कोहरों के इस शहर में
साथ साथ चल रहा है
चन्द गज़ों में सिमटा एक घेरा
कोहरों के भीतर से आ रही हैं
चिल्लपों करती वे शरारती आवाजें
उन्मादी लुढ़कती वे चट्टानें
मिमियाते वे महीन रिश्ते
खद खद करती हुई
उबलती आपसी खिचड़ियाँ
बेकाबू भीड़ के उफनते सैलाब
और खटाखट बन्द होते
किवाड़, खिड़कियाँ और शटर्स
कोहरे में भी दमकते अस्ले और
पेट्रोल बमों के उठते गिरते शोले
शायद कोहरा हटने
पर जो दिखेगा मंजर
मलबे के ढेर, जले अधजले घर द्वार
चार कांधों पर झूलती मानवता
छूटते कई चीते अनचीत सवाल
यह कैसा कोहरों का शहर है
रामनारायण सोनी
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