जर्द पत्तों पर लिखूँ क्या
गत बसन्तों की इबारत।
खण्डहर के ईंट रोड़े
कह रहे उनकी शहादत।।
आज स्वर में भैरवी के
क्यों रुदन की कर्कशा है।
रोशनी के झुरमुटों में
मुर्दनी है, दुर्दशा है।।
इन प्रलय के विषधरों की
मृत्युमय फुँफकार गूँजी।
चढ़ गये शूली निरे जन
कुछ बची ना गाँठ पूँजी।।
कोई कहता यह नियति के
कायदे बस सन्तुलन के।
या कि सौदागर बड़े वो
मौत लिखते हाथ जिनके।।
रामनारायण सोनी
२२।३।२०२०
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