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Wednesday, 7 June 2023

नदी के बेचारे पत्थर

नदी के बिचारे पत्थर

नदी की तलहटी में 
पत्थर कुछ पड़े हैं 
तो कुछ गड़े हैं 
अभी अभी कुछ लोग आए 
और छाती पर पांव रखकर चले गए 
जंगलात की मिट्टी आई 
वह कर चली गई मुझ पर से गुजर कर
धार नदी की कब से 
उजाल रही है हमें
काले ही हैं अब कुछ और काले हो गए 
कुछ चट्टानें बिवाइयों की तरह 
अभी भी फटी पड़ी है 
ये गड़े-पड़े चिकने पत्थर हैं
कुछ वर्ष पहले तक जल मग्न रहते थे 
धारे नदी के सब पी लिए हैं आदमी ने 
जल रहा हूँ मैं और मेरी नदी का तन-बदन 
अब आग उगलते हुए 
इस सूरज की तपिश में 
अब एक और नया डर समा गया है मुझमें
कि कोई आदमी आवेगा कहीं से
मुझे उखाड़ कर ले जावेगा 
मशीनों में भरकर पीस देगा हमें
गिट्टी और चूरी के रूप में टूट जावेंगे
चुन दिये जावेंगे हम सभी
एक दिन आदमी की 
ऐश-ओ-आराम देने वाली दीवारों में

रामनारायण सोनी
१.६.२३


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