ओ नभ के उड़ते पांखी
मेरा उपवन बुला रहा है
थोड़ा पंखों को दो विराम
मेरा उपवन बुला रहा है
तुम पहुँचोगे जगह जहाँ पे
प्यारा गाँव हुआ करता था
उसे शहर ने निगल लिया है
एक चौपाल हुआ करता था
ओ नभ के उड़ते पांखी
मेरा उपवन बुला रहा है
आम, नीम, बड, पीपल की
ठण्डी छाँव घनी रहती थी
उनके शव तक नही बचे है
अब सन्नाटा पसर रहा है
ओ नभ के उड़ते पांखी
मेरा उपवन बुला रहा है
सुखद नीड़ था जहाँ बनाया
तिनके तक अब नहीं मिलेंगे
वे मधुर गान तोता मैना के
सुनने को ना कहीं मिलेंगे
ओ नभ के उड़ते पांखी
मेरा उपवन बुला रहा है
ताल तलैया सूख चुके हैं
प्याऊ बस इतिहास हुई है
पथ में छाँव बिछाता बादल
तक भी आना छोड़ रहा है
ओ नभ के उड़ते पांखी
मेरा उपवन बुला रहा है
दूर देश के प्रिय प्रवासी
मीलों तुम उड़कर आए हो
मालव की माटी और पानी
अब कंकरीट वन उगा रहा है
ओ नभ के उड़ते पांखी
मेरा उपवन बुला रहा है
कोयल और पपीहे की तो
आवाजें सब बिदा हुई है
नगर गाँव में हवा प्रदूषित
बोतल में जल बिक रहा है
ओ नभ के उड़ते पांखी
मेरा उपवन बुला रहा है
रामनारायण सोनी
११.०८.२२
No comments:
Post a Comment