नूतन नव-विहान
कल फिर एक नया दिवस होगा!
उसी पुरातन सूर्य के साथ!
होगी वही सुरम्या मैदिनी
पर कुछ बीज नये होंगे।
वह नवआशाओं के इन्द्रधनुष से!
आप्लावित होगा फिर वही आकाश,
दामिनियों के संग मेघों के तृप्त उदर में
खारे समुद्र का मृदु आसुत जल होगा।
धरती की वही प्यास होगी
पर तृप्तियाँ चल कर स्वयं मूर्त होंगी।
रात भर सुस्ताई हवाओं की
सूक्ष्मतम कणिकाओं के गर्भ में
प्रातः के कुसुमित पुष्पों की
मधुसौरभ समाहित होगी।
उज्ज्वल रश्मियों से द्रुमदलों के अणु-अणु में
पमात्मा का सौंदर्य प्रतिबिम्बित होगा।
दर्शन कर सकेंगे जन-जन इनका।
फिर एक नया दिन होगा!
रजकणों में गोखुरों के आघात से
उत्पन्न उर्मियाँ होंगी
और वे रोलियाँ की स्वर्णाभा ले कर
पश्चिम दिशा को आवृत्त कर डालेंगी।
अपने अपने गृहों से निर्गमित हो कर
पञ्चाग्नियाँ दिव्य हविष्य ले कर
ऊर्ध्वाकाश में देवों को परितुष्ट करेंगी।
ऐसे में प्राची के आलोकित अरुणाभ
दिगन्त को निहारने पर विहंग-वरूथ
कलरव किये बिना कैसे रह सकेंगे?
एक नया दिन फिर होगा!
जरा व्याधियाँ सब विखंडित होंगी,
अपने स्कन्धों में फिर पौरुष दौड़ेगा।
उत्साह के अश्वों की हिनाहिनाहट से
उपत्यकाएँ गूँज उठेंगी।
प्रखर प्रज्ञा की स्रोतस्विनियाँ
मनस्वियों के हृदयों से उत्सर्जित होंगी,
जो अर्चियों के प्रकम्प से
ब्रह्मनाद का उद्घोष करेंगी।
फिर से एक दिन नया होगा!
उदय होगा भास्कर भुवन में
नूतन नवविहान ले कर
उपासना जन्य सिद्धियों
और कर्मजा समृद्धियों का
दिशा दिशा में प्रतिवर्षण होगा।
पुरुषार्थ की अग्नि शलाकाएँ प्रतिरोधों को
विदीर्ण कर देने वाली शक्तियाँ स्फूर्त होंगी।
फिर उस दिवस की नीरव निशा
नीहारिकाओं अथवा धवल ज्योत्सना को
ले कर उपस्थित होंगी
जिसमें यह धरा फिर सद्यस्नात होगी।
फिर अहोरात्र में शिखर-शिखर
उज्ज्वल कीर्ति पताकाएँ
स्वच्छन्द आकाश को चूमेंगी।
दिग दिगन्त सामगान के
प्रगीतों से आह्लादित होंगे।
ऐसा ही है
"मेरे खुले नयनों के स्वप्नों का संसार"
रामनारायण सोनी
१.३.२३