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Tuesday, 19 April 2022

मुक्तक

आइना कहता रहा कि जानता हूँ मैं तुम्हें
मैं मुकरता ही गया कि तुम मुखौटा पढ़ रहे।
पर कोई बैठा छुपा है सक्ष मेरी ही खुदी में 
रात दिन बस बिम्ब दोनों द्वद्व कैसा लड़ रहे।।

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