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Tuesday, 30 August 2022

गर मैं पागल होता

गर मैं पागल होता

गर मैं पागल होता तो
बस तू होता और मैं होता
प्याले पर नाम तेरा होता
तो विष भी वह अमृत होता

आँसू धार बही सब खातिर
पर एक बूँद तुझे चढ़ जाती
मेरे अगले पिछले सारे
जनम जनम के अघ धो जाती
   गर मैं पागल होता तो
   बस तू होता और मैं होता।।

लौटा दे वह भोला बचपन
जब तू संग रमा करता था
तुतलाती लटपट बानी तू
जो हर बार सुना करता था

मुझे जिताने खातिर नटखट
खुद तू हार लिया करता था
रोता था मैं जब जब गिर कर
बढ तू थाम लिया करता था
   गर मैं पागल होता तो
   बस तू होता और मैं होता।।

मैंने कभी नहीं माँगा कुछ
सब देता है, तेरी मर्जी
चाहे दे इस हाथ अभी ये
फिर लौटा ले, तेरी मर्जी

जनम मरण है हाथ तुम्हारे
यह जीवन भी, तेरी मर्जी
बाहर भीतर तू ही तू है
इतना सा गर समझा होता
   गर मैं पागल होता तो
   बस तू होता और मैं होता।।

जर्जर मेरी नाव हुई है
तट भी छूट गये हैं सारे
धार तेज है भँवर बड़े हैं
तन भी मन भी दोनों हारे

बिन पतवार बही जाती है
मेरा भरोसा है कि तुम ही
मातु पिता या बन्धु बनोगे
भव से तारोगे बस तुम ही
   गर मैं पागल होता तो
   बस तू होता और मैं होता।।

रामनारायण सोनी
२८.०८.२२

Saturday, 27 August 2022

छाया कैसी कैसी

तुम चलो ! छाया चलती है
तुम रुको! छाया रुकती है
पर विज्ञान ने इसे मोडीफाय कर दिया
जब तुम चले, जब तुम रुके
जस का तस लेन्स के उस पार
अंकित कर के रख लिया
अब छाया बोलती है, चलती है
नाचती है , गाती है,
हँसाती, रुलाती है, गुदगुदाती है
कभी कागज पर छप कर
कभी पर्दे पर उतर कर
कभी मोनीटर के स्क्रीन पर
छाया अब प्रतिच्छाया नहीं रही

रामनारायण सोनी
२४.०८.२२

साहिल पर क्यों बैठे हो

सुना है! थी तो वह बेजान लाश
जो चार सौ किलोमीटर तक तैर गई
बिना किसी साँस के, बिना किसी नाव के
बिना किसी साथ के, बिना किसी ताव के
तुम हो कि साहिल पर डरे डरे से
खड़े हो भारी भरकम लंगर डाल के
साहिल पर लगी नाव ले कर
पर लाशें उतर गई उफनते दरिया में
क्योंकि लाशें डरती नहीं
मौत से, आँधियों से, भवरों से
पानी में मगरों से और भीमकाय अजगरों से
अपनों से, परायों से, दोपायों से, चौपायों से
तीरों और तलवारों से
कह रही है वह कहानी, अपनी ही जुबानी
जिन्दगी को हार कर भी मैं
मीलों तक चलती ही रही
मेरी व्यथा में रोने वालों तक से नहीं कही
जल कर हो जाऊँ, मिल जाऊँ भले खाक में
पर साहस की, शौर्य की
एक कहानी अपने नाम जरूर लिख जाऊँगी

रामनारायण सोनी
२६ .०८.२२

ऐ विराट नभ!

ऐ!नभ  ऐ! विराट

नभ विशाल! ऐ नभ विराट
तेरी गाथा है अमित अपार
तुझ में बसते है सूर्य चाँद
क्या नाप सका कोई प्रसार

तू हर खाली घट में रहता
तुझ में ही तो सारे घट हैं
धरती मानव जीव जन्तु की
जीवन सरिता का पनघट है

अम्बर तुम इतने विराट
क्षीर समुद्र कहाते हो तुम
ग्रह नक्षत्र तारिकाओं के
आश्रय दाता हो केवल तुम

तुम असीम तुम महाशून्य
तुम पंच तत्व में भी प्रधान
सृष्टि उदर में बसी तुम्हारे
है इसीलिये महिमा महान

नारायण तुझ क्षीर सिन्धु में
शैया शेष लिये बसते हैं
सप्त लोक और भुवन भी
तेरे आश्रय में रहते हैं

तुम में बादल और पखेरू
हैं आजाद विचरते रहते
पवन प्राण और गन्ध लिये
तुम में ही नित बहते रहते

गरिमा लघिमा और महिमा
इन शक्ति के तुम हो धर्ता
बिन तेरी इस महिमा के यह
सृष्टि सृजन ना सम्भव होता

