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Friday, 2 September 2022

आओ सभी आईना पहन लें

आओ सभी आईना पहन लें

मुझे मैं न दिखता मेरी आँख से ही
न तू देख पाया तेरी ही खुदी को 
है सारा नगर देखता दूसरों को 
किसी ने न देखा खुद में खुदी को।

कैसा है तू और है कैसा जमाना
उमर अपनी है, अब तक खपाई
बुरा ही बुरा सब है मेरे अलावा
सब की अकल में यही बात आई।

अब हर गले में, टँगा आईना हो 
नकली मुखौटे चलो सब उतारें
देखूँ मैं मुझको तेरे आईने में
जानें स्वयं को, स्वयं को पुकारें।

है बाहर जगत, एक भीतर जगत
ये देखी जमी, लोग देखे हजारों
कभी सामने, कभी मन में हमारे
जगे अपनी प्रज्ञा, चलो अब पुकारो।

जगते में सपना है सोते में सपना
सपना हुआ ना कभी कोई अपना
ना यह सच, ना वो सच, जानें जरा

ना तो ये सच है और ना वो भी



सभी लोग अपने हैं आओ पुकारें

ये जमीं आसमां ये अगन ये पवन
ये बस्ती ये गलियाँ ये आँगन बुहारें
सब की है और है ये सब के लिये 
चलो आज मिल के हम सब सुधारें

चलो आँखों में ऐसा अंजन लगाएँ

....... निरन्तर

रामनारायण सोनी
02.09.22

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