एक खुशफहमी है मुझे
दीवार से सटी एक मेज को
मैं निरन्तर पुरजोर धकाता हूँ
मेज तो हिलने से रही
सोचता हूँ
दीवार सरक जावेगी
घर का घर सरक जावेगा
सोचने पर मजबूर होंगे
घर में बैठे मशगूल लोग
कि कौन है यह जिद्दी, पागल इन्सान?
कैसे कहूँ कि यह मेरी जिद्द नहीं
यह तो धुन है
चीटीं के पहाड़ चढ़ने सी
रामनारायण सोनी
१५.०४.२२
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