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Friday, 30 September 2022

तुम ही तो थी

तुम ही तो थी

मुझे वह तारीख तो याद नहीं
पर समय के परिन्दे का वह सफर
वह हाथों पर टिकी ठोड़ी
चेहरे पर खिलखिलाता तबस्सुम
नीली झील से झाँकते नयन
ध्वजा से लहराते कुटिल कुन्तल
काँपते से वे अधर 
कुछ कहने को आतुर, लेकिन..
हुनर नजरों से ही कहने का
सुना था, महसूस किया था
मेरी ठगी, ठहरी, सम्मोहित नजरों ने ही
क्या वह तुम नहीं थी?

रामनारायण सोनी
१.१०.२२

Saturday, 24 September 2022

बटुआ

एक ऐयारी का !
जादुई बटुआ है मेरे पास
बहुत सारे पुड़ हैं उसमें
खोल कर दिखाता हूँ
एक तिलिस्म तुम्हें
रख रख्खे हैं इसमें मैंने
तरह तरह के पल
खूबसूरत पल, आनन्द के पल,
जिन्दगी के अलग अलग मोड़ के पल,
मिलन के बिछड़ने के पल।
कुछ पल ऐसे भी हैं
जिनका साया आज तक भी
पीछा नहीं छोड़ रहे
और वे जिन्दगी के सफेद कागजों
को ढँकने लगता है।

रामनारायण सोनी
२५.०९.२२

Thursday, 22 September 2022

दूधिया हो लें

दूर! बहुत दूर!

बहुत बहुत दूर हो तुम!!
लगता है चाँद के पास हो तुम!!
नहीं नहीं! तुम्हारे पास एक वो चाँद है
और एक तुम्हारा, यानी मेरा अपना भी
तुम से अमीर हूँ मैं, मेरी किस्मत है कि
दो दो चाँद है मेरे पास
अब रोशनी भी है और शबाब भी
सनम भी और माहताब भी
रुकोगी तुम तो रुक जाएँगे चाँद भी
यों ही रोके रहो रात को
चलो दूधिया हो लें हम
बहुत सारे थे, वे तारे, देखनहारे
चाँद ने उन्हें छुपा दिया है आकाश में
चलो कोई खूबसूरत सा गीत गा लें हम
ये रात, ये चाँदनी, ये दिलकश नज़ारा!
ये समा मिलेगा फिर न दोबारा!!!

रामनारायण सोनी
२२.०९.२२

Tuesday, 20 September 2022

सिलवटों के पार से

सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ

दर्द ने लिक्खे कसैले घाव आओ मैं दिखाऊँ
जिस लड़कपन को कभी काँधे बिठाया था
भूख खा कर खुद उसे माखन खिलाया था
खोल गठरी से व्यथा की यह कथा तुमको बताऊँ
सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ
   सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ

इक सलोना स्वप्न हमने प्यार से ऐसा संजोया
देव पूजे, भात , धोक दे कर सिर नवाँया
तब कहीं जा कर हमारी गोद में शिशु एक पाया
सो सके वह नींद भर इसलिये खुद को जगाया
खर्च कर अपनी जवानी पालने बचपन झुलाया
उम्र की बीती कहानी आओ तुमको मैं सुनाऊँ
   सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ

स्वप्न अपने रहन रख कर सब खुशी उसकी खरीदी
पाँव के छाले छुपा कर जूतियाँ ला कर उसे दी
था सजा आँगन हमारा गूँजती किलकारियों से
खर्च डाले जो जमा थे  ढूँढ कर अल्मारियों से
हार थक कर लौटते थे दिन दिहाड़ी के कड़े थे
उस थकन की पीर को मैं अब तुम्हें कैसे बताऊँ
   सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ

फिर समय नें बदल करवट तीव्र तेवर थे दिखाए
थे जिन्दगी की ओढ़नी में पेच टाटों के लगाए
वे उँगलियाँ, हाथ, माथा चूमते थे लाड़ से हम
हाय यह हत भाग्य कैसा हो गए कितने पराए
झुर्रियों से ढूँढ कर मुस्कान मुह पर कैसे लाएँ
छूटते दर और टूटते घर की कथा कैसे सुनाऊँ
   सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ

देखता हूँ दृश्य, आश्रम द्वार पर नजरें गड़ी थी
कीमती उस कार से काय कृश उतरे खड़ी थी
जर्जराती जिल्द में हो कामायनी जैसे मढ़ी थी
जिन्दगी बस खार लेकर आँसुओं से वह झड़ी थी
तुम इसे सन्यास का बस नाम दे कर चुप रहोगे
उस हृदय की मर्मभेदी चीख मैं तुम को सुनाऊँ
   सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ

रामनारायण सोनी
२०.०९.२२

तिनके सा मैं

तिनके सा मैं और 
समुन्दर सा इश्क
डूबने की चाहत 
और डूबे ही रहना 
है इश्क! इश्क!! इश्क!!!