रामनारायण सोनी
२८.०८. २२

गगन तुम्हारे अमित रूप

गगन तुम्हारे अमित रूप

गगन तुम्हारे अमित रूप, पर हर रूप निराला है
दिन में कितना उजला है, और रजनी में काला है।
सघन घनों को धरते हो तो, श्यामल तुम हो जाते हो
स्वच्छ सलोने हो कर तुम, नील गगन कहलाते हो।
गगन तुम्हारे अमित रूप, पर हर रूप निराला है।।

प्राची में जब अरुणिम ऊषा, सूरज ले कर आता है
वह कनक थाल तब तब, कुंकुम रोली बिखराता है।
कभी टाँक लेते हो तन में, तारक हीरे माणक मोती
कभी चाँदनी घोल धरा को, पहनाते दुधिया धोती।
गगन तुम्हारे अमित रूप, पर हर रूप निराला है।।

बने क्षितिज पे नील कटोरा, तान रहे हो तुम वितान
इसमें जग ने हर दिन देखे, नित नूतन नव-नव विहान।
कभी चंदोवा तनता नभ में रजत थाल सज जाती है
अमृत की गागर फिर भर कर धरा धाम नहलाती है।
गगन तुम्हारे अमित रूप, पर हर रूप निराला है।।

रामनारायण सोनी
२७.०८.२२

Thursday, 25 August 2022

कहानी लिख जाऊँगी

सुना है! थी तो वह बेजान लाश
जो चार सौ किलोमीटर तक तैर गई
बिना किसी साँस के, बिना किसी नाव के
बिना किसी साथ के, बिना किसी ताव के
तुम हो कि साहिल पर डरे डरे से
खड़े हो भारी भरकम लंगर डाल के
साहिल पर लगी नाव ले कर
पर लाशें उतर गई उफनते दरिया में
क्योंकि लाशें डरती नहीं
मौत से, आँधियों से, भवरों से
पानी में मगरों से और भीमकाय अजगरों से
अपनों से, परायों से, दोपायों से, चौपायों से
तीरों और तलवारों से
कह रही है वह कहानी, अपनी ही जुबानी
जिन्दगी को हार कर भी मैं
मीलों तक चलती ही रही
मेरी व्यथा में रोने वालों तक से नहीं कही
जल कर हो जाऊँ, मिल जाऊँ भले खाक में
पर साहस की, शौर्य की
एक कहानी अपने नाम जरूर लिख जाऊँगी

रामनारायण सोनी
२६ .०८.२२

बारिश की बूँदें


चलो आज बारिश की बूँदों से खेलें
शबनम से मोती को हाथों पे झेलें
बहुत दूर से ये जो चल के है आई 
इन्हें भी तो हौले से दो बोल कह लें
    चलो आज बारिश की बूँदों से खेलें

ये सावन का मौसम, घटा ये घनेरी
ये धरती की गोदी है चुलबुल छरेरी
ये धनुवे की रंगीन आभा रुपेहरी
चलो आओ बाहों में इन सब को लेलें
    चलो आज बारिश की बूँदों से खेलें

ये स्वांति का नक्षत्र, पिऊ पिऊ रटना
ये दादुर का टर टर दिन रात करना
ये चुर चुर का पानी ये झर झर है झरना
चलो आज इसमें ये तन मन भिंगो लें
      चलो आज बारिश की बूँदों से खेलें

ये पीपल की शाखों बँधे प्यारे झूले
लगा ऐसी पींगें कि आकाश छू लें
वो मस्तों की टुल्लर यहीं आ रही है
चलो छप छपाके गलियों में कर लें
     चलो आज बारिश की बूँदों से खेलें

ये कजरी दे आल्हा ये ठुमरी का गायन
ये मोरों का बगिया में मस्ती का नर्तन
लगे सारा उपवन खिला जैसे मधुबन
चलो हम भी पैरों में घुँघरू बधा लें
      चलो आज बारिश की बूँदों से खेलें

ये कैसा नशा है ये खुशबू पनीली
बिजुरी जो कड़के डरे गोरी भोली
ये जुगनू की चकमक किसे ढूँढती है
चलो लुत्फ थोड़ा ये हम भी उठा लें
      चलो आज बारिश की बूँदों से खेलें

ये टिप टिप टिपाते मद्दम पनाले
हवा के परों पे झुलाती हिंडोले
ये सर सर सराती वो बौछार डाले
चलो भूल हस्ती जरा इन में न्हा लें
      चलो आज बारिश की बूँदों से खेलें


Contd..

