क्यों उदास हूँ मैं
बड़ी अजीब सी बात है
मैं इसलिये उदास हूँ कि!
बहुत दिनों से मुझसे कोई लड़ा नहीं
मेरे कानों ने बहुत दिनों से
'तुम पागल हो!' सुना नहीं
एक अर्से से इन सूखी आँखों से
खारा पानी बहा नहीं
चाय के इस एक प्याले से
चाय पी नहीं साइड बदल कर
मैं उदास हूँ कि !
वे खिड़कियाँ अब बात नहीं करती
मन्दिर की वे सीढ़ियाँ मुझ से पूछती हैं
कि तुम अकले ही क्यों आये हो?
छतों पर कबूतरों की सी
गुटरगूँ अब सुनाई नहीं देती
मैं उदास हूँ कि!
इस किनारे की नाव
जब से गई है उस पार
वह कभी लौटी ही नहीं
आँगन का पीपल अपने पत्तों की
पीटता रहता था तालियाँ
तुम्हारी खिलखिलाहट देख कर
बरस भर अब पतझड़ रहता है उस पर
मैं उदास हूँ कि!
कूकती कोयल के सुर
भेद जाते है मन, प्राण, हृदय को!
अनमनी मुंडेर पर
नहीं सुनी काँव काँव अर्से से
बूढ़े बरगद की झूलती जड़ों पर
अब भी चिपके हैं वे
हाथों के वे मृदुल स्पर्श तुम्हारे
रक्तकण्ठी हरे कच सुग्गे दोहराते हैं
पुकारे गए हमारे तुम्हारे नामों, सम्बोधनों को
क्या यादों के तुम्हारे उस नीड़ में
उन पलों के पंछी कभी लौट कर नहीं आते?
रामनारायण सोनी
१७.०८.२२
No comments:
Post a Comment