भूल जाते हैं कि हम ने प्राण खींचा है पवन से
तृप्ति ले कर चल रही हर बूँद धरती से गगन से
जान लो इक ग्रास भर का अन्न महिनों में उपजता
कई वर्षों तक है तपता तब कहीं यह वन सरसता
यह धरा है माँ हमारी, पालती है चर अचर को
खाद कृत्रिम डाल कर विष से भरा इसके उदर को
मौन धरती कँपकँपाती इस तरह इस क्रूर नर से
जो विकासों की कहानी गढ रहा विध्वंस ही से
जब न था विकसित जगत तब लोग सब ही स्वस्थ थे
स्वच्छ थे तब तत्व पाँचों, सदा नीरा सरित नद थे
स्वानुशासन में मनुज थे, प्रकृति लावण्यमय थी
बस्तियाँ, बन-बाग घर घर, हर गली वे मोदमय थी
बस अर्चना में अरु हवन में हम वरुण को पूजते हैं
वृक्ष के तन काट कर ही हम पुरन्दर पूजते हैं
विष उगलती चिमनियों से हम पवन को रौंदते हैं
प्यास का नगदीकरण जल बोतलें भर बेचते हैं
रोज बढ़ते ताप से तप यह हिमालय गल रहा है
विश्व बढ़ते तापक्रम की भट्टियों में जल रहा है
सूखती इन जल शिराओं में बची है बाढ़ केवल
हो रहा विकसित जगत बस यह कथानक चल रहा है
सागरों से उठ चले घन हरितिमा को ढूँढ़ते हैं
वन कहाँ सब गुम हुए है प्रान्तरों से पूछते हैं
हम कहाँ बरसें कहाँ ठहरें कहाँ बैठें बता दो
पर्वतों के पत्थरों से पीट माथा खीजते हैं
अब न होगी गोधूली ही भूमि गोचर नहीं बची है
नोट छापू बाग उपवन, यह महा माया रची है
पंछियों के नीड़ बिखरे, अब गोरैया कुछ बची है
वनचरों के वंशजों पर तीर तलवारें खिंची है
रामनारायण सोनी
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