रामनारायण सोनी
२०.०९.२२

सारस से पाँखी हम

बातों ही बातों में तुमने-

कितने ही पृष्ठ पलट डाले
चमक उठे वातायन
विविध रंग वाले
लिक्खी थी मधुर मधुर
वे शहदीली रातें
सारस से पंख खोलकर
उड़ने की बातें
यादों के अम्बर में
फगुनी टेसू क्या दहका है ?
मौसम का पोर पोर महका है

रामनारायण सोनी
२०.०९.२२

Monday, 19 September 2022

मेरा उपवन बुला रहा

ओ नभ के उड़ते पांखी
मेरा उपवन बुला रहा है 
थोड़ा पंखों को दो विराम
मेरा उपवन बुला रहा है

तुम पहुँचोगे जगह जहाँ पे
प्यारा गाँव हुआ करता था
उसे शहर ने निगल लिया है
एक चौपाल हुआ करता था
  ओ नभ के उड़ते पांखी
  मेरा उपवन बुला रहा है 

आम, नीम, बड, पीपल की
ठण्डी छाँव घनी रहती थी
उनके शव तक नही बचे है
अब सन्नाटा पसर रहा है
  ओ नभ के उड़ते पांखी
  मेरा उपवन बुला रहा है 

सुखद नीड़ था जहाँ बनाया
तिनके तक अब नहीं मिलेंगे
वे मधुर गान तोता मैना के
सुनने को ना कहीं मिलेंगे
  ओ नभ के उड़ते पांखी
  मेरा उपवन बुला रहा है 

ताल तलैया सूख चुके हैं
प्याऊ बस इतिहास हुई है
पथ में छाँव बिछाता बादल
तक भी आना छोड़ रहा है
   ओ नभ के उड़ते पांखी
   मेरा उपवन बुला रहा है 

दूर देश के प्रिय प्रवासी
मीलों तुम उड़कर आए हो
मालव की माटी और पानी
अब कंकरीट वन उगा रहा है 
   ओ नभ के उड़ते पांखी
   मेरा उपवन बुला रहा है 

कोयल और पपीहे की तो
आवाजें सब बिदा हुई है
नगर गाँव में हवा प्रदूषित
बोतल में जल बिक रहा है
   ओ नभ के उड़ते पांखी
   मेरा उपवन बुला रहा है 

    रामनारायण सोनी
     ११.०८.२२

सेवा का हवन कुण्ड

सेवा का हो हवन कुण्ड और हम समिधा हो जाएँ
अगन बने फिर लगन हमारी सर्व समर्पित हो जाए।
तन-मन तप कर संकल्पों का मंगल सूत्र बँधाएँ
शुद्ध भाव की अरणी ले कर पावन ज्योति जगाएँ।।

इस समष्टि का हर कण कण सेवा में आहुतियाँ देता
नदियाँ बहती सूरज तपता पवन प्राण ले क्यों बहता।
सागर अपना पानी दे कर इस जग में जीवन धरता
अम्बर अपने महा उदर में सृष्टि अनेकों क्यों भरता।।

इनमें से कोई भी अपना मूल्य कर्म का नहीं माँगता
इस निर्बाध क्रिया में वह अपना नियम नहीं लाँघता।
ये सब सेवा का प्रकल्प ले आदिकाल से लगे हुए हैं
फिर भी रहते मौन सदा ये ना कोई उपदेश बाँटता।।

सेवा के इस महायज्ञ से महामारियाँ भी हारी हैं
मानवता की प्रतिरक्षा में सेवा ही सब से भारी है
हर सेवक नर में नारायण आ कर स्वयं उतरते हैं
इसीलिये कष्टों के पल में भी तो यह सेवा जारी है

आओ प्रिय इस महायज्ञ में आहुतियाँ अपनी डालें
हो वेद ऋचाओं का उच्चारण तब हम हाथ स्रुवा लें।
अपनी धरा गगन अपना है मन में सेवा दीप जला लें
पीड़ित मानवता की सेवा में तन मन प्राण लगा लें।।

