एक दिन
मैंने पूछ ही लिया आँसू से
परिचय और कर्म उसका
वह कहने लगा
सुनो तुम! और तुम्हारे ये लोग !
मैं खामोश हो कर भी बोलता हूँ
मेरी यात्रा शुरू होती है हृदय के सागर से
सागर जो बस खारा है
सागर जब तपता है तो मीठा हो जाता है
सागर जब उफनता है तो सैलाब आते हैं
सागर को जब मन्द पवन छूती है
तो मैं ले कर आता हूँ उसकी खुशबू
मैं पलकों पर ठहरता हूँ तो शबनम हो जाता हूँ
बहते बहते जब बहुत थक जाता हूँ
तो सूख जाता हूँ अधबीच में ही
मैं निकलता हूँ सदा गर्म हो कर ही
मैं फैल जाता हूँ नयनों में जब जब
उनकी खामोशियाँ अनुवाद करने लगती हैं
हृदय के उद्वेलनों का, भावों का, तरंगों का
मैं आता ही हूँ कुछ न कुछ कहने को
लाता हूँ चिट्ठियाँ डाकिये की तरह
मैं नारद भी हूँ और उनकी करताल हूँ
जब प्रिय और प्रियतम मिलते हैं
उनकी खामोशियों में भी
भावों का अनुवाद करता हूँ मैं
मुखौटेबाजों से बहुत परेशान रहा हूँ
घुटता रहता हूँ भीतर ही भीतर
परन्तु मैं श्रेष्ठतम तब हूँ
जब ईश्वर के अनुराग में बहता हूँ
कभी भक्तों के गालों पर ही सूख जाता हूँ
तो कभी प्रभु के चरणों में चढ़ जाता हूँ
वहाँ विदेह हो कर मैं मुक्त हो जाता हूँ
रामनारायण सोनी
७.०९.२२
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