नदी के बिचारे पत्थर
नदी की तलहटी में
पत्थर कुछ पड़े हैं
तो कुछ गड़े हैं
अभी अभी कुछ लोग आए
और छाती पर पांव रखकर चले गए
जंगलात की मिट्टी आई
वह कर चली गई मुझ पर से गुजर कर
धार नदी की कब से
उजाल रही है हमें
काले ही हैं अब कुछ और काले हो गए
कुछ चट्टानें बिवाइयों की तरह
अभी भी फटी पड़ी है
ये गड़े-पड़े चिकने पत्थर हैं
कुछ वर्ष पहले तक जल मग्न रहते थे
धारे नदी के सब पी लिए हैं आदमी ने
जल रहा हूँ मैं और मेरी नदी का तन-बदन
अब आग उगलते हुए
इस सूरज की तपिश में
अब एक और नया डर समा गया है मुझमें
कि कोई आदमी आवेगा कहीं से
मुझे उखाड़ कर ले जावेगा
मशीनों में भरकर पीस देगा हमें
गिट्टी और चूरी के रूप में टूट जावेंगे
चुन दिये जावेंगे हम सभी
एक दिन आदमी की
ऐश-ओ-आराम देने वाली दीवारों में
रामनारायण सोनी
१.६.२३
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