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Saturday, 17 September 2022

शूल और फूल

बहुत प्रयास किये तुम ने भी मैंने भी

न यादें मिटी, न पीछे छूटी रेखाएँ
न वे पल, न ही वे वाकिये
आँगन के बिरवे की टहनियों से झड़ते रहे
बहारें, फूल पत्तियाँ और खुशबू
पर उन गुदाज़ यादों के शूल
चख लेते हैं लहू के स्वाद को
कितना सुकून है इस दर्द और चुभन में
मैं उतना ही प्यार करता हूँ
इन निर्मम शूलों से
जितना करता रहा हूँ
फूलों से, पत्तों से, पंखुड़ियों से

रामनारायण सोनी
१७.०९ .२२

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