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Wednesday, 22 June 2022

बावरा मन

यह चाँद है?
या उसका कंगन
ये टूटते हुए तारे हैं?
या जुल्फों से छितरी हुई 
बूँदों की बिखरन
यह राजपथ है?
या बस राह की भटकन
इस रात की ये खामोशी 
कह रही है...
कितना बावरा हूँ मैं
और मेरा यह मन

     रामनारायण सोनी

अनगढ़ यह नगीना

मेरे पास
लमहों का एक ज्वेलरी बॉक्स है
उसमें कुछ ताज के जड़ाऊ नगीने हैं
कुछ लाल, हरे, नीले, पीले
जिन्हें मैं कभी नहीं पहनता
पर एक नायाब नगीना
रखा है एक गुप्त खाने में
अनतराशा ही रह गया वह,
निकाल कर जब रखता हूँ
यादों की अकेली अँधेरी कोठरी में
एक फफ़कता उजास फैल जाता है
बाहर भी और मेरे ठेठ भीतर तक भी
मैं उसे चूमता हूँ बार बार
बाकी सब नागीनों ने तो 
देखी है मेरे चेहरे की चमक दमक
पर इस अलहदा अनगढ़ से नगीने ने
देखे हैं कई बार मेरे नयनों के
खारे उफनते, बहते आँसुओं के सागर को।
अब कोई आए कहीं से और
ले जावे छीन कर सारा मालोअसबाब
बस छोड़ कर केवल
एक अदद इस अनतराशे नगीने को

रामनारायण सोनी
२१.०६.२२

Friday, 3 June 2022

झरना

झरना झरझराता है

चाहे जितना बिखर जाए पानी उसका
बिखर बिखर धुआँ धुआँ हो जाए भले ही
परन्तु झरना जो एक मौज है
झरना जो एक उल्लास है
झरते ही जाना है इसे,
झरते ही जाना है इसे
और सवार हो जाना है
हवा के महीन परों पर
उसकी धवल धार
है कण कण का विस्तार
गिरते जाना है ऊँचाइयों से..
सख्त चट्टानों की सख्त छातियों पर
झर-झर झरझराता नाद ही
गिर कर जब उठ खड़ा होगा
अपनी वही पुरानी धार ले कर
फेनिल ही काया है इसकी
मस्ती में फिर से बहेगा
पतन की यादों को झाड़ कर
टूट कर बिखरना,
बिखर कर फिर जुड़ना
साहस और सामर्थ्य है इसका
वन प्रान्तर में उसकी गूँज होंगी मौजूद
झरना इरझराता हो
जैसे अब भी
गाता है, आता है
जीवन का मधुमय संगीत लेकर

रामनारायण सोनी
१३.०५.२२

Wednesday, 1 June 2022

अधूरी कहानी वैताल सी


.कुछ कहानियाँ!!! 
अधूरी ही होती!
निष्ठुरता भी इतनी कि
वे पूरी नहीं होती कभी भी...
लेकिन वे अनवरत रेंगती रहती है 
धमनियों, शिराओं और मगज में
पिघले सीसे की तरह
सफ़र इनका कहीं से शुरू हुआ
और जाने क्यों, न आधा न पूरा हुआ
इनमें चल रहे रास्तों का क्या ठिकाना? 
मुड़ जाते हैं अचानक 
कभी भी, कहीं भी, कैसे भी
जंगली हवाओं की तरह
मैं देखता रहता हूँ लाचार हो कर
अपनी ही कहानियों को
निरीह सूत्रधार की तरह
चलता हूँ ढोता हुआ इन्हें 
अपनी ही पीठ पर
वैताल की तरह

रामनारायण सोनी
१.६.२२