रामनारायण सोनी
१९.०९.२२

शूल और फूल

बहुत प्रयास किये तुम ने भी मैंने भी

न यादें मिटी, न पीछे छूटी रेखाएँ
न वे पल, न ही वे वाकिये
आँगन के बिरवे की टहनियों से झड़ते रहे
बहारें, फूल पत्तियाँ और खुशबू
पर उन गुदाज़ यादों के शूल
चख लेते हैं लहू के स्वाद को
कितना सुकून है इस दर्द और चुभन में
मैं उतना ही प्यार करता हूँ
इन निर्मम शूलों से
जितना करता रहा हूँ
फूलों से, पत्तों से, पंखुड़ियों से

रामनारायण सोनी
१७.०९ .२२

महसूस किया बस तूने

सुनना एक बात है
समझना एक और बात है
पर महसूस करना
सब से अलग और सबसे खास बात है
मुझे सुना भी है, समझा भी है
जमाने भर के लोगों ने
सिर्फ वो है जो महसूस करता है मुझे

रामनारायण सोनी
०९.०९.२२


Saturday, 17 September 2022

सृष्टि है यह ईशमय

चाँदनी कब थी अलग जो चाँद में नभ में घुली
रोशनी को सूर्य से ना तुम अलग देखा करो।
इस सनातन सत्य को तुम जान लो पहचान लो 
इस जगत की अस्मिता को ईशमय देखा करो।।

सृष्टि का साकार दर्शन उस परम का दर्श समझो
जो पवन छू कर गई यह है मृदुल स्पर्श उस का।
भूख भी उसने बनाई अन्न भी उसने दिया है
वह पचाता जठर में खेल यह सब है उसी का।।

पाँच भूतों, पाँच तत्वों, पाँच प्राणों से बनाया
इन प्रपञ्चों से बुना है यह महा जंजाल समझो।
इन्द्रियों के पंचकों से इस कर्म का साधन लगाया
बुद्धि, मन और चित्त जोड़े यह तेरे भीतर सजाया।।

ज्योतियों की है परम ज्योति जो हमें ना दीख पाती 
सूक्ष्मतम प्रज्ञा हृदय में ज्ञान का दीपक जलाती।
चेतना बन प्रभु हमारे सर्व में बसता निरन्तर
वह चलाता,वह जिलाता न दृष्टि अपनी देख पाती।।

चेतना भर प्राण में, इन इन्द्रियों में और तन में
चर अचर में व्यापता है और है हर सूक्ष्म कण में।
दीखते न कर कहीं पर सृष्टि सारी रच रहा है
रंच भर न है कमी उसके करम में और सृजन में।। 

प्यास भी वह दे रहा है फिर बुझाने का जतन 
भूख का अध्यास दे कर दे रहा उसका शमन।
रात का दे कर तमस दी रोशनी भी सूर्य की
जाग दे कर नींद का कैसा निराला है प्रबन्धन।।

सत्य है केवल वही जगत मिथ्या का मिथक
सृष्टि के पहले वही था सृष्टि का केवल सृजक।
जो प्रलय के बाद भी होगा सिर्फ वह ब्रह्म ही
सृष्टिस्थितिविनाशानां है कार्य कारण सब वही।।

वचन अगोचर, दृष्टि अनामय, सृष्टि नियन्ता वो ही
अशरण शरण, भव-भय भंजक परमोद्धारक वो ही।
उसमें सब है सब में वह है होता वह, कर्ता वो ही
सब में उसको देखे जो नर ईश कृपा पाता वो ही ॥

रामनारायण सोनी
१८.०९.२२

नदिया बहती है क्यों


बहती हुई जीवन की यह नदी !
बहना उसका अकेला नहीं है
हरेक पल बहता है !
जल कण की तरह
रास्ते का हर घाट !
भाग्य ले कर खड़ा है..
तमाम स्वार्थ की कश्तियाँ खड़ी हैं
लंगर डाले इस नदी की छाती पर
अपने लिये जल है जीवन इस का
दुनिया के लिये जीवन है जल इस का
बहना है कर्म इसका
बहते रहना ही है धर्म इसका
उद्भव से अवसान तक

