मन का संस्पर्श
जब भी मैंने तुम्हें देखा
केवल तन के पार ही देखा है
रूह की निगाह से!
रूह को देखा है!!
अक्षर और शब्द छुप जाते हैं कहीं
अर्थ छोड़ जाते हैं, मेरे मन में
मन के आकाश में कहता है मन ही
मन सुनता है मन ही मन
मन के संस्पर्श कितने गहरे हैं
भाव कोष में अभी भी गुदगुदाते हैं
वैसे के वैसे ही
रामनारायण सोनी
८.६.२३
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