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Saturday, 27 August 2022

साहिल पर क्यों बैठे हो

सुना है! थी तो वह बेजान लाश
जो चार सौ किलोमीटर तक तैर गई
बिना किसी साँस के, बिना किसी नाव के
बिना किसी साथ के, बिना किसी ताव के
तुम हो कि साहिल पर डरे डरे से
खड़े हो भारी भरकम लंगर डाल के
साहिल पर लगी नाव ले कर
पर लाशें उतर गई उफनते दरिया में
क्योंकि लाशें डरती नहीं
मौत से, आँधियों से, भवरों से
पानी में मगरों से और भीमकाय अजगरों से
अपनों से, परायों से, दोपायों से, चौपायों से
तीरों और तलवारों से
कह रही है वह कहानी, अपनी ही जुबानी
जिन्दगी को हार कर भी मैं
मीलों तक चलती ही रही
मेरी व्यथा में रोने वालों तक से नहीं कही
जल कर हो जाऊँ, मिल जाऊँ भले खाक में
पर साहस की, शौर्य की
एक कहानी अपने नाम जरूर लिख जाऊँगी

रामनारायण सोनी
२६ .०८.२२

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