मेरे कुछ प्रश्न थे-
अनुत्तरित हैं
मेरे कुछ प्रस्ताव थे-
फाइल हो गये
मेरे कुछ अनुरोध थे-
सुने तो, मगर काम के बोझ तले
दब गए
मेरी तरह कई की आशाएँ हैं
अपेक्षित जनाकांक्षाएँ हैं
क्या वक्त इतना निर्मम है?
या सबसे अच्छा बहाना है
छोटी सी थी कहानी
क्षेपक नहीं हो जाये
रामनारायण सोनी
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