कस्तूरी के मृग ही क्यूँ यूँ जंगल जंगल भाग रहे हैं।
पावन प्रेम पला जिन उर में वे सारी रातें जाग रहे हैं।।
अँधियारों से लड़ने वाले आले के सब दीप बुझे वे।
प्रात किरण से रो रो कर फिर से जीवन माँग रहे है।।
अधरों की पहचान बनी यह प्यास और डर का कंपन।
बहते नयनों को कोरों में ठहरेगा कैसे कोई अंजन।।
फूलों पर उस मृत तितली के अब तो केवल पंख बचे हैं।
प्रेम ग्रंथ में विरह व्यथा के किसने ये सोपान रचे हैं।।
हलकी सी चलती बयार से कॅंप जाती है शिखर पताका।
शबनम के आँसू पातों पर छोड़ गई वो ठिठुरी राका।।
पनघट, अमराई, चौपालों पर नहीं किसी ने ताका।
सुबक रहा बिरवा का आँगन बरसों से ना कोई झाँका।।
सूना नगर, हवेली सूनी कभी यहाँ वे रंगमहल थे।
सखियों की थी चुहलबाजियाँ चंचल चपल शगल थे।।
आगत के आगम में जिनके पलक पाँवड़े बिछ जाते थे।
उनमें से कुछ सुखद सलोने मीठे सपने बो जाते थे
जुड़ते नहीं रंग के मेले, आभासी दुनिया सारी है
रिश्तों के सम्बोधन तक में पश्चिम हम पर भारी है
पलकों पर ठहरे काजल में कैसा आ कर खार घुला है
सच के माथे पड़ी शिलाएँ झूँठ अनर्गल भारी है
रामनारायण सोनी
११.०६.२३
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