Pages

Thursday, 14 April 2022

फूँस की दीवार

देख रहा हूँ
एक अर्से से
लोग आते हैं, 
दीवार देख कर चले जाते हैं
सच तो यह है
कि झोपड़ियाँ बस फूँस की बनी होती है
प्रासादों की नक्काशी
मेहराबों का सौंदर्य,  
गुम्बदों का गर्व
फानूसों की चकाचौंध
यहाँ कहाँ से उपलब्ध होगा
यहाँ बस मिट्टी की दीप है
छत के छेदों से अन्दर झाँकता सूरज है
बगल से चढ़ी मधुमालती की लता है
अहाते में टँगा माटी का सकोरा है
जी प्लस झीरो इसका विस्तार है
हृदय से हृदय तक का प्रसार है।
यही प्राप्त है और यही पर्याप्त है।।

रामनारायण सोनी

No comments:

Post a Comment