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Friday, 17 March 2023

जिन्दगी सँवार लो

जिन्दगी सँवार लो

झरने की झझराती वो आवाज,
सूखे पत्तों की ये सरसराहट,
बादलों की वो गरज,
बूँदों की टिप-टिप
मिमियाते मेमने,
लगती होगी तुम्हें महज आवाजें
पर मुझे तो लगता है
जैसे प्रकृति इनके माध्यम से बोलती है।
अपने कान नहीं,
अपना ध्यान लगा कर सुनो जरा!
ये देवदार की ध्वजाएँ,
रोमावली हैं अल्पनाएँ
नदियाँ हैं शिराएँ,
अलकें हैं लताएँ
श्रृंग शिखर हैं परिपुष्ट भुजाएँ
धरा के धाम पर गगन का वितान है
जैस जगती के मण्डप में
साकार हो रहा सृष्टि का विधान है
प्रदर्श नहीं महादर्श है
प्रकृति का मनोरम आधान है
खुले नयनों से निहार लो जरा!
जीवन छोटा सा है
सँवार लो जरा

रामनारायण सोनी
१८.०३.२३

Thursday, 16 March 2023

महाविनाश की ओर

भूल जाते हैं कि हम ने प्राण खींचा है पवन से
तृप्ति ले कर चल रही हर बूँद धरती से गगन से
जान लो इक ग्रास भर का अन्न महिनों में उपजता
कई वर्षों तक है तपता तब कहीं यह वन सरसता

यह धरा है माँ हमारी, पालती है चर अचर को
खाद कृत्रिम डाल कर विष से भरा इसके उदर को
मौन धरती कँपकँपाती इस तरह इस क्रूर नर से
जो विकासों की कहानी गढ रहा विध्वंस ही से

जब न था विकसित जगत तब लोग सब ही स्वस्थ थे
स्वच्छ थे तब तत्व पाँचों, सदा नीरा सरित नद थे
स्वानुशासन में मनुज थे, प्रकृति लावण्यमय थी
बस्तियाँ, बन-बाग घर घर, हर गली वे मोदमय थी

बस अर्चना में अरु हवन में हम वरुण को पूजते हैं
वृक्ष के तन काट कर ही हम पुरन्दर पूजते हैं
विष उगलती चिमनियों से हम पवन को रौंदते हैं
प्यास का नगदीकरण जल बोतलें भर बेचते हैं

रोज बढ़ते ताप से तप यह हिमालय गल रहा है
विश्व बढ़ते तापक्रम की भट्टियों में जल रहा है
सूखती इन जल शिराओं में बची है बाढ़ केवल 
हो रहा विकसित जगत बस यह कथानक चल रहा है

सागरों से उठ चले घन हरितिमा को ढूँढ़ते हैं
वन कहाँ सब गुम हुए है प्रान्तरों से पूछते हैं
हम कहाँ बरसें कहाँ ठहरें कहाँ बैठें बता दो
पर्वतों के पत्थरों से पीट माथा खीजते हैं

अब न होगी गोधूली ही भूमि गोचर नहीं बची है
नोट छापू बाग उपवन, यह महा माया रची है
पंछियों के नीड़ बिखरे, अब गोरैया कुछ बची है
वनचरों के वंशजों पर तीर तलवारें खिंची है

रामनारायण सोनी


 






Wednesday, 15 March 2023

आत्मा का आह्लाद

आत्मा का आह्लाद

गूँगा जो बोलता है,
बहरा जो सुनता है,
बिना आँख के भी जो देखता है
वह भाषा है, बोली है, जुबान है
वह केवल 'मौन' है
वह सन्नाटा है, वह निस्पन्द है।
फुसफुसाहट, शोर, दहाड़, गर्जन
बहुत सुने होंगे, पर
सुनो इस मौन को
यह 'अनहद नाद' है
शरीर का नहीं, मन का नहीं
आत्मा का आह्लाद है

रामनारायण सोनी
13.03.23

Wednesday, 1 March 2023

तुम्हारी मौजूदगी

तुम्हारी मौजूदगी

तुम्हारी मौजूदगी
मेरे जीवन में
बसन्त की सुहानी सुबह में 
एक खिला हुआ गुलाब है
ग्रीष्म की चिलचिलाती धूप में
गुलमोहर का फूल है
वर्षा में झिरमिराती फुहार है
शरद ऋतु में कमलदल पर
ठहरी हुई शबनम है
हेमन्त में गुनगुनाती धूप है
शिशिर में रुई के फाहों जैसा
बरसता हिम है