रामनारायण सोनी

अब क्या लिखूँ मै

.जब भी मैं गाँव लिखता हूँ
गाँव का चौपाल लिखता हूँ
चौपाल में खड़ा वटवृक्ष दिखता है
वटवृक्ष पर चिटिर पिटिर करते
रक्तकण्ठी हरे कच तोते लिखता हूँ
और सूरज से आती उस अप्रतिम ऊर्जा को
देखता हूँ जीवनी शक्ति में परिवर्तन होते
और जब जब मैं आश्रम बनते देखता हूँ....
.. वनस्थली के घर आँगन को
बाड़े में रंभाते गाय के बछड़े को
ममतामयी छाया में दुलार का स्पर्श देखता हूँ
जहाँ पवन बुहारता भी है, संगीत भी सुनाता है
फिर...
जब मैं लिखता हूँ गँवई लोक धुन पर 
थिरकती हुई किशोरियाँ का सुरम्य लोकनृत्य
जहाँ प्रकृति स्वयं लाती है प्रभाती का पर्व
और भी है जो मैं लिख नहीं सका
इनकी सब की हर आहट में देखता हूँ, 
स्तब्ध हो कर
तो उभरता है एक सौम्य सा, सरल सा...
ममत्व से, अपनत्व से, मुस्कान से 
स्नेह से परिपूर्ण चेहरा
जनक दीदी का

रामनारायण सोनी
25.08.22

Wednesday, 24 August 2022

कैसी ये खुशफहमियाँ

एक दिन इश्क के महल में
घुस क्या गया मैं
रास्ते, दरवाज़े, बाहर जाने के
बन्द हो गए हैं सभी
पर तभी कोई दीवार चठकी
और तुम शायद मलबे के उस पार खड़े थे 
बस आवाजें दौड़ती हैं मेरी सभी दिशाओं में
गूँज उठती है मेरी पुकार कि तुम कहाँ हो?
पूछता हूँ दरख्तों से, आम्र कुञ्जो से, 
तितलियों से, उन सूख चुके फूलों से
पर मेरी प्रतिध्वनियाँ, मेरी पदचाप
सिर पीटती हुई लौट लौट कर आती है
बावजूद इसके मैं खुश हो लेता हूँ
कि जैसे वे तुम्हारी ही हैं
देखा नहीं किसी ने भी
मेरी गलत फहमियों को 
इस तरह खुश फहमियों में बदलते

रामनारायण सोनी
२५.०८.२२

Tuesday, 23 August 2022

मुझे मैं क्यूँ पसन्द हूँ

चाहे तुम इसे..
अपने प्रिय से, प्रियतम से, 
स्वामी से, सखा से, अनुचर से..
यहाँ तक कि अपने सेवक से कहो
या फिर 
स्वयं उस परमात्मा से कहो!!!
कि, मुझे मैं इसलिये पसन्द हूँ
कि
मै सिर्फ तुम्हें पसन्द करता हूँ
तो समझो कि 
तुम उपलब्ध हो गए हो
गीता के समत्व योग को

रामनारायण सोनी 
१०.०८.२२

ड्राफ्ट

आइना कहता रहा कि जानता हूँ मैं तुम्हें
मैं मुकरता ही गया कि तुम मुखौटा पढ़ रहे।
पर कोई बैठा छुपा है सक्ष मेरी ही खुदी में 
रात दिन बस बिम्ब दोनों द्वद्व कैसा लड़ रहे।।

चाँदनी कब थी अलग जो चाँद में नभ में घुली
रोशनी को सूर्य से ना तुम अलग देखा करो।
इस सनातन सत्य को तुम जान लो पहचान लो 
इस जगत की अस्मिता को ईशमय देखा करो।।

सृष्टि का साकार दर्शन उस परम का दर्श समझो
जो पवन छू कर गई यह है मृदुल स्पर्श उस का।
भूख भी उसने बनाई अन्न भी उसने दिया है
वह पचाता जठर में खेल यह सब है उसी का।।

पाँच भूतों, पाँच तत्वों, पाँच प्राणों से बनाया
इन प्रपञ्चों से बुना है यह महा जंजाल समझो
इन्द्रियों के पंचकों से इस कर्म का साधन लगाया
बुद्धि, मन और चित्त जोड़े यह तेरे भीतर सजाया

ज्योतियों की है परम ज्योति जो हमें ना दीख पाती 
सूक्ष्मतम प्रज्ञा हृदय में ज्ञान का दीपक जलाती
चेतना बन प्रभु हमारे सर्व में बसता निरन
वह जगाता, वह चलाता 




चेतना को निष्प्राण को
आधि दैहिक आधि दैविक आधि भौतिक 


प्यास भी वह दे रहा है




रामनारायण सोनी

Thursday, 18 August 2022

चन्द अशआर

चन्द अशआर

जो था मैं कभी अब वो रहा मैं नहीं
जो हूँ आज वो किसी को पता नहीं

मुझसे नाराज हो के फिर तुम
खुद से ही खफ़ा होते हो क्यूँ?

