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Friday, 15 April 2022

यादें जाती नहीं

तुम हो, कि कभी आते नहीं
याद है, कि कभी जाती ही नहीं
बादल तो हैं पर न गरजे न बरसे
इसीलिये तो भूल गया है 
फैलाना मेरा मन मयूर अपने सिमटे पंख 
पूर्वा आई और चली गई
मैं देखता ही रहा 
खिलती कलियों में वही मुस्कान
बादलों को अलकें बनते हुए
खिलखिलाते प्रपातों में  तुम्हारा स्मित रव
सूखे पत्तों की सरसराहट में फुसफुसाहट
तुम नहीं हो, पर यहीं तो हो

रामनारायण सोनी

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