Friday, 30 September 2022
तुम ही तो थी
Saturday, 24 September 2022
बटुआ
एक ऐयारी का !
जादुई बटुआ है मेरे पास
बहुत सारे पुड़ हैं उसमें
खोल कर दिखाता हूँ
एक तिलिस्म तुम्हें
रख रख्खे हैं इसमें मैंने
तरह तरह के पल
खूबसूरत पल, आनन्द के पल,
जिन्दगी के अलग अलग मोड़ के पल,
मिलन के बिछड़ने के पल।
कुछ पल ऐसे भी हैं
जिनका साया आज तक भी
पीछा नहीं छोड़ रहे
और वे जिन्दगी के सफेद कागजों
को ढँकने लगता है।
रामनारायण सोनी
२५.०९.२२
Thursday, 22 September 2022
दूधिया हो लें
दूर! बहुत दूर!
बहुत बहुत दूर हो तुम!!
लगता है चाँद के पास हो तुम!!
नहीं नहीं! तुम्हारे पास एक वो चाँद है
और एक तुम्हारा, यानी मेरा अपना भी
तुम से अमीर हूँ मैं, मेरी किस्मत है कि
दो दो चाँद है मेरे पास
अब रोशनी भी है और शबाब भी
सनम भी और माहताब भी
रुकोगी तुम तो रुक जाएँगे चाँद भी
यों ही रोके रहो रात को
चलो दूधिया हो लें हम
बहुत सारे थे, वे तारे, देखनहारे
चाँद ने उन्हें छुपा दिया है आकाश में
चलो कोई खूबसूरत सा गीत गा लें हम
ये रात, ये चाँदनी, ये दिलकश नज़ारा!
ये समा मिलेगा फिर न दोबारा!!!
रामनारायण सोनी
२२.०९.२२
Tuesday, 20 September 2022
सिलवटों के पार से
सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ
दर्द ने लिक्खे कसैले घाव आओ मैं दिखाऊँ
जिस लड़कपन को कभी काँधे बिठाया था
भूख खा कर खुद उसे माखन खिलाया था
खोल गठरी से व्यथा की यह कथा तुमको बताऊँ
सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ
सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ
इक सलोना स्वप्न हमने प्यार से ऐसा संजोया
देव पूजे, भात , धोक दे कर सिर नवाँया
तब कहीं जा कर हमारी गोद में शिशु एक पाया
सो सके वह नींद भर इसलिये खुद को जगाया
खर्च कर अपनी जवानी पालने बचपन झुलाया
उम्र की बीती कहानी आओ तुमको मैं सुनाऊँ
सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ
स्वप्न अपने रहन रख कर सब खुशी उसकी खरीदी
पाँव के छाले छुपा कर जूतियाँ ला कर उसे दी
था सजा आँगन हमारा गूँजती किलकारियों से
खर्च डाले जो जमा थे ढूँढ कर अल्मारियों से
हार थक कर लौटते थे दिन दिहाड़ी के कड़े थे
उस थकन की पीर को मैं अब तुम्हें कैसे बताऊँ
सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ
फिर समय नें बदल करवट तीव्र तेवर थे दिखाए
थे जिन्दगी की ओढ़नी में पेच टाटों के लगाए
वे उँगलियाँ, हाथ, माथा चूमते थे लाड़ से हम
हाय यह हत भाग्य कैसा हो गए कितने पराए
झुर्रियों से ढूँढ कर मुस्कान मुह पर कैसे लाएँ
छूटते दर और टूटते घर की कथा कैसे सुनाऊँ
सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ
देखता हूँ दृश्य, आश्रम द्वार पर नजरें गड़ी थी
कीमती उस कार से काय कृश उतरे खड़ी थी
जर्जराती जिल्द में हो कामायनी जैसे मढ़ी थी
जिन्दगी बस खार लेकर आँसुओं से वह झड़ी थी
तुम इसे सन्यास का बस नाम दे कर चुप रहोगे
उस हृदय की मर्मभेदी चीख मैं तुम को सुनाऊँ
सिलवटों के पार से कुछ अनकही बातें सुनाऊँ
रामनारायण सोनी
२०.०९.२२
तिनके सा मैं
सारस से पाँखी हम
बातों ही बातों में तुमने-
कितने ही पृष्ठ पलट डाले
चमक उठे वातायन
विविध रंग वाले
लिक्खी थी मधुर मधुर
वे शहदीली रातें
सारस से पंख खोलकर
उड़ने की बातें
यादों के अम्बर में
फगुनी टेसू क्या दहका है ?