ये माना कि इश्क में बंदिशें बहुत है
बन्दगी है इश्क इतना ये समझा हूँ मैं
इश्क दरिया है, इश्क राह जीने की
इश्क इबादत है इतना ही समझा हूँ मैं

जो बाजार में दिन भर ताले बेचते हैं
दुकानें उनकी भी कभी लुट जाती है।
बिसात पर तो खेल कई देखे हमने
बिन खेले भी बाजियाँ जीती जाती है

जो उनकी आँखों में बयां होते है
वो लफ्ज किताबों में कहाँ होते हैं।
ये गाती हैं गीत गज़लें और नज़्मे
जरा देख ! यहाँ कितने जहां होते हैं

रख लो आईने हजारों हज़ार लेकिन
हकीकत से नजरें मिलानी ही पड़ती है

जवाब फल से दिया जाता है पत्थर का
एक पेड़ होना भी बड़ा इम्तिहान है

वो खुद आईना धोता फिर रहा है
उसे अपने चेहरे पे शक हो रहा है
ये कैसा मलाल है उसकी समझ में
चिराग बुझा के अँधेरों से लड़ रहा है

सूरज का डूबना तय था और चाँद का सँवरना भी
शिद्दत से हो रहा था जिन्दगी का गुजरना भी.....

ये जिन्दगी तमन्नाओं का गुलदस्ता ही तो है
कुछ मुरझाती है तो कुछ चुभ जाती है।

रात की बात न कर वहाँ रोशन माहताब होता है
हर सक्ष अपनी हदों में खुद लाजवाब होता है

न मीरा की पीर हूँ, ना ही मैं कोई कबीर हूँ
फख्त शब्दों से इश्क है, ऐसा इक फ़कीर हूँ

मोहब्बत कोई धूल भी नहीं कि हवा में उड़ा दूँ
इश्क कोई जंग भी तो नहीं कि पत्थर से लड़ा दूँ
रात बहुत काली है, जालिम है, कैसे मैं ये भुला दूँ?
राह तेरी रोशन हो, आ मैं दिया दिल का जला दूँ

तुमने शायद मान लिया है अब ये पूरी तरह
कि साँसों का चलते जाना जिन्दगी है मेरी
अहसास, जज़्बात रख के भूल गए हो कहीं
मेरा इश्क सरहदों पार भी एक बन्दगी है मेरी

मेरी मुफलिसी अब हद को पार कर गई 
जितनी भी पास थी मोहब्बत, खर्च हो गई

मेरी साँसे कुछ बेसुरी सी हो गई है सुनो तो ज़रा
मेरी धड़कने उधड़ सी गई हैं फिर बुनो तो जरा
बस्तियाँ, कारवाँ, वो लवाजमें कहीं गुम हो गए
जब से गए तुम, गुम हो गए हैं हम सुनो तो ज़रा

एक तुम ही तो थे जिसे बताता था मै राज-ए- दिल
अब न लोग सुनते हैं न ही मगरूर खामोशियाँ ही
तुम्हारे हिस्से का वह वक्त मैं अब भी खाली रखता हूँ
और सोने के पहले ही वे हसीं यादें सिरहाने रखता हूँ

इन्तज़ार में एक जिन्दगी कम पड़ जाएगी, मालूम ना था
वरना दो जिन्दगियाँ रब से माँग लेते, इसी जिन्दगी में

तुझे पता नही है, जिस्म से इश्क बड़ा होता है
न जलता है न गलता है न ही ये फ़ना होता है
इश्क जिन्दगी की रोशनी भी है ताजगी भी
ओढ़ लिहाफ जो  इश्क के धागो से बुना होता है

थक जाती हैं आवाज और लफ़्ज भी थक जाते हैं
ढूँढते ढूँढते ।
अकेली एक अदद खामोशी ढूँढ लाती है कहीं से भी तुम्हे।।

उन लम्हों के उस शबनमी आब के क्या कहने
महसूस करता हूँ उसका कुदरती नूर अब भी
उन लम्हों में जो खुशबू थी न, वो तुम्हारी ही थी
कमबख्त महकते हैं उसी तरह याद में अब भी

गुजर जाती है हर रात वो उदासी लेकर तनहा तनहा
फिर उस दिन तो हम भी हुए थे यूँ ही तनहा तनहा
दिल से कहीं दूर निकल आए हैं हम यूँ ही तनहा तनहा
गुजरी हुई बारिश में हो जैसे एक बूँद तनहा तनहा

लिखा नहीं जा सकता उसे, जिसे महसूस किया
पढ़ा नही जा सका उसे, जिसे महसूस किया
पढ़ना लिखना तो सिर्फ कलम की घिसावट है
दिलों की जुबान वही समझे जिसे बस महसूस किया

