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Tuesday, 6 September 2022

यमुना एक खोई नदी गंगा में

नहीं भूल पाने का दर्द
नहीं मिल पाने के दर्द से बड़ा है
रेंगते हुए त्रिकाल के सरीसृप 
जीवन की घाटियों और कन्दराओं से 
निकल निकल कर अट्टहास करते हैं 
एक अतीत निर्मम पहाड़ के नीचे दब गया
यह वर्तमान काले आकाश की ओर देखता है
जहाँ न चाँद-सूरज है, न तारे न जुगनू ही हैं
एक भविष्य के पृष्ठ में वह अभागा अध्याय 
लिखा ही नहीं जा सकता 
क्योंकि ऐसी कलम बनी ही नहीं
गर कलम बनी होती तो स्याही नहीं बनी
और स्याही गर कोई होती भी...
तो क्या होता? तो क्या ये लोग?
क्या ये दुनिया, ये दस्तूर, ये परम्पराएँ लिखने देती ? 
कोई कहानी चाहे कितनी भी जीवन्त हो, 
कहानी जो छटपटाती है
अनन्त प्यार का सागर ले कर भी
कलम की टिप पर खड़ी रह जाती है
कभी हो नहीं सकती है वह कोई उपन्यास
बहुत अजीब सी कहानी है यह 
जो न रुकती है, न बकती है, 
जो न तो ठहरी है, न ही चलती है
कहता है केवल सूत्रधार, 
अरे! दर्शक है तो केवल वही है
सुनता भी तो केवल वही है 
दो अदद मूक पात्रों को ले कर
नेपथ्य में लिखे-अनलिखे संवाद 
आत्माएँ कण्ठस्थ सुनाती थी जिसे
वे वाणी विहीन हैं, चुपचाप हैं, निष्पन्द हैं 
ये बड़ी बड़ी दीवारें, मेहराबें, कंगूरे, अट्टालिकाएँ
इनमें रौब-दाब हैं, दीवाने आम है, दीवाने खास है
पर इसमें दो ध्रुवों पर दो अन्तःपुर हैं
एक राजा का, और एक रानी का
उस पार, इस पार
दो अलग अलग संसार 
दो नदी, दो दो तट, दो धार
उद्गम से मुहाने तक बड़ा सारा विस्तार
हिमालय से गंगासागर तक का संचार
बिना किसी पावन प्रयाग के
गंगोत्री से सागर तक खिंची महीन रेखा
भगीरथ इसे नीहारिकाओं से निचोड़ कर
प्रेम की इस धरा पर छोड़ कर 
अदृश्य हो गया कहीं 
कान्हा की कालिन्दी अब 
नहीं पहुँच पायेगी कभी भी सागर तक
गंगा के तेज प्रवाह में बह गई यमुना
बह गया यमुना का नाम, पानी और अस्मिता भी बिना मिले बही जा रही है 
ये नदियाँ बहती है क्यों? 
एक पावन अदृष्य नदी सरस्वती 
ऐसे ही अचरज से देखती है इन्हें
सागर नहीं जान सकेगा कभी भी 
बिना देह की, बिना नाम की, 
बिना पहिचान की उस यमुना को 
जानेगा सागर केवल उस गंगा को
पूछ कर देखे कोई कपिल मुनि से
कि ये गंगा यों बहती है क्यों?

रामनारायण सोनी
६.९ .२२

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