मौसम का पोर पोर महका है
रामनारायण सोनी
२०.०९.२२
Monday, 19 September 2022
मेरा उपवन बुला रहा
ओ नभ के उड़ते पांखी
मेरा उपवन बुला रहा है
थोड़ा पंखों को दो विराम
मेरा उपवन बुला रहा है
तुम पहुँचोगे जगह जहाँ पे
प्यारा गाँव हुआ करता था
उसे शहर ने निगल लिया है
एक चौपाल हुआ करता था
ओ नभ के उड़ते पांखी
मेरा उपवन बुला रहा है
आम, नीम, बड, पीपल की
ठण्डी छाँव घनी रहती थी
उनके शव तक नही बचे है
अब सन्नाटा पसर रहा है
ओ नभ के उड़ते पांखी
मेरा उपवन बुला रहा है
सुखद नीड़ था जहाँ बनाया
तिनके तक अब नहीं मिलेंगे
वे मधुर गान तोता मैना के
सुनने को ना कहीं मिलेंगे
ओ नभ के उड़ते पांखी
मेरा उपवन बुला रहा है
ताल तलैया सूख चुके हैं
प्याऊ बस इतिहास हुई है
पथ में छाँव बिछाता बादल
तक भी आना छोड़ रहा है
ओ नभ के उड़ते पांखी
मेरा उपवन बुला रहा है
दूर देश के प्रिय प्रवासी
मीलों तुम उड़कर आए हो
मालव की माटी और पानी
अब कंकरीट वन उगा रहा है
ओ नभ के उड़ते पांखी
मेरा उपवन बुला रहा है
कोयल और पपीहे की तो
आवाजें सब बिदा हुई है
नगर गाँव में हवा प्रदूषित
बोतल में जल बिक रहा है
ओ नभ के उड़ते पांखी
मेरा उपवन बुला रहा है
रामनारायण सोनी
११.०८.२२
सेवा का हवन कुण्ड
सेवा का हो हवन कुण्ड और हम समिधा हो जाएँ
अगन बने फिर लगन हमारी सर्व समर्पित हो जाए।
तन-मन तप कर संकल्पों का मंगल सूत्र बँधाएँ
शुद्ध भाव की अरणी ले कर पावन ज्योति जगाएँ।।
इस समष्टि का हर कण कण सेवा में आहुतियाँ देता
नदियाँ बहती सूरज तपता पवन प्राण ले क्यों बहता।
सागर अपना पानी दे कर इस जग में जीवन धरता
अम्बर अपने महा उदर में सृष्टि अनेकों क्यों भरता।।
इनमें से कोई भी अपना मूल्य कर्म का नहीं माँगता
इस निर्बाध क्रिया में वह अपना नियम नहीं लाँघता।
ये सब सेवा का प्रकल्प ले आदिकाल से लगे हुए हैं
फिर भी रहते मौन सदा ये ना कोई उपदेश बाँटता।।
सेवा के इस महायज्ञ से महामारियाँ भी हारी हैं
मानवता की प्रतिरक्षा में सेवा ही सब से भारी है
हर सेवक नर में नारायण आ कर स्वयं उतरते हैं
इसीलिये कष्टों के पल में भी तो यह सेवा जारी है
आओ प्रिय इस महायज्ञ में आहुतियाँ अपनी डालें
हो वेद ऋचाओं का उच्चारण तब हम हाथ स्रुवा लें।
अपनी धरा गगन अपना है मन में सेवा दीप जला लें
पीड़ित मानवता की सेवा में तन मन प्राण लगा लें।।
रामनारायण सोनी
१९.०९.२२
शूल और फूल
बहुत प्रयास किये तुम ने भी मैंने भी
न यादें मिटी, न पीछे छूटी रेखाएँ
न वे पल, न ही वे वाकिये
आँगन के बिरवे की टहनियों से झड़ते रहे
बहारें, फूल पत्तियाँ और खुशबू
पर उन गुदाज़ यादों के शूल
चख लेते हैं लहू के स्वाद को
कितना सुकून है इस दर्द और चुभन में
मैं उतना ही प्यार करता हूँ
इन निर्मम शूलों से
जितना करता रहा हूँ
फूलों से, पत्तों से, पंखुड़ियों से
रामनारायण सोनी
१७.०९ .२२
महसूस किया बस तूने
सुनना एक बात है
समझना एक और बात है
पर महसूस करना
सब से अलग और सबसे खास बात है
मुझे सुना भी है, समझा भी है
जमाने भर के लोगों ने
सिर्फ वो है जो महसूस करता है मुझे
रामनारायण सोनी
०९.०९.२२
Saturday, 17 September 2022
सृष्टि है यह ईशमय
नदिया बहती है क्यों
बहती हुई जीवन की यह नदी !