चीजों और रिश्तों का फर्क समझना होगा
आसमां में घर नहीं होते जमीं पे उतरना होगा।
रोशनी उधार की लम्बी नही चल सकती है
अपने ही दिये से घर में उजाला करना होगा।।

हाँ आज तलक घर पे घर बदले हैं कई मैंने
पर बदला नही है ये तेरा दर मैंने कभी भी
तू जानता है ये कि यह घर-दर और ये दुनिया
बदलूँगा जब, तू भी न जान सकेगा कभी भी

मैं मिट्टी हूँ मिट्टी कहानी मेरी
कल भी यही थी कल भी रहूँगी
घड़ा हूँ, चिलम हूँ या सकोरा रहूँ
आखिर में फिर भी मैं मिट्टी रहूँगी

वक्त ने एक दिन कान में यह बुदबुदाया
ये चपल पल जो भी है अभी हाथ में मेरे I
कल मैं तुझे यह फिर ना लौटा सकूँगा
इसलिए चल हमकदम बन कर साथ मेरे।।

फानूस सी मेरी इस छत में टँगी है आशाएँ
सोने की जुगत करता हूँ तो शोर मचाती है।
फिक्रों की किताब सिरहाने रख कर मेरे
जिन्दगी एक खामोशी दे कर चली जाती है।।

रिश्तों को थोड़ा वक्त चाहिये निगाहों को फक्त तू चाहिये
रात की माँग में हैं सितारे बहुत मुझे रोशनी की किरन चाहिये।
है मय के पियाले निराले बहुत मुझे बस तुम्हारी नजर चाहिये
है बस्ती में लाखों नगीने भरे नहीं ये मुझे फक्त तू चाहिये।।

मैं अमीर था शहर में कई रईसों की तरह
एक दिन आई तकदीर कोई सक्ष लेकर।
मेरे हिस्से में था जो मेरे दिल का कवंल
चुरा लिया है मुझसे मेरा वो ही दगा देकर।।

जिन्दगी की अजब चाल कभी सबक एक देती है।
पूरी कायनात दे कर भी उस एक को छीन लेती है।।

रामनारायण सोनी
१.०८.२०२२

आरजू, इम्तिहान, मिन्नतें, मुश्किलें वो रास्ते हैं पगडण्डियाँ हैं।
चलते रहो, चलते रहो तकदीर से शायद कहीं वो मिल जाए।।
वो चाहत भी कोई चाहत है ? जो कहीं मोम सी पिघल जाए।
वो इश्क ही क्या जो फौलाद की बर्छियों से भी कट जाए।। '

सारा खार नमी में घुल कर नयनों से बह गया है।
क्या कहूँ, तेरी याद का हर पल मीठा हो गया है।।

अब मैं यही कहूँगा कि तेरी यादें बहुत मीठी है।।

मैं बहुत बोलता रहता हूँ यूँ ही वक्त बेवक्त तुमसे।
शायद सुनोगे फ़क्त मेरी आखरी खामोशी के बाद।

बावरा मन देखता है कई सपने
जो बने ही है टूटने के लिए

यूँ तो नजर का काम ही है देखना और देखते रहना
मगर एक उसे क्या देखा फिर तो उसी उसी को देखा

हर मुलाकात का अंजाम बिछड़ना ही होगा
जलेगा दीप कब तक, अंजाम अंधेरा ही होगा
माना कि एक दरिया बने और खूब बहे हो तुम
पर इक दिन चल के समुन्दर में ही गिरना होगा

मिरी दिल की जमी पर तुम क्या उगे
सारा जीवन सुहाना चमन हो गया

तुम्हें अब कुछ भी कहना शिकायत सा लगता है
हमें चुपचाप अपने अंदर ही रहना अच्छा लगता है
जमाना और अपने ही कहे जाने वाले ये सब लोग
जख्म देते हैं तेरे नाम से, ये दर्द मुझे अच्छा लगता है

जिन्दगी हारी हमने उम्र भर के इन्तेजार में
किया गुम खुद को तुम्हें अब तक ना पाया है
बड़ा अचरज दिखा हमको हमारे इस सफर मे
नही है पास वो फिर भी रगों में क्यूँ समाया है

इन आँखों की दहलीज पर अभी आँसू ठहरे हैं
पलकों के किनारों पे काजल के सख्त पहरे हैं
रिसते रहे इस रात में पुरजोर दिल के अंदर से
एक सागर है बसा सीने में इनसे ही तो उभरे हैं

रामनारायण सोनी

🌹🌹🌹🌹💐🌹💐

मैंने लिखना छोड़ा तुझको,
पर तुम्हें भजना छोड दिया क्या ?
कब लडूँगा आखिर खुद से खुदी में,
मैं इस जंग में अपनी हार को
मुकम्मल तुम्हारी जीत महसूस करता हूँ
तुम्हारी दुआओं का असर
था जब तक उन दवाओं में
वे हजार गुना काम करती थी,
वे तो अब निरे चूने की टिकिया हो गई है

