.जब भी मैं गाँव लिखता हूँ
गाँव का चौपाल लिखता हूँ
चौपाल में खड़ा वटवृक्ष दिखता है
वटवृक्ष पर चिटिर पिटिर करते
रक्तकण्ठी हरे कच तोते लिखता हूँ
और सूरज से आती उस अप्रतिम ऊर्जा को
देखता हूँ जीवनी शक्ति में परिवर्तन होते
और जब जब मैं आश्रम बनते देखता हूँ....
.. वनस्थली के घर आँगन को
बाड़े में रंभाते गाय के बछड़े को
ममतामयी छाया में दुलार का स्पर्श देखता हूँ
जहाँ पवन बुहारता भी है, संगीत भी सुनाता है
फिर...
जब मैं लिखता हूँ गँवई लोक धुन पर
थिरकती हुई किशोरियाँ का सुरम्य लोकनृत्य
जहाँ प्रकृति स्वयं लाती है प्रभाती का पर्व
और भी है जो मैं लिख नहीं सका
इनकी सब की हर आहट में देखता हूँ,
स्तब्ध हो कर
तो उभरता है एक सौम्य सा, सरल सा...
ममत्व से, अपनत्व से, मुस्कान से
स्नेह से परिपूर्ण चेहरा
जनक दीदी का
रामनारायण सोनी
25.08.22
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