वेदना के द्वार पर यह कौन दस्तक दे रहा है ?
क्यों पराई पीर को अपने हृदय में बो रहा है?
टाँग दी अपनी खुशी अपने मकां की खूंटियों पर
छोड़ फूलो की मसहरी कंटकों पे चल रहा है
कौन दस्तक दे रहा है।
कौन है वह सक्ष जिस के कण्ठ में है प्यास तेरी
कोई भूखा गर रहा तो सामने की थाल फेरी
जागती संवेदना जब दस्यु भी कवि हो रहा है
सो रहा जब जगत यह मौन साधक जग रहा है
कौन दस्तक दे रहा है।
हाथ में ले कर मथानी शास्त्र को जब जब बिलोया
सूत्र का नवनीत ले फिर थाल में तेरे संजोया
जिन्दगी के कायदों को माला में ऐसे पिरोया
कौन है जिसने सुधा को छोड़ के विष पी रहा है
कौन दस्तक दे रहा हैl
तीन कालों में विचरता कुछ ढूँढता किसके लिये
उस घडी के उन पलों को क्या कभी उसने जिये
काव्य की पावन धरा तू देख कितनी उर्वरा है
खेत तेरा हो भले वह बीज आ कर बो रहा है
कौन दस्तक दे रहा हैl
रामनारायण सोनी
१४.०८.२२
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