पत्थर में फूल खिलाओ
पाषाणों से टकरा कर भी देखो निर्झर गाता है
जलती लू में खड़ा गुलमुहर कितना मुस्काता है
गल गल कर भी मेघ धरा की कैसे प्यास बुझाता है
स्वयं बिखर कर सुमन जगत को सौरभ दे जाता है
कंपते वीणा के तारों ने स्वर लहरों को जन्म दिया है
तप तप कर ही महा उदधि ने जल जीवन से धन्य किया है
पिघल रहा हिमगिरि पर पावन गंगा का वरदान दिया है
सृष्टि बचाने शिव-शंकर ने स्वयं हलाहल पान किया है
सृष्टि बनाने के पहले खुद ब्रह्मा तप में खूब तपे हैं
संस्कृति की गंगा लाने को कई भगीरथ यहाँ खपे हैं
पग पग पर अवरोध खड़े पर दरिया इनसे कहाँ रुके हैं
तूफानों की कमी नहीं पर मस्तूलों के सिर न झुके है
जीवन इतना सरल नहीं है झंझावात कई आवेंगे
दुर्गम पथ हैं शूल भरे हैं पग में छाले भर जावेंगे
निज श्रम और विश्वास स्वयं में सदा बनाये रखना
साहस के सिर मुकुट सजेगा बन्दी जन गुन गावेंगे
रामनारायण सोनी
२४.०५.२३
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