नयनों में दर्दों का सागर
इसीलिए आँसू खारे हैं
जीत तुम्हारी सदा रही
हर बार हमीं हम हारे हैं
मन के खुले रहे वातायन
द्वार देहरी चौखट सूनी
बाहर है बौराया मधुबन
धू धू जलती भीतर धूनी
हुई गुबारों संग सगाई
उजड़ी उजड़ी बस्ती है
घाट घाट पर सन्नाटे हैं
बिन पतवारों की कश्ती है
टूटे श्यामल मेघों के वे
संग विचरने के अनुबन्ध
पवन कहीं रूठी बैठी है
मुखर हुआ कैसा प्रतिबन्ध
पदचापों की आहट बिखरी
बिखरे बालू में सब सपने
सिसक रही प्राणों की वंशी
जग में किसे कहें अब अपने
रामनारायण सोनी
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