रामनारायण सोनी
१७.०९.२२

ज़िंदगी ज़िंदगी

जिन्दगी सिर्फ साढ़े तीन हर्फों की है

कब से लिखे जा रहा हूँ इस को
जिसको ज यानी जन्म से शुरू किया था
बचपन इस में इ की मात्रा लगाने में
याने इल्म पाने में खर्च हो गई
कई अच्छे मकाम जो थे रास्ते में
कुछ बरस इसके माथे बिंदी चढ़ाने में गुजरे
और मैं देख ता ही रह गया
जिदगी की दौड़ती रेल गाड़ी में बैठा रहा मैं
बाहर गाँव, नगर, नदी, पहाड़ और
द-से शुरू होने वाली यह दुनिया
सब के सब दौड़ते दिखाई दिये
ग से गुजरते गए कई मोड़
और जुड़ते गए कई जोड़
हॉफती रही यह फिर भी दौड़ती ही गई
द्वन्द्वों के बीच कौंधती रही कहीं कहीं
हास्य की निसर्ग रेखाएँ 
तमस भरे बादलों में बिजलियों की तरह
भाग्य के परिताप से पीछे रह गए
वे रिश्ते, वे लोग, वे राहें, वे पगडण्डियाँ
जानती है जिन्दगी की नदी कि
पास ही कहीं है समुन्दर का वो मुहाना
जिसे छोर कह लो, मृत्यु कह लो
चिर विछोह कह लो
संज्ञा और नाम इस के कई है
हर वर्तमान के काल के भाल पर
अतीत की मुहर जरूर लगती है
जिंदगी प्रमेय नहीं हो सकती
इसमें दो और दो हमेशा चार नहीं होते...

रामनारायण सोनी
१७.०९.२२

शूल और फूल

बहुत प्रयास किये तुम ने भी मैंने भी

न यादें मिटी, न पीछे छूटी रेखाएँ
न वे पल, न ही वे वाकिये
आँगन के बिरवे की टहनियों से झड़ते रहे
बहारें, फूल पत्तियाँ और खुशबू
पर उन गुदाज़ यादों के शूल
चख लेते हैं लहू के स्वाद को
कितना सुकून है इस दर्द और चुभन में
मैं उतना ही प्यार करता हूँ
इन निर्मम शूलों से
जितना करता रहा हूँ
फूलों से, पत्तों से, पंखुड़ियों से

रामनारायण सोनी
१७.०९ .२२

Tuesday, 13 September 2022

परिपूर्ण ब्रह्म


क्या मैं 
एक देह रूपी मंदिर हूँ ?
जिस में पवित्र आत्मा निवास करती है?
क्या मैं आत्मा हूँ ?
जो इस देह रूपी मंदिर में निवास करती है?
क्या मैं सम्पूर्ण हूँ?
जिसमें यह सम्पूर्ण ही निवास करता है?
हाँ! मैं सर्व व्यापक, परिपूर्ण ब्रह्म ही हूँ !!
अयमात्मा ब्रह्म

रामनारायण सोनी
१४.०९ .२२

Monday, 12 September 2022

मृदुल स्पर्श

समझ नहीं पा रहा हूँ मैं 
यह मेरी स्मृति है? 
इतिहास का स्पर्श है? 
ममता की ओढ़नी है? 
पुलक प्रेम का आकाश है? 
या उन पलों का वर्तमान में साकार हो जाना है? 
अचानक मेरे हाथ पैर छोटे छोटे हो गये हैं, 
नन्हीं सी मेरी उँगली को 
अचानक पकड़ कर मुझे खींच लिया है, 
फिर अपने मृदुल करों से उठा कर 
मुझे अपने हृदय से चिपटा लिया है
और! 
अचानक से माँ तुम कहाँ चली गई?

रामनारायण सोनी
१२.०९.२२

कितना फर्क है इन में

कितना फर्क है 

मिट्टी सुराही की, मिट्टी चिलम की
आसमान चाँद-तारों का, 
आसमान कड़कती बिजलियो का
जमीन चमन की, जमीन दफन की
कभी एक बारात गुजरती है सड़क से
हो जाता है आमना-सामना...
उसका किसी जनाजे से 
जिसने बनाया रंग सफेद...
उसी ने काला भी
क्यों बनाया एक परिन्दा...
खुले आसमान के लिए...
तो फिर क्यों बनाया ?
दूसरा पिंजरे के लिये

