क्या अधूरा हूँ मैं?
चाँद भी यह अधूरा है
कितनी ही बार...
कभी पूरब से उगता है
तो कभी पश्चिम से।
कम-स-कम महीने में
अट्ठाईस बार रहा है अधूरा,
फिर एक बार पूरा खाली
मौन, मुखर, विश्रान्त
और एक बार भरा भरा पूनों का
टकटकी लगाये देखता है
अपनी आँखों के दूधिया पानी में
पानी के रंगों में नहाते
देखता है मगन हो कर
कूँचियों से छूटे उन रंगों को
बना चुकी हैं जो
द्रुम-दल, नदियाँ, पहाड़ और झरन
सुनता है मौन मुखर ध्वनियों को
तुम भी सुन रहे हो ना!
रामनारायण सोनी
२९.०५.२३
Dance with the waves, move with the sea. Let the rhythm of the water set your soul free."
- Christy Ann Martine
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🌺🙏🌺🙏
तुम्हारी हमारी अधूरी कहानी
कहानी तो कहानी ही है
कहानी अधूरी ही होती है
पूरा होता है उपन्यास
कहानी! जीवन के बड़े से प्याज का
महज एक अलग हुआ छिलका है
वे लोग अक्सर पागल हैं
जो इस छिलके को
सुनहरे फ्रेम में मढ़ कर
दिल के भीतर टाँग लेते हैं
एक हिडन फाइल की तरह
पर ताज्जुब है
खुशबूदार, रुआँसी, रुलाती, हँसाती
ये अमर कहानियाँ
आदमी खुद से खुद कहता सुनता है
फिर ये...
जिस्म के साथ ही दफन होती है
रामनारायण सोनी
२९.०५.२३
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मेरे पास मलयगिरि है
पर यकायक मलयज पवन की
दिशाएँ कहीं और हो गई हैं,
मैं रात भर ढूँढता ही रहता हूँ
अपना एक सितारा!
इन आकाश गंगाओं में।
मेरे हृदय की गठरी में
सावन कई बँधे रखें हैं
डरता हूँ खोलते ही इसे
वे बह निकलेंगे आँखों के रास्ते
ऐसे में मुझे वो देख न ले।
रामनारायण सोनी
३०.०५.२३
यह जानते हुए भी कि...
कोई नहीं सुनेगा इन स्पन्दनों को
जाने क्यों ये शब्द हठी हो गये हैं
मना लेने को कोशिशें व्यर्थ हुई मेरी
फेंके गये पत्थरों से
आसमान में छेद नहीं होते
चिड़िया की चोंच में भरे पानी से
दावानल नहीं बुझा करती
जुगनू फिर जुगनू है
सूरज, सूरज ही रहेगा
१.६.२३
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नदी के बिचारे पत्थर
नदी की तलहटी में
पत्थर कुछ पड़े हैं
तो कुछ गड़े हैं
अभी भी कुछ लोग आए
और छाती पर पांव रखकर चले गए
जंगलात की मिट्टी आई
वह कर चली गई
धार नदी की कब से
उजाल रही है इन्हें
इनमें से काले कुछ और काले हो गए
कुछ चट्टानें बिवाइयों की तरह
अभी भी फटी पड़ी है
ये गड़े-पड़े चिकने पत्थर
कुछ वर्ष पहले तक जल मग्न रहते थे
धारे सब पी लिए हैं आदमी ने
जल रहा हूँ अब आग उगलते
इस सूरज की तपिश में
डरता हूँ कि कोई आवेगा
मुझे उखाड़ने मशीनों में भरकर ले जावेगा
गिट्टी और चूरी के रूप में टूट
एक दिन आदमी की
ऐश-ओ- आराम देने वाली दीवारों में
रामनारायण सोनी
१.६.२३
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यह मेरा इन्दौर है, यह राष्ट्र का सिरमौर है
जो कदम हमने चले पदचिह्न बनते वे गये।
गढ़ लिये प्रतिमान हमने कर्म से सब नित नये।।
युग प्रवर्तन के नये संकल्प भर कर मुट्ठियों में
स्वच्छता के ध्वज तले एकत्र जन गण सब हुए।।
यह मेरा इन्दौर है, यह राष्ट्र का सिरमौर है
शहर के बच्चे बड़े सहभागिता इसमें किये हैं
स्वच्छता के सूत्र सारे विश्व ने हम से लिये हैं
पञ्च तत्वों के प्रदूषण खत्म कैसे हों शहर से
जन-प्रशासन ने हमारे लक्ष्य हाथों में लिये हैं।।
यह मेरा इन्दौर है, यह राष्ट्र का सिरमौर है
कान्ह और यह सरस्वती स्वच्छ नीरा हो बहेगी
छत्रियाँ तट पर विरासत की कथाएँ खुद कहेंगी।
राजवाड़ा है हृदय में मराठा-शौर्य का इतिहास गाता
रंग की पिचकारियाँ उल्लास की गाथा कहेगी।।
थी कभी यह राजधानी सूत की और सूतमिल की
यह मेरा इन्दौर है, यह राष्ट्र का सिरमौर है
थी श्रमिक को बाँटती आजीविका परिवार भर की
कौन जाने इस नगर को क्यो नजर काली लगी
छिन गया वैभव श्रमों का छिन गई थी शान्ति जन की
यह मेरा इन्दौर है, यह राष्ट्र का सिरमौर है
पर शहर जीवट हमारा फिर नई अंगड़ाई ले ली
कृषि उपज और मण्डियों ने राह अपनी खोज डाली
फिर जगा व्यापार का इक नया अभिसार ले कर
शहर हो स्मार्ट सूरत फिजाँ मिल कर बदल डाली।
यह मेरा इन्दौर है, यह राष्ट्र का सिरमौर है
चल शिखर की श्रृंखलाएँ हर क्षेत्र में अपनी बनाएँ
सीखने यह विश्व सारा हैं ऑंगने इन्दौर आए
भोग छप्पन बाफलों संग आएँ और सब जीम जाएँ
मालवी की मालवा की मधुरता सब को चखाएँ।।
यह मेरा इन्दौर है, यह राष्ट्र का सिरमौर है
हम सभी मिल कर इसे फिर राष्ट्र का गौरव बनाएँ।।।
रामनारायण सोनी
२८.०५.२३
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