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Monday, 16 January 2023

अपनी धरती, अपना घर

*अपनी धरती, अपना घर*

धरती पर देखने वालों ने
कल आसमान देखा
उड़ते चढ़ते कई रंग देखे
पेंच देखे, खेंच देखी
जमे देखे, उचके देखे
उम्मीदों की डोर पर
अरमान भी देखे, निश्वास भी देखे
कुछ ने बस देखा ही देखा
काटता कोई हो, कटता कोई हो
पर कई थे व्यर्थ की लूट में
इधर से उधर दौड़ते लोग।
उन माँजों का क्या
जो काटने आये गला
हिमालय के उस पार से
नीले गीले आसमान से
वे तैरती रंगीन परियाँ
एक दिन के सफर से
फिर लौट आईं अपने घर
याने फिर अपनी धरती पर

रामनारायण सोनी
१६.०१.२३

Monday, 9 January 2023

संग सदा तू रहता है

संग सदा तू रहता है

मैं प्रणाम करता हूँ इन हिम आच्छादित शिखरों को
वन्दन करता हूँ सूरज की अरुणिम इन किरणों को।
धरता अपना शीश मही पर इसका अर्चन करने को
अभिनन्दन पहुँचे मेरा उन कल कल करते झरनों को।।

कण कण इस भूतल का मेरे प्रभु का यह मन्दिर है
नभ में मण्डित चाँद सितारे मन्दिर के ये शिखर हैं।
तड़ित मजीरा मेघ गर्जना घनन घनन करता घन है
मन मयूर का नर्तन मेरा यह घर आँगन सुन्दर है।।

रोम रोम में बसी चेतना मुझमें तू ही नित रमता है
सूखे पत्तों के परदे में भीषण दावानल छिपता है।
जनम मरण के बीच हमारा जीवन कैसे चलता है
नहीं दीखता फिर भी तो तू संग सदा ही रहता है।।

रामनारायण सोनी
१०.०१.२३