रामनारायण सोनी
१०.०९.२२

Tuesday, 6 September 2022

आँसू डाकिया भी है

एक दिन
मैंने पूछ ही लिया आँसू से
परिचय और कर्म उसका
वह कहने लगा 
सुनो तुम! और तुम्हारे ये लोग !
मैं खामोश हो कर भी बोलता हूँ
मेरी यात्रा शुरू होती है हृदय के सागर से
सागर जो बस खारा है
सागर जब तपता है तो मीठा हो जाता है
सागर जब उफनता है तो सैलाब आते हैं
सागर को जब मन्द पवन छूती है
तो मैं ले कर आता हूँ उसकी खुशबू
मैं पलकों पर ठहरता हूँ तो शबनम हो जाता हूँ
बहते बहते जब बहुत थक जाता हूँ 
तो सूख जाता हूँ अधबीच में ही
मैं निकलता हूँ सदा गर्म हो कर ही
मैं फैल जाता हूँ नयनों में जब जब
उनकी खामोशियाँ अनुवाद करने लगती हैं 
हृदय के उद्वेलनों का, भावों का, तरंगों का
मैं आता ही हूँ कुछ न कुछ कहने को
लाता हूँ चिट्ठियाँ डाकिये की तरह
मैं नारद भी हूँ और उनकी करताल हूँ
जब प्रिय और प्रियतम मिलते हैं
उनकी खामोशियों में भी 
भावों का अनुवाद करता हूँ मैं
मुखौटेबाजों से बहुत परेशान रहा हूँ
घुटता रहता हूँ भीतर ही भीतर 
परन्तु मैं श्रेष्ठतम तब हूँ
जब ईश्वर के अनुराग में बहता हूँ
कभी भक्तों के गालों पर ही सूख जाता हूँ 
तो कभी प्रभु के चरणों में चढ़ जाता हूँ
वहाँ विदेह हो कर मैं मुक्त हो जाता हूँ

रामनारायण सोनी
७.०९.२२

यमुना एक खोई नदी गंगा में

नहीं भूल पाने का दर्द
नहीं मिल पाने के दर्द से बड़ा है
रेंगते हुए त्रिकाल के सरीसृप 
जीवन की घाटियों और कन्दराओं से 
निकल निकल कर अट्टहास करते हैं 
एक अतीत निर्मम पहाड़ के नीचे दब गया
यह वर्तमान काले आकाश की ओर देखता है
जहाँ न चाँद-सूरज है, न तारे न जुगनू ही हैं
एक भविष्य के पृष्ठ में वह अभागा अध्याय 
लिखा ही नहीं जा सकता 
क्योंकि ऐसी कलम बनी ही नहीं
गर कलम बनी होती तो स्याही नहीं बनी
और स्याही गर कोई होती भी...
तो क्या होता? तो क्या ये लोग?
क्या ये दुनिया, ये दस्तूर, ये परम्पराएँ लिखने देती ? 
कोई कहानी चाहे कितनी भी जीवन्त हो, 
कहानी जो छटपटाती है
अनन्त प्यार का सागर ले कर भी
कलम की टिप पर खड़ी रह जाती है
कभी हो नहीं सकती है वह कोई उपन्यास
बहुत अजीब सी कहानी है यह 
जो न रुकती है, न बकती है, 
जो न तो ठहरी है, न ही चलती है
कहता है केवल सूत्रधार, 
अरे! दर्शक है तो केवल वही है
सुनता भी तो केवल वही है 
दो अदद मूक पात्रों को ले कर
नेपथ्य में लिखे-अनलिखे संवाद 
आत्माएँ कण्ठस्थ सुनाती थी जिसे
वे वाणी विहीन हैं, चुपचाप हैं, निष्पन्द हैं 
ये बड़ी बड़ी दीवारें, मेहराबें, कंगूरे, अट्टालिकाएँ
इनमें रौब-दाब हैं, दीवाने आम है, दीवाने खास है
पर इसमें दो ध्रुवों पर दो अन्तःपुर हैं
एक राजा का, और एक रानी का
उस पार, इस पार
दो अलग अलग संसार 
दो नदी, दो दो तट, दो धार
उद्गम से मुहाने तक बड़ा सारा विस्तार
हिमालय से गंगासागर तक का संचार
बिना किसी पावन प्रयाग के
गंगोत्री से सागर तक खिंची महीन रेखा
भगीरथ इसे नीहारिकाओं से निचोड़ कर
प्रेम की इस धरा पर छोड़ कर 
अदृश्य हो गया कहीं 
कान्हा की कालिन्दी अब 
नहीं पहुँच पायेगी कभी भी सागर तक
गंगा के तेज प्रवाह में बह गई यमुना
बह गया यमुना का नाम, पानी और अस्मिता भी बिना मिले बही जा रही है 
ये नदियाँ बहती है क्यों? 
एक पावन अदृष्य नदी सरस्वती 
ऐसे ही अचरज से देखती है इन्हें
सागर नहीं जान सकेगा कभी भी 
बिना देह की, बिना नाम की, 
बिना पहिचान की उस यमुना को 
जानेगा सागर केवल उस गंगा को
पूछ कर देखे कोई कपिल मुनि से
कि ये गंगा यों बहती है क्यों?

