आओ सभी आईना पहन लें
मुझे मैं न दिखता मेरी आँख से ही
न तू देख पाया तेरी ही खुदी को
है सारा नगर देखता दूसरों को
किसी ने न देखा खुद में खुदी को।
कैसा है तू और है कैसा जमाना
उमर अपनी है, अब तक खपाई
बुरा ही बुरा सब है मेरे अलावा
सब की अकल में यही बात आई।
अब हर गले में, टँगा आईना हो
नकली मुखौटे चलो सब उतारें
देखूँ मैं मुझको तेरे आईने में
जानें स्वयं को, स्वयं को पुकारें।
है बाहर जगत, एक भीतर जगत
ये देखी जमी, लोग देखे हजारों
कभी सामने, कभी मन में हमारे
जगे अपनी प्रज्ञा, चलो अब पुकारो।
जगते में सपना है सोते में सपना
सपना हुआ ना कभी कोई अपना
ना यह सच, ना वो सच, जानें जरा
पहचाने मिथ्या ओ निज रूप अपना
ना तो ये सच है और ना वो सच है
चर में अचर में जो मौजूद रहता
सृष्टि के पहले, प्रलय के भी आगे
वही ब्रह्म था और वही शेष रहता
चलो आँखों में ऐसा अंजन लगाएँ
जगें नीद से और सब को जगाएँ
छह शत्रु खुद में छिपे हैं जो बैठे
खुद के ही पौरुष से उनको हराएँ
ये जमीं आसमां ये अगन ये पवन
ये बस्ती ये गलियाँ ये आँगन बुहारें
सब की है और है ये सब के लिये
चलो आज मिल के हम सब सुधारें
रामनारायण सोनी
४.०९.२२
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