शहर छूटा, घर छूटा, छूटे पीछे यहाँ वहाँ कई लोग
न छूटी छबियाँ, पल, नजर में उस नजर का संजोग

मैंने कभी माँगा ही नहीं, रब ने दिया उसकी मर्जी
इस हाथ दिया उस हाथ लिया, जो किया उसकी मर्जी
आज मैं हूँ; मेरे सब हैं, कल हो न हो उसकी मर्जी
खाली हाथ आये फिर खाली हाथ चले उसकी मर्जी

किसी की मंजिल खोई होगी पर हमारे रास्ते ही खो गए हैं
कश्ती किनारे से कुछ ही दूर थी हम बे पतवार हो गए हैं
सदियाँ हम से ले लो खुशी खुशी कुरबान कर देंगे हम
सिर्फ कुछ लमहे ले के उनसे हम कितने कर्जदार हो गए हैं

एक बड़ी भीड़ से हमने भी जीत कर बता दिया
आखिर में हम हारे भी तो सिर्फ़ उस एक से हारे

समझ नहीं पाये हम कि क्या उसे फिकर नहीं
या कि उसके दिलो में बाकी मेरा जिकर नहीं

जागती खामोशियों में उफनती यादों के बीच
पलकों का इस तरह भींग जाना ही बदा था
जलजलों की शक्ल में कुछ इस तरह बिफरा
दिल का सैलाब था बाँध में सब्र के ये बँधा था

ये बेनाम रिश्ते हैं न देखों इन्हें हदों में बाँध कर
बने प्यार के हैं ये रिश्ते इन रिश्तों से प्यार कर

हसीं हमसफर देखे होंगे कई
बरसों चले साथ हमको देखा नहीं
आँखों के आँसू बहुत देखे होंगे
ये दिल कितना रोया है देखा नहीं

मैं एक लम्बे अर्से से एक जहान की तलाश में हूँ
जहाँ तुम रहो, हाँ सिर्फ तुम रहो और सिर्फ मैं रहूँ

तुमने उतर कर कई बार देख लिया है मेरे दिल में
होंगे कई वहाँ पर खास एक जगा है तुम्हारी दिल में


वे छोटी छोटी बाते गर हुई न होती मेरी जिन्दगी में

तो फिर ये बड़ी बात कभी हो नहीं पाती बन्दगी में

देखे हैं तूने खूबसूरत फूल चमन में कई किसम केछाले भरे, मिट्टी सने देखे न हाथ कभी बागबां के

बूँदे जो बिछड़ी थी समन्दर से ये तो सफर का आगाज है

उठना, चलना, गिरना फिर उसी ओर बहना खूबसूरत अन्दाज़ है


🌹🥀🔥🥀🌹🥀🔥


देखे हैं तूने खूबसूरत फूल चमन में कई किसम के

छाले भरे, मिट्टी सने देखे हैं हाथ कभी बागबां के?


सतहों को देख कर गहराई न जान पाओगे

हर डूबने वाली लाश सतहों पर ही तैरती है


खो दिया खुद को तुझी में पा सकूँगा ना अब कभी

ये इश्क है कि इबादत है समझ सका न तब न अभी


किसे याद रखूँ किसे भूल जाऊँ कुछ भी सूझता नहीं।

आखिर होता यही है कि जिसे भूलना चाहूँ उसे भूलता नहीं।।


हदों में रह कर, बँधे से रह कर प्यार कभी हो नहीं सकता।

प्यार करना गलत नहीं पर गलती से प्यार हो नहीं सकता।।


बदल सका है कौन कभी इस आज को कल में

फिर आज को खो कर क्यों डूब रहे हम कल में।

जो बीत ही गया उसे दबा रहने दो उसी कल में

होगा कल कैसा हमारा ये तुम सोचना कल में।।


बेकार कोशिश करता रहा तेरी कहानी का किरदार बनने की।

मैं खुद अब अपनी अधूरी कहानी लिये घूमता हूँ गली गली।।


पुरानी सी किताब से मिली है एक कागज़ की वो कश्ती।

लिपटी मिली हैं उसमें ढेरों किलकारियाँ, मौज और मस्ती।।

क्यों उदास हूँ मैं ?