रामनारायण सोनी
६.९ .२२

Sunday, 4 September 2022

खुदी में खुद की तलाश

आओ सभी आईना पहन लें

मुझे मैं न दिखता मेरी आँख से ही
न तू देख पाया तेरी ही खुदी को 
है सारा नगर देखता दूसरों को 
किसी ने न देखा खुद में खुदी को।

कैसा है तू और है कैसा जमाना
उमर अपनी है, अब तक खपाई
बुरा ही बुरा सब है मेरे अलावा
सब की अकल में यही बात आई।

अब हर गले में, टँगा आईना हो 
नकली मुखौटे चलो सब उतारें
देखूँ मैं मुझको तेरे आईने में
जानें स्वयं को, स्वयं को पुकारें।

है बाहर जगत, एक भीतर जगत
ये देखी जमी, लोग देखे हजारों
कभी सामने, कभी मन में हमारे
जगे अपनी प्रज्ञा, चलो अब पुकारो।

जगते में सपना है सोते में सपना
सपना हुआ ना कभी कोई अपना
ना यह सच, ना वो सच, जानें जरा
पहचाने मिथ्या ओ निज रूप अपना

ना तो ये सच है और ना वो सच है
चर में अचर में जो मौजूद रहता
सृष्टि के पहले, प्रलय के भी आगे
वही ब्रह्म था और वही शेष रहता

चलो आँखों में ऐसा अंजन लगाएँ
जगें नीद से और सब को जगाएँ
छह शत्रु खुद में छिपे हैं जो बैठे
खुद के ही पौरुष से उनको हराएँ

ये जमीं आसमां ये अगन ये पवन
ये बस्ती ये गलियाँ ये आँगन बुहारें
सब की है और है ये सब के लिये 
चलो आज मिल के हम सब सुधारें

रामनारायण सोनी
४.०९.२२

Friday, 2 September 2022

आओ सभी आईना पहन लें

आओ सभी आईना पहन लें

मुझे मैं न दिखता मेरी आँख से ही
न तू देख पाया तेरी ही खुदी को 
है सारा नगर देखता दूसरों को 
किसी ने न देखा खुद में खुदी को।

कैसा है तू और है कैसा जमाना
उमर अपनी है, अब तक खपाई
बुरा ही बुरा सब है मेरे अलावा
सब की अकल में यही बात आई।

अब हर गले में, टँगा आईना हो 
नकली मुखौटे चलो सब उतारें
देखूँ मैं मुझको तेरे आईने में
जानें स्वयं को, स्वयं को पुकारें।

है बाहर जगत, एक भीतर जगत
ये देखी जमी, लोग देखे हजारों
कभी सामने, कभी मन में हमारे
जगे अपनी प्रज्ञा, चलो अब पुकारो।

जगते में सपना है सोते में सपना
सपना हुआ ना कभी कोई अपना
ना यह सच, ना वो सच, जानें जरा

ना तो ये सच है और ना वो भी



सभी लोग अपने हैं आओ पुकारें

ये जमीं आसमां ये अगन ये पवन
ये बस्ती ये गलियाँ ये आँगन बुहारें
सब की है और है ये सब के लिये 
चलो आज मिल के हम सब सुधारें

चलो आँखों में ऐसा अंजन लगाएँ

....... निरन्तर

रामनारायण सोनी
02.09.22

खामोश चिट्ठी

तुम्हारे नाम से शुरू मेरे नाम से खत्म मेरी चिट्ठी
इस बीच कोई लिखा हाल न खबर ये मेरी चिट्ठी
हर बार फिर भी तुमने सिद्दत से पढ़ी मेरी चिट्ठी
मेरे दिल से तेरे दिल का नाजुक जोड़ मेरी चिट्ठी
हो गया होगा महसूस उन लफ़्जों और जुबान का
जो बयान करती है जो खामोशियाँ मेरी चिट्ठी
इन्हीं खामोशियों ने फिर गज़ल गाई नज़्म गाई
बिना बोले भी कितना बोलती है ये मेरी चिट्ठी

रामनारायण सोनी

२.०९.२२