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Monday, 19 September 2022

सेवा का हवन कुण्ड

सेवा का हो हवन कुण्ड और हम समिधा हो जाएँ
अगन बने फिर लगन हमारी सर्व समर्पित हो जाए।
तन-मन तप कर संकल्पों का मंगल सूत्र बँधाएँ
शुद्ध भाव की अरणी ले कर पावन ज्योति जगाएँ।।

इस समष्टि का हर कण कण सेवा में आहुतियाँ देता
नदियाँ बहती सूरज तपता पवन प्राण ले क्यों बहता।
सागर अपना पानी दे कर इस जग में जीवन धरता
अम्बर अपने महा उदर में सृष्टि अनेकों क्यों भरता।।

इनमें से कोई भी अपना मूल्य कर्म का नहीं माँगता
इस निर्बाध क्रिया में वह अपना नियम नहीं लाँघता।
ये सब सेवा का प्रकल्प ले आदिकाल से लगे हुए हैं
फिर भी रहते मौन सदा ये ना कोई उपदेश बाँटता।।

सेवा के इस महायज्ञ से महामारियाँ भी हारी हैं
मानवता की प्रतिरक्षा में सेवा ही सब से भारी है
हर सेवक नर में नारायण आ कर स्वयं उतरते हैं
इसीलिये कष्टों के पल में भी तो यह सेवा जारी है

आओ प्रिय इस महायज्ञ में आहुतियाँ अपनी डालें
हो वेद ऋचाओं का उच्चारण तब हम हाथ स्रुवा लें।
अपनी धरा गगन अपना है मन में सेवा दीप जला लें
पीड़ित मानवता की सेवा में तन मन प्राण लगा लें।।

रामनारायण सोनी
१९.०९.२२

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