वेदना के द्वार पर यह कौन दस्तक दे रहा है ?
क्यों पराई पीर को अपने हृदय में बो रहा है?
टाँग दी अपनी खुशी अपने मकां की खूंटियों पर
छोड़ फूलो की मसहरी कंटकों पे चल रहा है
रामनारायण सोनी
तुम्हारा समय दौड़ता ही रहा इस जमाने के संग संग।
खड़ा हूँ मैं अब भी वहीं जहाँ मिले थे वो पहली दफ़ा हम।।
रामनारायण सोनी
९ .७ . २२
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