शिखर 
उज्ज्वल कीर्ति पताकाएँ 
स्वच्छन्द आकाश को चूमेंगी। 
दिग दिगन्त सामगान के 
प्रगीतों से आह्लादित होंगे।
ऐसा ही है 
"मेरे खुले नयनों के स्वप्नों का संसार"

रामनारायण सोनी
१.३.२३

Tuesday, 21 February 2023

छोड़ दिया लिखना मैंने

छोड़ दिया लिखना मैंने

मैंने लिखना छोड़ दिया है
क्योंकि मैं...
किताबों में लिखे चेहरे
और चेहरे पर लिखी किताब
पढ़ना चाहता हूँ
इसलिये मैंने लिखना छोड़ दिया है

मैंने कहना छोड़ दिया है
क्योंकि मैं..
तुम्हारी पीड़ा, सुख-दुःख
तुम्हारी अनुभूतियाँ, 
जिन्दगी के कड़वे, खट्टे-मीठे 
सच सुनना चाहता हूँ
इसलिये मैंने कहना छोड़ दिया है

मैंने देखना छोड़ दिया है
अब मुझे महलों दुमहलों की 
खिड़कियाँ, मेहराबें और कंगूरे में
दम्भ ही दम्भ नजर आता है।
मुझे एक गहरी खाई दिखाई पड़ती है..
बड़ी मंजिलों वाले घरों और
पसीने से लथपथ इन मजूरों की
बरसाती से ढँकी वे झुग्गियों में  
इन निचली बस्तियाँ, बस्तियों में से
दौड़ता, हाँफता, बिलखता, आदमी!
जहाँ टप्परो से टपकते हैं संत्रास,
उनमें चारों ओर फैली
मच्छरों, मक्खियों की भिनभिनाहट
मुझे चैन से रहने नहीं देती

मैंने देखना - दिखाना छोड़ दिया है
जबकि वहाँ...
हमारे - तुम्हारे, इनके-उनके
फेंके गए कबाड़, उतरे- पुतरे
बीनते - बटोरते, टालते - टटोलते
वे छोटे बड़े अधमरे जिस्म
मेरे जेहन में, चेतना के संसार में
तैरते रहते हैं
मैं देखता हूँ ठगा - ठिठका
मेरी इन छलछलाई ऑंखों से
नहीं देख पाता हूँ
वे गगनचुम्बी अट्टालिकाएँ 
सभ्यता के शिखरों की चौंधियाती चमक
और उनके कदमों में पड़ी वे
अधमरे जिस्मों से भरी झुग्गियाँ

हाँ! इसलिये छोड़ दिया है मैंने..
लिखना, कहना और देखना

रामनारायण सोनी

दीप मेरे

दीप मेरे!
तुम हृदय में सजे क्या
स्वप्न जागे, रात जागी
फिर तिमिर की प्यास भागी
आत्मबोधी प्रखर प्रज्ञा
क्षणिक जग यह स्मरण है
प्राण की संचेतना का
चिन्मयी यह विस्तरण है
आ चलें हम!
रश्मियों का प्राश कर लें!


Sunday, 19 February 2023

तुम शाश्वत सत्य सनातन हो

तुम शाश्वत सत्य सनातन हो

तुम अद्भुत हो, हे वंदनीय! तुम असीम सुख दाता हो
तुम तो मेरे जीवन-धन हो तुम मेरे भाग्य विधाता हो
तुम चिदानन्द आनन्द विभो! और दुःखों के त्राता हो 
तुम ही कर्ता हर्ता सब के और जगत के धाता हो
तुम शाश्वत सत्य सनातन हो, प्रतिबिम्बित कण कण में

तुम असीम हो तुम अनन्त तुम हो व्यापक सचराचर में 
तुम परमज्योति बन कर रहते हो रवि में और सुधाकर में 
तुम ज्ञानमयी- विज्ञानमयी विद्या के परम प्रदाता हो
तुममें सब है सब में तुम हो बाहर भी तुम, तुम ही उर में
तुम शाश्वत सत्य सनातन हो, प्रतिबिम्बित कण कण में

तुमसे ही मिलता सुख-वैभव नवनिधि प्रवर प्रदाता हो
तुम पावन परमेश्वर ऐसे गुण जिनके जग गाता हो
निर्बल मन और चित्त हमारा, तुम सब कष्टों के त्राता हो
तुम उदार, उज्ज्वल, वरेण्य तुम जन जन के मन ज्ञाता हो
तुम शाश्वत सत्य सनातन हो, प्रतिबिम्बित कण कण में

तुम शाश्वत सत्य सनातन हो प्रतिबिम्बित कण कण में
तुम हो जल में थल में नभ में पावक और समीरण में
तुम ही हो वह कठिन कुलिश, तुम ही कोमल कुसुम प्रभो
तुम त्रिकाल तुम महाकाल तुम लय में और क्षरण में
तुम शाश्वत सत्य सनातन हो, प्रतिबिम्बित कण कण में

रामनारायण सोनी
१७.०२.२३

हे नाथ तुम्हें ना भूल सकूँ!