तुम्हारी मौजूदगी
अस्ताचल को जाते सूर्य की
सुनहरी किरण है
अँधेरी रात में
टिमटिमाता तारा है
बरखा की बूँदों पर
चित्रलिखा इन्द्रधनुष है
और ठिठुरती शरद में
तृणों का नोक पर आसन्न
रजतमयी ओस कण है

तुम्हारी मौजूदगी
जलतरंग से उठती हुई
मधुमय रागिनी है
और इन से भी परे
तुम्हारी उपस्थिति
मेरे जीवन का गीत-संगीत है

रामनारायण सोनी
२.३.२३

नूतन नव विहान


नूतन नव-विहान

कल फिर एक नया दिवस होगा! 
उसी पुरातन सूर्य के साथ!
होगी वही सुरम्या मैदिनी
पर कुछ बीज नये होंगे। 
वह नवआशाओं के इन्द्रधनुष से! 
आप्लावित होगा फिर वही आकाश, 
दामिनियों के संग मेघों के तृप्त उदर में 
खारे समुद्र का मृदु आसुत जल होगा। 
धरती की वही प्यास होगी 
पर तृप्तियाँ चल कर स्वयं मूर्त होंगी। 
रात भर सुस्ताई हवाओं की 
सूक्ष्मतम कणिकाओं के गर्भ में 
प्रातः के कुसुमित पुष्पों की 
मधुसौरभ समाहित होगी। 
उज्ज्वल रश्मियों से द्रुमदलों के अणु-अणु में 
पमात्मा का सौंदर्य प्रतिबिम्बित होगा। 
दर्शन कर सकेंगे जन-जन इनका।

फिर एक नया दिन होगा! 
रजकणों में गोखुरों के आघात से 
उत्पन्न उर्मियाँ होंगी 
और वे रोलियाँ की स्वर्णाभा ले कर 
पश्चिम दिशा को आवृत्त कर डालेंगी। 
अपने अपने गृहों से निर्गमित हो कर 
पञ्चाग्नियाँ दिव्य हविष्य ले कर 
ऊर्ध्वाकाश में देवों को परितुष्ट करेंगी। 
ऐसे में प्राची के आलोकित अरुणाभ 
दिगन्त को निहारने पर विहंग-वरूथ 
कलरव किये बिना कैसे रह सकेंगे?

एक नया दिन फिर होगा! 
जरा व्याधियाँ सब विखंडित होंगी, 
अपने स्कन्धों में फिर पौरुष दौड़ेगा। 
उत्साह के अश्वों की हिनाहिनाहट से 
उपत्यकाएँ गूँज उठेंगी। 
प्रखर प्रज्ञा की स्रोतस्विनियाँ 
मनस्वियों के हृदयों से उत्सर्जित होंगी, 
जो अर्चियों के प्रकम्प से 
ब्रह्मनाद का उद्घोष करेंगी।

फिर से एक दिन नया होगा!
उदय होगा भास्कर भुवन में 
नूतन नवविहान ले कर 
उपासना जन्य सिद्धियों 
और कर्मजा समृद्धियों का 
दिशा दिशा में प्रतिवर्षण होगा। 
पुरुषार्थ की अग्नि शलाकाएँ प्रतिरोधों को
विदीर्ण कर देने वाली शक्तियाँ स्फूर्त होंगी।

फिर उस दिवस की नीरव निशा 
नीहारिकाओं अथवा धवल ज्योत्सना को 
ले कर उपस्थित होंगी 
जिसमें यह धरा फिर सद्यस्नात होगी।
फिर अहोरात्र में शिखर-शिखर 
उज्ज्वल कीर्ति पताकाएँ 
स्वच्छन्द आकाश को चूमेंगी। 
दिग दिगन्त सामगान के 
प्रगीतों से आह्लादित होंगे।
ऐसा ही है 
"मेरे खुले नयनों के स्वप्नों का संसार"

रामनारायण सोनी
१.३.२३