बहना उसका अकेला नहीं है
हरेक पल बहता है !
जल कण की तरह
रास्ते का हर घाट !
भाग्य ले कर खड़ा है..
तमाम स्वार्थ की कश्तियाँ खड़ी हैं
लंगर डाले इस नदी की छाती पर
अपने लिये जल है जीवन इस का
दुनिया के लिये जीवन है जल इस का
बहना है कर्म इसका
बहते रहना ही है धर्म इसका
उद्भव से अवसान तक
रामनारायण सोनी
१७.०९.२२
ज़िंदगी ज़िंदगी
जिन्दगी सिर्फ साढ़े तीन हर्फों की है
कब से लिखे जा रहा हूँ इस को
जिसको ज यानी जन्म से शुरू किया था
बचपन इस में इ की मात्रा लगाने में
याने इल्म पाने में खर्च हो गई
कई अच्छे मकाम जो थे रास्ते में
कुछ बरस इसके माथे बिंदी चढ़ाने में गुजरे
और मैं देख ता ही रह गया
जिदगी की दौड़ती रेल गाड़ी में बैठा रहा मैं
बाहर गाँव, नगर, नदी, पहाड़ और
द-से शुरू होने वाली यह दुनिया
सब के सब दौड़ते दिखाई दिये
ग से गुजरते गए कई मोड़
और जुड़ते गए कई जोड़
हॉफती रही यह फिर भी दौड़ती ही गई
द्वन्द्वों के बीच कौंधती रही कहीं कहीं
हास्य की निसर्ग रेखाएँ
तमस भरे बादलों में बिजलियों की तरह
भाग्य के परिताप से पीछे रह गए
वे रिश्ते, वे लोग, वे राहें, वे पगडण्डियाँ
जानती है जिन्दगी की नदी कि
पास ही कहीं है समुन्दर का वो मुहाना
जिसे छोर कह लो, मृत्यु कह लो
चिर विछोह कह लो
संज्ञा और नाम इस के कई है
हर वर्तमान के काल के भाल पर
अतीत की मुहर जरूर लगती है
जिंदगी प्रमेय नहीं हो सकती
इसमें दो और दो हमेशा चार नहीं होते...
रामनारायण सोनी
१७.०९.२२
शूल और फूल
बहुत प्रयास किये तुम ने भी मैंने भी
न यादें मिटी, न पीछे छूटी रेखाएँ
न वे पल, न ही वे वाकिये
आँगन के बिरवे की टहनियों से झड़ते रहे
बहारें, फूल पत्तियाँ और खुशबू
पर उन गुदाज़ यादों के शूल
चख लेते हैं लहू के स्वाद को
कितना सुकून है इस दर्द और चुभन में
मैं उतना ही प्यार करता हूँ
इन निर्मम शूलों से
जितना करता रहा हूँ
फूलों से, पत्तों से, पंखुड़ियों से
रामनारायण सोनी
१७.०९ .२२
Tuesday, 13 September 2022
परिपूर्ण ब्रह्म
Monday, 12 September 2022
मृदुल स्पर्श
कितना फर्क है इन में
Tuesday, 6 September 2022
आँसू डाकिया भी है
यमुना एक खोई नदी गंगा में
Sunday, 4 September 2022
खुदी में खुद की तलाश
Friday, 2 September 2022
आओ सभी आईना पहन लें
खामोश चिट्ठी
तुम्हारे नाम से शुरू मेरे नाम से खत्म मेरी चिट्ठी
इस बीच कोई लिखा हाल न खबर ये मेरी चिट्ठी
हर बार फिर भी तुमने सिद्दत से पढ़ी मेरी चिट्ठी
मेरे दिल से तेरे दिल का नाजुक जोड़ मेरी चिट्ठी
हो गया होगा महसूस उन लफ़्जों और जुबान का
जो बयान करती है जो खामोशियाँ मेरी चिट्ठी
इन्हीं खामोशियों ने फिर गज़ल गाई नज़्म गाई
बिना बोले भी कितना बोलती है ये मेरी चिट्ठी
रामनारायण सोनी
२.०९.२२