ऐ!नभ ऐ! विराट
नभ विशाल! ऐ नभ विराट
तेरी गाथा है अमित अपार
तुझ में बसते है सूर्य चाँद
क्या नाप सका कोई प्रसार
तू हर खाली घट में रहता
तुझ में ही तो सारे घट हैं
धरती मानव जीव जन्तु की
जीवन सरिता का पनघट है
अम्बर तुम इतने विराट
क्षीर समुद्र कहाते हो तुम
ग्रह नक्षत्र तारिकाओं के
आश्रय दाता हो केवल तुम
तुम असीम तुम महाशून्य
तुम पंच तत्व में भी प्रधान
सृष्टि उदर में बसी तुम्हारे
है इसीलिये महिमा महान
नारायण तुझ क्षीर सिन्धु में
शैया शेष लिये बसते हैं
सप्त लोक और भुवन भी
तेरे आश्रय में रहते हैं
तुम में बादल और पखेरू
हैं आजाद विचरते रहते
पवन प्राण और गन्ध लिये
तुम में ही नित बहते रहते
गरिमा लघिमा और महिमा
इन शक्ति के तुम हो धर्ता
बिन तेरी इस महिमा के यह
सृष्टि सृजन ना सम्भव होता
रामनारायण सोनी
२८.०८. २२
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