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Thursday, 25 May 2023

मैं ही तो हूँ

जाने क्या हुआ मुझे
समय की तेज बहती धार के संग
सहज रूप से बहते बहते
यकायक मैं स्थिर हो गया हूँ
गुलमोहर का सुर्ख रंग
रगों में लहू बन कर उतर गया है
पुतलियों पर काई अपनी हरीतिमा की
दरियाँ बिछा गईं है
पैरों तले उल्टी खड़ी मेरी परछाईं
देख देख हँसती है मुझ पर
कि तुम छोटे से गुलंगे थे, अब
सिर पर खड़ी सफेद घाँस तक आ गये हो
तन की मलमली चादर पर
उभर आई है सिलवटों की पगडण्डियाँ
हाथों की अंजुरी में पड़ी रेखाएँ
भविष्य के चरम बिन्दुओं के
निकट आ कर ठिठक सी गई हैं
कह रही है बस अतीत की
उलझी सुलझी कथाएँ हरबोलों की तरह
ठहरी ठहरी सी मेरी इस ठठरी में
मन चौकडियाँ भरता है
अट्टालिकाओं और झरोखों से
झाँक झाँक कर
रोता है, हँसता है, उदास होता है
पढ़ता है जीवन के सप्त सर्ग
देखो! जाने क्या हुआ मुझे
समय की तेज बहती धार के संग
सहज रूप से बहते बहते
यकायक मैं स्थिर हो गया हूँ
हाँ यह मैं ही हूँ!

रामनारायण सोनी
२६.०५.२३

ठीक ही तो है

तुमने खूब बाँटा
पर बँटे नहीं हो
क्योंकि बाँटना अभी और भी है
तुम घटे नहीं, न ही घटी चमक
क्योंकि तुम 
शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा हो
चाँदनी तुम्हीं से तो है!
तुम रुके नहीं
क्योंकि तुम सदा नीरा नदी हो
तुम्हारे किनारों पर
कई गाँव, कई शहर 
कई खेत, कई पंछी प्यासे हैं
तुमसे ही मल्लाहों के घर चूल्हे जलेंगे
तुम पिघले हो 
करुणा से भर कर
क्योंकि फूँस के उन टप्परों में
जिन्दगियाँ जोह रही थी बाट
पथराई निगाहों से तुम्हारी ही
बरस रहे हो
नेह के मेह ले कर
ऐसे ही बने रहना है तुम्हें
नित्य, निरन्तर, अविचल, अविकल

रामनारायण सोनी
२५.०५.२३ 

Tuesday, 23 May 2023

पत्थर में फूल खिलाएँ

पत्थर में फूल खिलाओ

पाषाणों से टकरा कर भी देखो निर्झर गाता है
जलती लू में खड़ा गुलमुहर कितना मुस्काता है
गल गल कर भी मेघ धरा की कैसे प्यास बुझाता है
स्वयं बिखर कर सुमन जगत को सौरभ दे जाता है

कंपते वीणा के तारों ने स्वर लहरों को जन्म दिया है
तप तप कर ही महा उदधि ने जल जीवन से धन्य किया है
पिघल रहा हिमगिरि पर पावन गंगा का वरदान दिया है
सृष्टि बचाने शिव-शंकर ने स्वयं हलाहल पान किया है

सृष्टि बनाने के पहले खुद ब्रह्मा तप में खूब तपे हैं
संस्कृति की गंगा लाने को कई भगीरथ यहाँ खपे हैं
पग पग पर अवरोध खड़े पर दरिया इनसे कहाँ रुके हैं
तूफानों की कमी नहीं पर मस्तूलों के सिर न झुके है

जीवन इतना सरल नहीं है झंझावात कई आवेंगे
दुर्गम पथ हैं शूल भरे हैं पग में छाले भर जावेंगे
निज श्रम और विश्वास स्वयं में सदा बनाये रखना
साहस के सिर मुकुट सजेगा बन्दी जन गुन गावेंगे

रामनारायण सोनी
२४.०५.२३