दो दिये दो जिन्दगी
दीप मैं और दीप तुम भी फिर विषमता क्यों हुई है।
दो ध्रुवों सी जिन्दगी ये किस तरह हम ने छुई है।।
जब गढ़ा था तन हमारा, एक से थे तेल-बाती
एक सी ही ज्योति वह है जो हमें आकर जलाती।।
नाम भी तो एक ही है पर मुझे आला मिला है
पर तुझी से अप्सराएँ थालियाँ अपनी सजाती।।
दीप मैं और दीप तुम भी फिर विषमता क्यों हुई है।
दो ध्रुवों सी जिन्दगी ये किस तरह हम ने छुई है।।
तुम सजे फानूस में यह भाग्य है प्रियतम तुम्हारा
इन कुटीरों के तमस से लड़ रहा हूँ मैं बिचारा
सोच लो पर इक घड़ी ही जल रहे हैं एक से हम
गर्व को तुमने प्रकासा जिन्दगी का हूँ मैं सहारा
दीप मैं और दीप तुम भी फिर विषमता क्यों हुई है।
दो ध्रुवों सी जिन्दगी ये किस तरह हम ने छुई है।।
तुम छतों पर कैद हो कर रोशनी की हो गवाही
देखते तुम प्यालियों को भर रही कैसे सुराही
देखता मैं जिन्दगी यह लिख रही कैसी सचाई
क्रन्दनों के गाँव में जो लिख रहा बचपन रुबाई
दीप मैं और दीप तुम भी फिर विषमता क्यों हुई है।
दो ध्रुवों सी जिन्दगी ये किस तरह हम ने छुई है।।
टट्टरों से झाँकती है घूरती प्यासी निगाहें
मोल में बिकती जवानी ओट में लेकर कराहें
ये वही तो लोग हैं जो तेरी बस्ती से हैं आये
कान उनके ना सुनेंगे चीख और इनकी कराहें
दीप मैं और दीप तुम भी फिर विषमता क्यों हुई है।
दो ध्रुवों सी जिन्दगी ये किस तरह हम ने छुई है।।
जिन्दगी जब लौटती है मुट्ठियों में प्राण ले कर
भार तन का झेलती अवसाद का अहसास ले कर
गिट्टियों के संग टूटे हाड़ और फिर भाग इनके
कट रहा कैसा सफर हर ओर है बहपा कहर
दीप मैं और दीप तुम भी फिर विषमता क्यों हुई है।
दो ध्रुवों सी जिन्दगी ये किस तरह हम ने छुई है।।
रामनारायण सोनी
22.06.23
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