हे नाथ तुम्हें ना भूल सकूँ!

मरुथल में हो ढूँढ रहा प्यासा मृग जैसे बूँद बूँद
दिग दिगन्त में फैली है जग की तृष्णा की घनी धुन्ध
इन्द्रिय के घोड़े थके थके, काँधे आगे को झुके झुके
इस लोभ मोह के चक्कर में, आशा के टूटे सभी बन्ध
  अब तेरी याद सताती है
  आँखें भींग भींग जाती है

इस मन में मैल भरा इतना सागर में खार भरा जितना
इस पाप पुण्य की गठरी में है माल भरा मैंने कितना
पर सुमर नहीं पाया मैं तीनों पन बीत गये रीते
इस कलुष भरे जीवन को ही मैं रहा पालता इतना
  अब तेरी याद सताती है
  आँखें भींग भींग जाती है

इस हाड़ मांस के पिंजर को सारी ही उम्र सजाया हूँ
रहा बीनता कंकर पत्थर हीरा जनम गवाँया हूँ
द्वार द्वार और नगर नगर में भटक रहा था मैं अब तक
तुमने उपकार किये इतने मैं समझ अभी पाया हूँ
  अब तेरी याद सताती है
  आँखें भींग भींग जाती है

मन की अन्धी गलियों में तुम रोशन हो कर छा जाओ
अपनी करुणा से हे प्रभु! तुम मेरी झोली भर जाओ
तम के काले घन ने घेरा है दुःख दर्दों ने डाला डेरा
हे नाथ! तुम्हें ना भूल सकूँ अन्तर में ऐसे रम जाओ
  अब तेरी याद सताती है
  आँखें भींग भींग जाती है

हे प्राण कण्ठ में रुके हुए वाणी अवरुद्ध हुई जाती
कानों तक आई आवाजें फिर वापस लौट कहीं जाती
पर सिर्फ तेरी पदचाप सुनूँ यही मेरीअभिलाषा है
हे प्रणतपाल! हे दीनबन्धु! मैं हूँ बस तेरा आराती
  अब तेरी याद सताती है
  आँखें भींग भींग जाती है

रामनारायण सोनी
१६.०२.२३

Sunday, 12 February 2023

जो मिल गया सम्हाल ले

जो मिल गया सम्हाल ले

तू कौन है? विचार कर, खुदी में खुद तलाश कर
आज दिन नया मिला, इसी का तू सिंगार कर।
चुनौतियाँ हजार हों भले, तू मोर्चा संभाल ले
चला गया वो भूल जा, जो मिल गया सम्हाल ले।।

जोखिमों का काफिला है जिन्दगी में जान ले
हर कदम पे खेल है, हर खेल को पहचान ले।
खत्म खेल भूल कर तू, फिर नया तू हाथ ले
चला गया वो भूल जा, जो मिल गया सम्हाल ले।।

रोज क्यों तू मर रहा है, खुद को आज मार ले
बिछड़ गया जो आज में, कल से भी निकाल दे।
जो मिल गया, सहेज ले, बिखर गया बिसार  दे
चला गया वो भूल जा, जो मिल गया सम्हाल ले।।

आया है सो जायगा ये, मृत्यु सत्य जान कर
इस धरा पे जो धरा, धरा रहेगा ध्यान कर।
जो अरूप रूह है वो, अमर रहेगी मान ले
चला गया वो भूल जा, जो मिल गया सम्हाल ले।।

रामनारायण सोनी
१२.०२.२३

Monday, 6 February 2023

क्या देखते हो?


    🌓क्या देखते हो?🌖

रुपये के हैं दो पहलू 
एक पर उसकी कीमत है
दूसरे पर है अशोक स्तम्भ 
है जो सत्य और शौर्य का प्रतीक
पहले पर है खुद की ताकत
दूसरे पर है शासक की
फर्क ये है कि तुमने किसे देखा
फर्क है नजरिये का
फर्क है मान्यता का
फर्क है उपयोगिता का
फर्क है आपकी अन्तर्भावना का

देखता भीतर से है कोई
नागफनी और गुलाब के शूलों को
उन काटों की चुभन को
या सृजन के सौंदर्य को
उन पर महकती खबसूरत
खिलती कलियों और फूलों को
या तो देखता है वंशी के छिद्रों को
या सुनता है झरती रागिनी को

देखते तुम नहीं हो
देखता वो है जो भीतर बसता है 
अपनी कीमत पर मत अटको
सत्य और अपनी शक्ति को जानो
कौआ मान सरोवर में भी
केवल जल ही पीता है
पर हंस भी वहाँ है
जो केवल मोती ही चुगता है।

