बहती हुई जीवन की यह नदी !
बहना उसका अकेला नहीं है
हरेक पल बहता है !
जल कण की तरह
रास्ते का हर घाट !
भाग्य ले कर खड़ा है..
तमाम स्वार्थ की कश्तियाँ खड़ी हैं
लंगर डाले इस नदी की छाती पर
अपने लिये जल है जीवन इस का
दुनिया के लिये जीवन है जल इस का
बहना है कर्म इसका
बहते रहना ही है धर्म इसका
उद्भव से अवसान तक
रामनारायण सोनी
१७.०९.२२
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