क्यों उदास हूँ मैं

बड़ी अजीब सी बात है
मैं इसलिये उदास हूँ कि!
बहुत दिनों से मुझसे कोई लड़ा नहीं
मेरे कानों ने बहुत दिनों से
'तुम पागल हो!' सुना नहीं
एक अर्से से इन सूखी आँखों से
खारा पानी बहा नहीं
चाय के इस एक प्याले से
चाय पी नहीं साइड बदल कर

मैं उदास हूँ कि !
वे खिड़कियाँ अब बात नहीं करती
मन्दिर की वे सीढ़ियाँ मुझ से पूछती हैं
कि तुम अकले ही क्यों आये हो?
छतों पर कबूतरों की सी
गुटरगूँ अब सुनाई नहीं देती

मैं उदास हूँ कि!
इस किनारे की नाव
जब से गई है उस पार
वह कभी लौटी ही नहीं
आँगन का पीपल अपने पत्तों की
पीटता रहता था तालियाँ
तुम्हारी खिलखिलाहट देख कर
बरस भर अब पतझड़ रहता है उस पर

मैं उदास हूँ कि!
कूकती कोयल के सुर
भेद जाते है मन, प्राण, हृदय को!
अनमनी मुंडेर पर
नहीं सुनी काँव काँव अर्से से
बूढ़े बरगद की झूलती जड़ों पर
अब भी चिपके हैं वे
हाथों के वे मृदुल स्पर्श तुम्हारे
रक्तकण्ठी हरे कच सुग्गे दोहराते हैं
पुकारे गए हमारे तुम्हारे नामों, सम्बोधनों को
क्या यादों के तुम्हारे उस नीड़ में
उन पलों के पंछी कभी लौट कर नहीं आते?

रामनारायण सोनी
    १७.०८.२२

Tuesday, 16 August 2022

किसे ढूँढता है यह सक्ष

😳 किसे ढूँढता है यह सक्ष 😢

बिल्लोरी काँच की ऐनक के
पीछे से एक जोड़ी नम आँखें
धुन्दियाती, चुन्धियाती आँखें
नीले विस्तीर्ण अम्बर पर छितरे
श्वेत श्याम बादलों में गड़ जाती है
सहसा उभरता है बेटे का बचपन
खिलखिलाता रेशमी एहसास सा
तभी वक्त की बहकी हवाएँ चली
बादल बिखर गए गल गल कर
टूटी तन्द्रा, पसर गई नीरवता
   जिन्दगी तार-तार, निराधार
   शून्य ही शून्य चहुँ ओर

खाली आसमान अनन्त अपार
कितना खाली खाली संसार

बचपन जो उसकी गोद खेला
अपनी काँपती उंगलियोँ में अब
उस बेटे की छुअन को ढूँढता है
उम्र से झुके इन काँधों पर
बैठे मचलते उस बचपन के
महसूस करता है भार को
तब ये काँधे जवान थे
हाथों में भी कर्म के संधान थे
अब अहसास का बोझ भी असह्य है
शिराएँ मन्द हैं, धमनियाँ निष्पन्द हैं
इधर तन गला गला, मन बुझा बुझा
बातें सिर्फ फजाएँ ही सुनती है
आशाएँ अपने हाथों सिर धुनती हैं
  फिर भी आशीष को उठे हाथ
  दिशाओं में फैल जाते हैं

खाली आसमान अनन्त अपार
कितना खाली खाली संसार

किस कदर ये पीढ़ियाँ बदल गई
संस्कृति पूरी की पूरी निगल गई
संवेदनाएँ श्मसान में और
श्मसान चौराहे पर खड़ा है
विश्व-गुरू की आकाँक्षा, आदर्श लिए
राष्ट्र कितना बेसुध पड़ा है
अतीत की पोटली से सोनचिरैया
चीख चीख दुनिया को  दिखाते हैं
स्वर्ण कूड़े के बदले बिक चुका है
चिरैया बेजान खिलौना हो चुका है।
   जानती नहीं पीढ़ियों की ये भेड़ें
   एक दिन इसी गर्त में वे ही गिरनी है।

खाली आसमान अनन्त अपार
कितना खाली खाली संसार

रामनारायण सोनी 

Saturday, 13 August 2022

कौन दस्तक दे रहा है।

वेदना के द्वार पर यह कौन दस्तक दे रहा है ?
क्यों पराई पीर को अपने हृदय में बो रहा है?
टाँग दी अपनी खुशी अपने मकां की खूंटियों पर
छोड़ फूलो की मसहरी कंटकों पे चल रहा है
           कौन दस्तक दे रहा है।

कौन है वह सक्ष जिस के कण्ठ में है प्यास तेरी
कोई भूखा गर रहा तो सामने की थाल फेरी
जागती संवेदना जब दस्यु भी कवि हो रहा है
सो रहा जब जगत यह मौन साधक जग रहा है
           कौन दस्तक दे रहा है।

हाथ में ले कर मथानी शास्त्र को जब जब बिलोया
सूत्र का नवनीत ले फिर थाल में तेरे संजोया
जिन्दगी के कायदों को माला में ऐसे पिरोया
कौन है जिसने सुधा को छोड़ के विष पी रहा है
           कौन दस्तक दे रहा हैl