रामनारायण सोनी

Saturday, 4 February 2023

चीटियाँ हैं ये

चीटियाँ ये चीटियाँ
न दो इन्हें चुनौतियाँ

धर्म की देवियाँ हैं वे, 
साहस का प्रतिमान है वे, 
कर्म का विधान हैं वे, 
श्रम का संधान हैं वे। 
चलते चलते थकती नहीं है कभी, 
छाँव देख कर भी रुकती नहीं है कभी, 
पहाड़ के सामने भी झुकती नहीं है कभी।
चीटियाँ ये चीटियाँ
न दो इन्हें चुनौतियाँ

विश्वकर्मा ही हैं बसा इनमें 
देख लो बमीलों के वास्तु शिल्प को, 
विश्वधर्मा ही हैं ये 
देख लो उनके प्रशान्त कर्मक्षेत्र को, 
विश्वबन्धु हैं ये 
देख लो इनके सहअस्तित्व को, 
विश्वविमोहिनी हैं ये 
देख लो इनके रूप को स्वरूप को।
चीटियाँ ये चीटियाँ
न दो इन्हें चुनौतियाँ

संगठन की शक्ति ले , 
स्वामिनी की भक्ति ले , 
जीवनी की संतृप्ति ले, 
दायित्वों में अनुरक्ति ले 
अजेय हैं, प्रमेय है, विधेय है 
चीटियाँ ये चीटियाँ
न दो इन्हें चुनौतियाँ

मौसमों की मार हो, 
छुरों की तीखी धार हो, 
सिन्धु का सा क्षार हो, 
जीत हो या हार हो, 
मुँह में चाहे भार हो, 
शत्रु के प्रहार हों, 
कब डरी है चीटियाँ। 
चीटियाँ ये चीटियाँ
न दो इन्हें चुनौतियाँ

भित्तियों को लाँघ कर, 
तृणों के सेतु बाँध कर, 
दिशाएँ देख भाल कर, 
स्वप्न मन में ढाल कर, 
कदम कदम संभाल कर,
सभी जगह खंगाल कर,
बढ़ रही है चीटियाँ। 
चीटियाँ ये चीटियाँ
न दो इन्हें चुनौतियाँ

न इनका कोई जोड़ है
न जिन्दगी में मोड़ है
बसा है एक नगर यहाँ
जुड़ा है एक सफर यहाँ
रानी ही का राज्य है
परिवार अविभाज्य है
असत्य यहाँ त्याज्य है
तभी यहाँ सुराज्य है।
चीटियाँ ये चीटियाँ
न दो इन्हें चुनौतियाँ

अरे मनुज सुनो जरा
प्रबन्ध देख लो जरा
श्रेणियों के भेद है
कर्म के प्रभेद है
श्रमिक लगे हैं कार्य में
सैनिकों के फौज है
प्रचुर यहाँ आहार है
मौज का विहार है।
चीटियाँ ये चीटियाँ
न दो इन्हें चुनौतियाँ

रामनारायण सोनी
04.02.23




Monday, 16 January 2023

अपनी धरती, अपना घर

*अपनी धरती, अपना घर*

धरती पर देखने वालों ने
कल आसमान देखा
उड़ते चढ़ते कई रंग देखे
पेंच देखे, खेंच देखी
जमे देखे, उचके देखे
उम्मीदों की डोर पर
अरमान भी देखे, निश्वास भी देखे
कुछ ने बस देखा ही देखा
काटता कोई हो, कटता कोई हो
पर कई थे व्यर्थ की लूट में
इधर से उधर दौड़ते लोग।
उन माँजों का क्या
जो काटने आये गला
हिमालय के उस पार से
नीले गीले आसमान से
वे तैरती रंगीन परियाँ
एक दिन के सफर से
फिर लौट आईं अपने घर
याने फिर अपनी धरती पर

रामनारायण सोनी
१६.०१.२३

Monday, 9 January 2023

संग सदा तू रहता है

संग सदा तू रहता है

मैं प्रणाम करता हूँ इन हिम आच्छादित शिखरों को
वन्दन करता हूँ सूरज की अरुणिम इन किरणों को।
धरता अपना शीश मही पर इसका अर्चन करने को
अभिनन्दन पहुँचे मेरा उन कल कल करते झरनों को।।

कण कण इस भूतल का मेरे प्रभु का यह मन्दिर है
नभ में मण्डित चाँद सितारे मन्दिर के ये शिखर हैं।
तड़ित मजीरा मेघ गर्जना घनन घनन करता घन है
मन मयूर का नर्तन मेरा यह घर आँगन सुन्दर है।।

रोम रोम में बसी चेतना मुझमें तू ही नित रमता है
सूखे पत्तों के परदे में भीषण दावानल छिपता है।
जनम मरण के बीच हमारा जीवन कैसे चलता है
नहीं दीखता फिर भी तो तू संग सदा ही रहता है।।

रामनारायण सोनी
१०.०१.२३