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Tuesday, 19 April 2022

बिखर गए सब सपने

नयनों में दर्दों का सागर
इसीलिए आँसू खारे हैं
जीत तुम्हारी सदा रही
हर बार हमीं हम हारे हैं

मन के खुले रहे वातायन
द्वार देहरी चौखट सूनी
बाहर है बौराया मधुबन
धू धू जलती भीतर धूनी

हुई गुबारों संग सगाई
उजड़ी उजड़ी बस्ती है
घाट घाट पर सन्नाटे हैं
बिन पतवारों की कश्ती है

टूटे श्यामल मेघों के वे
संग विचरने के अनुबन्ध
पवन कहीं रूठी बैठी है
मुखर हुआ कैसा प्रतिबन्ध

पदचापों की आहट बिखरी
बिखरे बालू में सब सपने 
सिसक रही प्राणों की वंशी
जग में किसे कहें अब अपने

रामनारायण सोनी

क्या करूँ



मेरे कुछ प्रश्न थे-
   अनुत्तरित हैं
मेरे कुछ प्रस्ताव थे-
    फाइल हो गये
मेरे कुछ अनुरोध थे-
     सुने तो, मगर काम के बोझ तले
     दब गए
मेरी तरह कई की आशाएँ हैं
     अपेक्षित जनाकांक्षाएँ हैं
क्या वक्त इतना निर्मम है?
      या सबसे अच्छा बहाना है
छोटी सी थी कहानी 
      क्षेपक नहीं हो जाये

रामनारायण सोनी

मुक्तक

आइना कहता रहा कि जानता हूँ मैं तुम्हें
मैं मुकरता ही गया कि तुम मुखौटा पढ़ रहे।
पर कोई बैठा छुपा है सक्ष मेरी ही खुदी में 
रात दिन बस बिम्ब दोनों द्वद्व कैसा लड़ रहे।।

Monday, 18 April 2022

कोविड १९

जर्द पत्तों पर लिखूँ क्या

गत बसन्तों की इबारत।
खण्डहर के ईंट रोड़े
कह रहे उनकी शहादत।।

आज स्वर में भैरवी के
क्यों रुदन की कर्कशा है।
रोशनी के झुरमुटों में
मुर्दनी है, दुर्दशा है।।

इन प्रलय के विषधरों की
मृत्युमय फुँफकार गूँजी।
चढ़ गये शूली निरे जन
कुछ बची ना गाँठ पूँजी।।

कोई कहता यह नियति के
कायदे बस सन्तुलन के।
या कि सौदागर बड़े वो
मौत लिखते हाथ जिनके।।

रामनारायण सोनी
२२।३।२०२०

Friday, 15 April 2022

यादें जाती नहीं

तुम हो, कि कभी आते नहीं
याद है, कि कभी जाती ही नहीं
बादल तो हैं पर न गरजे न बरसे
इसीलिये तो भूल गया है 
फैलाना मेरा मन मयूर अपने सिमटे पंख 
पूर्वा आई और चली गई
मैं देखता ही रहा 
खिलती कलियों में वही मुस्कान
बादलों को अलकें बनते हुए
खिलखिलाते प्रपातों में  तुम्हारा स्मित रव
सूखे पत्तों की सरसराहट में फुसफुसाहट
तुम नहीं हो, पर यहीं तो हो

रामनारायण सोनी

Thursday, 14 April 2022

कोहरों का शहर

कोहरों के इस शहर में
साथ साथ चल रहा है
चन्द गज़ों में सिमटा एक घेरा
कोहरों के भीतर से आ रही हैं
चिल्लपों करती वे शरारती आवाजें
उन्मादी लुढ़कती वे चट्टानें
मिमियाते वे महीन रिश्ते
खद खद करती हुई
उबलती आपसी खिचड़ियाँ
बेकाबू भीड़ के उफनते सैलाब
और खटाखट बन्द होते
किवाड़, खिड़कियाँ और शटर्स
कोहरे में भी दमकते अस्ले और
पेट्रोल बमों के उठते गिरते शोले
शायद कोहरा हटने
पर जो दिखेगा मंजर
मलबे के ढेर, जले अधजले घर द्वार
चार कांधों पर झूलती मानवता 
छूटते कई चीते अनचीत सवाल 
यह कैसा कोहरों का शहर है

रामनारायण सोनी 

फूँस की दीवार

देख रहा हूँ
एक अर्से से
लोग आते हैं, 
दीवार देख कर चले जाते हैं
सच तो यह है
कि झोपड़ियाँ बस फूँस की बनी होती है
प्रासादों की नक्काशी
मेहराबों का सौंदर्य,  
गुम्बदों का गर्व
फानूसों की चकाचौंध
यहाँ कहाँ से उपलब्ध होगा
यहाँ बस मिट्टी की दीप है
छत के छेदों से अन्दर झाँकता सूरज है
बगल से चढ़ी मधुमालती की लता है
अहाते में टँगा माटी का सकोरा है
जी प्लस झीरो इसका विस्तार है
हृदय से हृदय तक का प्रसार है।
यही प्राप्त है और यही पर्याप्त है।।

रामनारायण सोनी

कोई क्या कहेगा?

एक खुशफहमी है मुझे
दीवार से सटी एक मेज को
मैं निरन्तर पुरजोर धकाता हूँ
मेज तो हिलने से रही
सोचता हूँ
दीवार सरक जावेगी
घर का घर सरक जावेगा
सोचने पर मजबूर होंगे
घर में बैठे मशगूल लोग
कि कौन है यह जिद्दी, पागल इन्सान?
कैसे कहूँ कि यह मेरी जिद्द नहीं 
यह तो धुन है 
चीटीं के पहाड़ चढ़ने सी

रामनारायण सोनी
१५.०४.२२