तीन कालों में विचरता कुछ ढूँढता किसके लिये
उस घडी के उन पलों को क्या कभी उसने जिये
काव्य की पावन धरा तू देख कितनी उर्वरा है
खेत तेरा हो भले वह बीज आ कर बो रहा है
           कौन दस्तक दे रहा हैl

             रामनारायण सोनी
               १४.०८.२२

Thursday, 11 August 2022

बस कुछ बूँद चाहिये

सुचिते!
माना कि तुम समुन्दर !
मैं बस कुछ बूँद माँगता हूँ!!
सुनयने!
थोड़ा सा वक्त चाहिये
मेरी उन बातों को सुनने को
जो मेरी पीड़ाएँ कहना चाहती है
प्रिये!
मेरे दिल में, ख्यालों में रहना केवल तुम
जब भी मैं होऊँ परेशान
तुम्हारे काँधे पर रख सकूँ सर अपना
जब भी मैं दुनिया के गमों से घिर जाऊँ..
सुस्मिते !
चाहता हूँ कायम रहो.
मेरी आस में, अहसास में, विश्वास !
कि जैसे साथ हो तुम मेरे
फूलों में खुशबू की तरह

रामनारायण सोनी
१२.०८.२२

मेरा उपवन बुला रहा है

ओ नभ के उड़ते पांखी
मेरा उपवन बुला रहा है 
थोड़ा पंखों को दो विराम
मेरा उपवन बुला रहा है

तुम पहुँचोगे जगह जहाँ पे
प्यारा गाँव हुआ करता था
उसे शहर ने निगल लिया है
एक चौपाल हुआ करता था
  ओ नभ के उड़ते पांखी
  मेरा उपवन बुला रहा है 
  
आम, नीम, बड, पीपल की
ठण्डी छाँव घनी रहती थी
उनके शव तक नही बचे है
अब सन्नाटा पसर रहा है
  ओ नभ के उड़ते पांखी
  मेरा उपवन बुला रहा है 
  
सुखद नीड़ था जहाँ बनाया
तिनके तक अब नहीं मिलेंगे
वे मधुर गान तोता मैना के
सुनने को ना कहीं मिलेंगे
  ओ नभ के उड़ते पांखी
  मेरा उपवन बुला रहा है 

ताल तलैया सूख चुके हैं
प्याऊ बस इतिहास हुई है
पथ में छाँव बिछाता बादल
तक भी आना छोड़ रहा है
   ओ नभ के उड़ते पांखी
   मेरा उपवन बुला रहा है 

दूर देश के प्रिय प्रवासी
मीलों तुम उड़कर आए हो
मालव की माटी और पानी
अब कंकरीट वन उगा रहा है 
   ओ नभ के उड़ते पांखी
   मेरा उपवन बुला रहा है 

कोयल और पपीहे की तो
आवाजें सब बिदा हुई है
नगर गाँव में हवा प्रदूषित
बोतल में जल बिक रहा है
   ओ नभ के उड़ते पांखी
   मेरा उपवन बुला रहा है 

    रामनारायण सोनी
     ११.०८.२२

Tuesday, 9 August 2022

तुम्हारी और उनकी पसन्द


तुम्हारी पसन्द हो सकती है
मोगरा, जुही, गुलाब या चमेली
पर उन्हें पसन्द है 
सारे जगत को बिना भेदभाव के
खुशबू और खूबसूरती बिखेरना
पसन्द शायद तुम्हें वे फूल भी हो...
जैसे अमलतास, टेसू, कचनार, कमल
पर उन्हें पसन्द हैं
जगत में प्रकृति और परमात्मा के
सौंदर्य का दर्शन कराना
तुम्हें पसन्द जरूर होगा
नन्हें से शिशु का सहज हास्य
पर महसूस करके देखो
वहाँ परमात्मा मुस्कुरा रहा है।
महसूस करना कि
तुम्हारा रुदन भी
उस करुणा वरुणालय की
प्रार्थना का हिस्सा हो सकता है।

रामनारायण सोनी
१०.०८.२२

Sunday, 7 August 2022

अशआर २

वेदना के द्वार पर यह कौन दस्तक दे रहा है ?
क्यों पराई पीर को अपने हृदय में बो रहा है?
टाँग दी अपनी खुशी अपने मकां की खूंटियों पर
छोड़ फूलो की मसहरी कंटकों पे चल रहा है

रामनारायण सोनी

तुम्हारा समय दौड़ता ही रहा इस जमाने के संग संग।
खड़ा हूँ मैं अब भी वहीं जहाँ मिले थे वो पहली दफ़ा हम।।



रामनारायण सोनी
९ .७ . २२